सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए अंतरिम मुआवजे की योजना का प्रचार-प्रसार करने का निर्देश दिया

  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए अंतरिम मुआवजे की योजना का प्रचार-प्रसार करने का निर्देश दिया

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 'पीड़ितों के लिए मुआवजा (अंतरिम राहत) योजना, 2026' (Compensation to Victims (Interim Relief) Scheme, 2026) का व्यापक प्रचार-प्रसार करने का निर्देश दिया। यह योजना 'मोटर वाहन अधिनियम, 1988' की धारा 164A के तहत बनाई गई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ित अपने अंतरिम मुआवजे के अधिकार के बारे में जान सकें।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने केंद्र से यह स्पष्ट करने को भी कहा कि क्या इस योजना में बिना बीमा वाले वाहनों से जुड़ी दुर्घटनाएं भी शामिल हैं। दरअसल, एमिक्स क्यूरी (न्यायालय मित्र) सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल और स्वयं पेश हुए एक आवेदक ने यह मुद्दा उठाया था कि यह योजना केवल बीमा वाले वाहनों से जुड़े मामलों तक ही सीमित लग रही है।

    अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह जल्द से जल्द इस योजना को 'आधिकारिक राजपत्र' (Official Gazette) में प्रकाशित कराए और अगली सुनवाई तक यह बताए कि वह इस योजना को कैसे लागू करने की योजना बना रहा है।

    ये निर्देश 16 अक्टूबर को अवमानना ​​याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दिए गए। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि कानूनी प्रावधानों को लागू करने और सड़क दुर्घटनाओं के डेटा को प्रकाशित करने के संबंध में अदालत के पिछले आदेशों का पालन नहीं किया गया।

    अदालत ने गौर किया कि 'मोटर वाहन अधिनियम' की धारा 164A केंद्र सरकार को मुआवजा मांगने वालों को अंतरिम राहत देने के लिए योजनाएं बनाने का अधिकार देती है।

    28 अप्रैल, 2025 के एक पिछले आदेश में अदालत ने केंद्र को धारा 164A के तहत जल्द-से-जल्द—और हर हाल में चार महीने के भीतर—एक योजना तैयार करने का निर्देश दिया था। अदालत ने टिप्पणी की थी कि हालांकि यह प्रावधान 1 अप्रैल, 2022 से लागू हो गया, लेकिन तीन साल तक इसे लागू ही नहीं किया गया।

    16 अक्टूबर की सुनवाई के दौरान, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने खंडपीठ को बताया कि सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने 'पीड़ितों के लिए मुआवजा (अंतरिम राहत) योजना, 2026' तैयार कर ली है।

    खंडपीठ ने इस योजना के खंड 6 (Clause 6) की समीक्षा की, जिसमें अंतरिम मुआवजे का दावा करने की प्रक्रिया बताई गई। इस प्रक्रिया के तहत कोई पीड़ित या मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक पोर्टल के माध्यम से अंतरिम मुआवजे के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके साथ ही उन्हें 'मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण' (Motor Accident Claims Tribunal) के समक्ष दायर किए गए या लंबित मुआवजे के दावे का विवरण भी देना होगा। इस आवेदन को इलेक्ट्रॉनिक रूप से वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग और संबंधित जांच अधिकारी को भेजा जाना है। इसके बाद वित्तीय सेवा विभाग को इसे दुर्घटना में शामिल वाहन की बीमा कंपनी के पास भेजना होगा।

    जांच अधिकारी को दुर्घटना के 90 दिनों के भीतर पोर्टल पर 'विस्तृत दुर्घटना रिपोर्ट' (Detailed Accident Report) अपलोड करनी होगी। बीमा कंपनी को रिपोर्ट अपलोड होने के 30 दिनों के भीतर कारण बताते हुए आवेदन स्वीकार या अस्वीकार करना होगा।

    यदि बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर लेती है तो उसे स्वीकृति के 30 दिनों के भीतर क्लेम ट्रिब्यूनल (Claims Tribunal) के समक्ष भुगतान करना होगा।

    हालांकि, एमिक्स क्यूरी सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल और आवेदक ने बताया कि यह योजना केवल उन मामलों को कवर करती है, जिनमें बीमित वाहन शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इसमें उन मामलों को शामिल नहीं किया गया, जिनमें बिना बीमा वाले वाहन शामिल हैं, जहां मुआवजा देने की जिम्मेदारी चालक की हो सकती है।

    इस चिंता पर ध्यान देते हुए खंडपीठ ने एएसजी (ASG) से निर्देश लेने को कहा कि क्या यह योजना बिना बीमा वाले वाहनों को भी कवर करेगी।

    अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि इस योजना के बारे में व्यापक स्तर पर जानकारी दी जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि जब तक सरकार इसके प्रचार-प्रसार के लिए कदम नहीं उठाती, तब तक एक आम नागरिक को यह पता ही नहीं चलेगा कि उसे अंतरिम मुआवजा (Interim Compensation) मांगने का अधिकार है।

    खंडपीठ ने आगे कहा कि चूंकि यह योजना मोटर वाहन अधिनियम की धारा 164A के तहत बनाई गई, इसलिए यह अधिनियम की धारा 212 के अंतर्गत आने वाली एक वैधानिक योजना है। धारा 212 नियमों और अधिसूचनाओं के प्रकाशन और उनके लागू होने से संबंधित है। तदनुसार, अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह जल्द-से-जल्द इसे आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में प्रकाशित कराना सुनिश्चित करे।

    कार्यान्वयन पर सुझाव

    आवेदक ने योजना के कार्यान्वयन और मोटर दुर्घटना मुआवजा प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए।

    इनमें सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को यह निर्देश देना शामिल था कि वह मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों (Motor Accident Claims Tribunals) के समक्ष लंबित मुआवजे के दावों, हाईकोर्ट में लंबित अपीलों, वसूली की कार्यवाही और ऐसे मुआवजा निर्णयों का जिला-वार डेटा इकट्ठा करे और प्रकाशित करे, जिनका अभी तक भुगतान नहीं हुआ।

    आवेदक ने यह भी सुझाव दिया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हर तिमाही में मंत्रालय को संबंधित जानकारी देनी चाहिए ताकि मंत्रालय जिला-वार, राज्य-वार और राष्ट्रीय स्तर के समेकित आंकड़े प्रकाशित कर सके। आवेदक के अनुसार, इस तरह के डेटा से उन बाधाओं की पहचान करने में मदद मिलेगी, जो काम में रुकावट डालती हैं, और यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि पीड़ितों और उनके आश्रितों को बिना किसी देरी के मुआवजा मिल जाए।

    एक और सुझाव मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरणों को पर्याप्त बुनियादी ढांचा (Infrastructure) उपलब्ध कराने के बारे में था। इसमें संबंधित हाईकोर्ट के परामर्श से पीठासीन अधिकारियों, सहायक कर्मचारियों, कोर्ट रूम और डिजिटल सुविधाओं की व्यवस्था करना शामिल है।

    आवेदक ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां न्यायाधिकरणों में बुनियादी ढांचे की कमी के कारण, मुआवजे के दावों का निपटारा होने में औसतन पांच साल से अधिक का समय लग जाता है।

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इन सुझावों पर विचार करने और अगली सुनवाई तक जवाब देने को कहा है।

    सड़क दुर्घटना रिपोर्टों को लेकर अवमानना ​​याचिका

    एक अलग अवमानना ​​याचिका में खंडपीठ ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। यह नोटिस 17 अप्रैल, 2025 के उस आदेश का कथित रूप से पालन न करने के कारण दिया गया, जिसमें सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय को अगस्त 2025 के अंत तक 2023 की सड़क दुर्घटनाओं पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करने का निर्देश दिया गया।

    इससे पहले के आदेश में मंत्रालय को यह भी निर्देश दिया गया कि वह हर कैलेंडर वर्ष के खत्म होने के छह महीने के भीतर ऐसी वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करे, क्योंकि इन रिपोर्टों की उपयोगिता इनके समय पर प्रकाशित होने पर ही निर्भर करती है।

    अदालत ने केंद्र सरकार से स्पष्टीकरण मांगा कि इस निर्देश का पालन क्यों नहीं किया गया और सरकार आगे क्या कदम उठाने की योजना बना रही है।

    इन अवमानना ​​याचिकाओं और इनसे जुड़ी अन्य अर्जियों पर अगली सुनवाई 25 नवंबर, 2026 को होगी।

    Case Title : S.RAJASEEKARAN v UNION OF INDIA

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