2020 दिल्ली दंगा केस: सुप्रीम कोर्ट ने केस डायरी के पुनर्निर्माण की मांग वाली देवांगना कलिता की याचिका की खारिज

Praveen Mishra

9 March 2026 5:03 PM IST

  • 2020 दिल्ली दंगा केस: सुप्रीम कोर्ट ने केस डायरी के पुनर्निर्माण की मांग वाली देवांगना कलिता की याचिका की खारिज

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (9 मार्च) को पिंजरा तोड़ की कार्यकर्ता देवांगना कलिता की उस याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने दिल्ली दंगों से जुड़े 2020 के एक मामले में केस डायरी के पुनर्निर्माण (reconstruction) की अनुमति देने से इनकार करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी।

    जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान कलिता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि अभियोजन द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री “स्पष्ट रूप से जाली” है और इसे बाद में तैयार कर पहले की तारीख (antedated) दिखाया गया है।

    हालांकि पीठ इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई। जस्टिस अरविंद कुमार ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 172(3) का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी को केस डायरी तक सीमित परिस्थितियों में ही पहुंच का अधिकार है। उन्होंने यह भी पूछा, “मुकदमे की सुनवाई तीन साल पहले शुरू हो चुकी है, आप तीन साल तक क्या कर रहे थे?”

    यह मामला 22 सितंबर 2025 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रविंदर दुडेजा ने कहा था कि केस डायरी स्वयं में साक्ष्य नहीं होती, लेकिन उसकी अनुपस्थिति मुकदमे की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकती है। इसलिए अदालत ने संबंधित रिकॉर्ड को संरक्षित (preserve) रखने का निर्देश दिया था।

    मामला क्या है

    यह मामला एंटी-CAA और NRC विरोध प्रदर्शनों के दौरान दर्ज एक शिकायत से जुड़ा है। शिकायत में दिल्ली पुलिस के एसपी देवेंद्र सिंह ने आरोप लगाया था कि जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे 200–400 लोगों की भीड़ इकट्ठा होकर मुख्य सड़क को अवरुद्ध कर रही थी, जिससे यात्रियों को परेशानी हुई और इलाके में तनाव पैदा हो गया।

    जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने देवांगना कलिता समेत 26 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिन पर भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं—147, 353, 186, 188, 341, 283, 109, 153A और 34—के तहत आरोप लगाए गए। इस मामले की सुनवाई दिसंबर 2020 में शुरू हुई थी।

    याचिका में क्या कहा गया

    2024 में कलिता ने आरोप लगाया कि सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज गवाहों के बयान में छेड़छाड़ और पूर्व-तिथि (antedating) की गई है। उन्होंने कहा कि केस डायरी में मौजूद बुकलेट नंबर और पेज नंबर में विसंगति है।

    इसी आधार पर उन्होंने बुकलेट नंबर 9989 और 9990 के पुनर्निर्माण और संरक्षण की मांग की थी। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने इसे प्रक्रियात्मक मुद्दा बताते हुए उनकी मांग खारिज कर दी थी।

    हाईकोर्ट की टिप्पणियां

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 172 के तहत पुलिस को रोजाना केस डायरी बनाए रखना अनिवार्य है और अदालत को आवश्यकता पड़ने पर उसे मंगाने और जांचने का अधिकार है।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी को केस डायरी देखने या उसकी प्रतिलिपि मांगने का स्वतंत्र अधिकार नहीं होता, सिवाय उन सीमित परिस्थितियों के जो कानून में निर्धारित हैं।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि केस डायरी की गोपनीयता जांच प्रक्रिया और मुखबिरों की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

    हालांकि अदालत ने माना कि केस डायरी का अभाव मुकदमे की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है, इसलिए उसने संबंधित वॉल्यूम 9989 और 9990 को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।

    लेकिन अदालत ने बुकलेट के पुनर्निर्माण की मांग को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि:

    उन बुकलेट के अन्य पन्ने संभवतः अलग-अलग एफआईआर से जुड़े हो सकते हैं।

    ऐसे रिकॉर्ड का पुनर्निर्माण सीआरपीसी की धारा 172 और 91 के दायरे से बाहर है।

    आरोपी को केस डायरी के पुनर्निर्माण या उसकी प्रतियां मांगने का अधिकार नहीं है।

    साथ ही हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता को ट्रायल के दौरान ट्रायल कोर्ट के समक्ष गवाहों के बयानों की कथित पूर्व-तिथि (antedating) को साबित करने की स्वतंत्रता रहेगी।

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