मौत की सज़ा का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से उन सभी मामलों में सज़ा कम या ज़्यादा करने वाले कारकों की जानकारी मांगने वाला निर्देश हटाया
Shahadat
14 Oct 2026 9:02 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने 27 अप्रैल को जारी उस निर्देश को हटा दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट को मौत की सज़ा वाले अपराधों के हर मामले में सज़ा को कम या ज़्यादा करने वाली परिस्थितियों (Aggravating and Mitigating Circumstances) पर रिपोर्ट मांगने के लिए कहा गया। कोर्ट ने नेशनल लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी (NALSA) की इस बात को मान लिया कि इस ज़रूरत से मुश्किलें पैदा होंगी।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपारेश कुमार सिंह की बेंच ने 7 अक्टूबर को यह आदेश दिया। उन्होंने NALSA की उस अर्ज़ी को मंज़ूरी दी जिसमें 27 अप्रैल के निर्देशों पर स्पष्टीकरण मांगा गया।
27 अप्रैल का आदेश तब जारी किया गया, जब कोर्ट ने चिंता जताई कि अक्सर ट्रायल के दौरान या हाई कोर्ट द्वारा डेथ रेफरेंस (मौत की सज़ा की पुष्टि के लिए मामला) पर विचार करते समय सज़ा को कम या ज़्यादा करने वाली परिस्थितियों पर रिपोर्ट नहीं ली जाती थी। नतीजतन, सज़ा तय करने के लिए ज़रूरी अहम जानकारी पहली बार तब इकट्ठा की जाती थी, जब मामले सुप्रीम कोर्ट पहुँचते थे। इससे बेवजह देरी होती थी और सज़ा तय करने की संतुलित प्रक्रिया कमज़ोर पड़ती थी।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि ऐसी रिपोर्ट ट्रायल के दौरान, दोषी ठहराए जाने के बाद और सज़ा तय करने से पहले मांगी जानी चाहिए। अगर ट्रायल कोर्ट के सामने रिपोर्ट नहीं मांगी गई या रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई तो हाईकोर्ट को डेथ रेफरेंस स्वीकार करते समय उन्हें हासिल करना ज़रूरी है।
इसके बाद NALSA ने स्पष्टीकरण के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उन्होंने तर्क दिया कि मौत की सज़ा वाले अपराध के हर मामले में रिपोर्ट हासिल करने की ज़रूरत से प्रक्रियात्मक मुश्किलें पैदा हो सकती हैं।
NALSA की ओर से पेश वकील रश्मि नंदकुमार ने कहा कि ऐसे कई मामले हो सकते हैं, जिनमें ट्रायल कोर्ट ने मौत की सज़ा देने के बारे में सोचा भी न हो। फिर भी, 27 अप्रैल के निर्देशों के तहत कोर्ट को सज़ा कम या ज़्यादा करने वाली परिस्थितियों पर रिपोर्ट मांगने की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती।
NALSA ने यह भी बताया कि ट्रायल कोर्ट के पास इतनी बड़ी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए ज़रूरी संसाधन और सुविधाएं नहीं हो सकती हैं।
इस दलील को मानते हुए कोर्ट ने कहा,
"हम नंदकुमार की दलील से सहमत हैं। 27 अप्रैल, 2026 के आदेश के पैरा नंबर 13(A) में दिए गए निर्देश, जिनके तहत ट्रायल कोर्ट को अपराध की गंभीरता बढ़ाने और कम करने वाली परिस्थितियों (Aggravating and Mitigating Circumstances) की रिपोर्ट मंगानी होती है, उन्हें हटाया जाना चाहिए और इसके द्वारा हटाया जाता है।"
कोर्ट ने निर्देश दिया कि एक सुधार-पत्र (Corrigendum) जारी किया जाए और पैरा 13(A) को हटाने के बाद 27 अप्रैल के आदेश की सही कॉपी सभी संबंधित लोगों को भेजी जाए।
27 अप्रैल को जारी किए गए अन्य निर्देश वैसे ही रहेंगे -
1. अगर ट्रायल कोर्ट के सामने अपराध की गंभीरता बढ़ाने और कम करने वाली परिस्थितियों की रिपोर्ट नहीं ली गई है या रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई है, तो हाई कोर्ट को डेथ रेफरेंस (मौत की सज़ा की पुष्टि की प्रक्रिया) के शुरुआती चरण में ही ये रिपोर्ट मंगानी चाहिए।
2. रिपोर्ट पूरी और वेरिफाइड होनी चाहिए और तय समय के अंदर दी जानी चाहिए; साथ ही, पक्षों को उनकी जांच करने और अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए।
3. लीगल सर्विस कमेटियों को खास टीमें बनानी चाहिए जिनमें एक सीनियर वकील और कम-से-कम दो ऐसे वकील हों, जिन्हें मौत की सज़ा की पुष्टि की कार्यवाही में कम-से-कम सात साल की प्रैक्टिस का अनुभव हो; यह बात मायने नहीं रखती कि दोषी का अपना प्राइवेट वकील है या नहीं।
4. हर हाई कोर्ट को डेथ रेफरेंस मामलों के लिए वकीलों का एक खास पैनल बनाना चाहिए; और NALSA को सज़ा कम करने से जुड़ी जांच के लिए गाइडलाइंस बनानी चाहिए।
इन गाइडलाइंस में दोषी की पृष्ठभूमि, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य जैसे पहलुओं को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि उसके सुधरने और समाज में दोबारा शामिल होने की संभावना का पूरा आकलन किया जा सके।
Case Title : Aman Singh & Anr. v. State of Bihar

