CAPF में कैडर रिव्यू के आदेश का खुले तौर पर उल्लंघन, सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी; केंद्र से कार्रवाई से जुड़ी सभी फाइलें तलब

  • CAPF में कैडर रिव्यू के आदेश का खुले तौर पर उल्लंघन, सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी; केंद्र से कार्रवाई से जुड़ी सभी फाइलें तलब

    सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में कैडर रिव्यू करने के अपने निर्देशों का पालन नहीं किए जाने पर केंद्र सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए।

    कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि 2025 के संजय प्रकाश फैसले में दिए गए निर्देशों का स्पष्ट रूप से पालन नहीं किया गया। उस फैसले में केंद्र को छह महीने के भीतर सभी CAPF का कैडर रिव्यू करने और इन बलों में भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति रोकने सहित कई निर्देश दिए गए थे।

    कोर्ट ने केंद्र से आदेश के बाद की गई कार्रवाई का पूरा ब्योरा देने वाली सभी फाइलें पेश करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 28 अक्टूबर को होगी।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्जल भुइयां की विशेष पीठ उन अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें आरोप लगाया गया कि केंद्र ने संजय प्रकाश मामले में 23 मई 2025 को दिए गए फैसले का पालन नहीं किया।

    सुनवाई के दौरान पीठ ने केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से पूछा कि विशेष रूप से कैडर रिव्यू के निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया गया, जबकि इसके लिए निर्धारित छह महीने की समयसीमा समाप्त हो चुकी थी।

    जब भाटी ने बताया कि कैडर रिव्यू की प्रक्रिया शुरू कर दी गई, तो जस्टिस मिश्रा ने सवाल किया कि क्या CAPF को यह बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश की समयसीमा समाप्त हो चुकी है और प्रस्ताव भेजने में देरी करना आदेश का उल्लंघन हो सकता है।

    जस्टिस मिश्रा ने कहा,

    “जब आपने कैडर रिव्यू के प्रस्ताव मांगे, तो क्या उन्हें कोर्ट के आदेश और उसके उल्लंघन के बारे में बताया? उल्लंघन केवल आपकी ओर से ही नहीं, बल्कि उनकी ओर से भी हो सकता है, यदि उन्होंने प्रस्ताव भेजने में देरी की हो। यह काफी स्पष्ट और गंभीर मामला है।”

    संजय प्रकाश फैसले में जस्टिस अभय एस. ओक और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने केंद्र को सभी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों का व्यापक कैडर रिव्यू करने और प्रत्येक बल के भर्ती नियमों में कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 12 जुलाई 2019 के कार्यालय ज्ञापन के अनुरूप संशोधन करने का निर्देश दिया था। इस ज्ञापन में CAPF को संगठित ग्रुप-ए सेवाओं (OGAS) के रूप में मान्यता दी गई।

    सुप्रीम कोर्ट ने इन कदमों को छह महीने के भीतर पूरा करने और CAPF में IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति रोकने का भी निर्देश दिया। इसके बाद आदेश का पालन नहीं किए जाने का आरोप लगाते हुए अवमानना याचिकाएं दाखिल की गईं।

    इस बीच, केंद्र सरकार ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 लागू किया, जिसे 8 अक्टूबर को अधिसूचित किया गया। इस कानून के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी करने का प्रयास किए जाने का आरोप लगाया गया। कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए अलग याचिकाएं भी दाखिल की गई हैं।

    मौजूदा सुनवाई का उद्देश्य यह तय करना था कि अवमानना याचिकाओं पर कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं से स्वतंत्र रूप से सुनवाई की जा सकती है या नहीं।

    सुनवाई के दौरान IPS अधिकारियों की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान, भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के अधिकारियों की ओर से सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के अधिकारियों की ओर से सीनियर एडवोकेट गुरु कृष्णकुमार ने दलीलें दीं।

    उनका कहना है कि 2025 के फैसले में दिए गए निर्देश केवल प्रतिनियुक्ति के मुद्दे तक सीमित नहीं हैं, जबकि केंद्र की ओर से कानून का हवाला देकर मुख्य रूप से प्रतिनियुक्ति संबंधी निर्देशों का बचाव किया जा रहा है।

    श्याम दीवान ने कहा कि केंद्र ने पिछली सुनवाई में अधिनियम की अधिसूचना के संबंध में सही जानकारी नहीं दी। उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून को 8 अक्टूबर को ही अधिसूचित किया गया।

    उनका मुख्य तर्क था कि 2025 के फैसले में दिया गया व्यापक कैडर रिव्यू का निर्देश नए कानून से प्रभावित नहीं होता। उन्होंने कहा कि कैडर रिव्यू का मुद्दा 2021 से लंबित था और सुप्रीम कोर्ट ने केवल पहले से लंबित प्रक्रिया को छह महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया।

    दीवान ने इसे अवमानना का स्पष्ट मामला बताते हुए कहा कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो कैडर रिव्यू को रोकता हो।

    उन्होंने कहा,

    “यहां आदेश का पूरी तरह पालन नहीं हुआ। कैडर रिव्यू लंबित है और इसका इस अधिनियम से कोई संबंध नहीं है।”

    उन्होंने गृह मंत्रालय के सचिव की ओर से दाखिल हालिया हलफनामे का भी हवाला दिया, जिसमें 46 प्रतिनियुक्तियों का उल्लेख है।

    इस पर जस्टिस मिश्रा ने पूछा कि क्या ये प्रतिनियुक्तियां फैसले से पहले हुई थीं। दीवान ने जवाब दिया कि सभी प्रतिनियुक्तियां फैसले के बाद हुई हैं और अब तक ऐसी प्रतिनियुक्तियों की संख्या 61 हो चुकी है।

    दीवान ने आगे कहा कि 8 अक्टूबर तक केंद्र के पास यह कानून नहीं था और नए अधिनियम से कैडर रिव्यू संबंधी निर्देश प्रभावित नहीं होते।

    उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि अवमानना हुई है या नहीं, इस सवाल से अलग हटकर भी कैडर रिव्यू पूरा करने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए। उनके अनुसार, यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नए कानून की वैधता से जुड़े मुद्दों पर आगे विचार किया जा सकता है।

    अरविंद दातार ने कहा कि केंद्र सरकार ने 2025 के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की थी, जिसे 28 अक्टूबर 2025 को खारिज कर दिया गया था। जस्टिस मिश्रा ने पूछा कि क्या केंद्र ने निर्देशों का पालन करने के लिए अतिरिक्त समय मांगने की कोई अर्जी दी थी।

    इस पर ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि केंद्र ने 18 से 20 महीने का अतिरिक्त समय मांगने के लिए आवेदन दाखिल किया।

    हालांकि, दातार ने कहा कि समय बढ़ाने का आवेदन मार्च 2026 में दाखिल किया गया।

    दातार ने दलील दी कि यह अवमानना का सीधा और स्पष्ट मामला है। उन्होंने कहा कि केंद्र के पास अपने बचाव में केवल संशोधन की अर्जी दाखिल करने का तर्क है, जबकि पुनर्विचार याचिका अक्टूबर 2025 में खारिज हो चुकी थी और अतिरिक्त समय मांगने का आवेदन मार्च 2026 में दाखिल किया गया।

    उन्होंने कहा कि कैडर रिव्यू 2021 से लंबित था और सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में इसे पूरा करने के लिए छह महीने दिए थे, लेकिन केंद्र अब भी निर्देशों का पालन नहीं कर रहा है।

    दातार ने यह भी तर्क दिया कि कानून बनाकर न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने का प्रयास स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    गुरु कृष्णकुमार ने भी इसी तरह की दलील देते हुए कहा कि नया अधिनियम केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन न करने के लिए व्यापक सुरक्षा कवच नहीं दे सकता।

    उन्होंने कहा कि इस कानून को यह कहने के बचाव के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि अब किसी भी कार्रवाई की जरूरत नहीं है। सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर ने भी संक्षिप्त दलीलें दीं और कहा कि केंद्र की ओर से समय बढ़ाने के लिए दाखिल आवेदन प्रथम दृष्टया सद्भावनापूर्ण नहीं लगता।

    सभी पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र ने 23 मई 2025 के फैसले के बाद की घटनाओं का क्रम बताते हुए हलफनामा दाखिल किया। अवमानना याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने 13 अक्टूबर 2026 को दाखिल परिशिष्ट-6 में फैसले के विभिन्न निर्देशों के उल्लंघन की ओर ध्यान दिलाया है।

    याचिकाकर्ताओं का कहना है कि 2026 का अधिनियम उन निर्देशों को प्रभावित नहीं करता, जिनके तहत सभी CAPF का कैडर रिव्यू किया जाना था। यह प्रक्रिया 2021 से लंबित थी और सुप्रीम कोर्ट ने इसे छह महीने के भीतर पूरा करने का आदेश दिया।

    कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि फैसले के पैरा 45 में CAPF के उन पदों की संख्या को धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया गया था, जिन्हें प्रतिनियुक्ति के लिए निर्धारित किया गया। इस कमी को वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (SAG) स्तर तक लागू किया जाना था।

    याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि इस प्रक्रिया के लिए अधिकतम दो वर्ष की समयसीमा तय होने का अर्थ यह नहीं है कि कमी केवल अंतिम समय पर की जाए। उनका कहना था कि पदों में कटौती लगातार होनी चाहिए थी और फैसले के बाद भी प्रतिनियुक्तियों के जरिए अधिकारियों को शामिल किया गया, जो निर्देशों का उल्लंघन है।

    पीठ ने केंद्र के अनुपालन हलफनामे में दर्ज घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि गृह मंत्रालय ने 26 दिसंबर 2025 और 3 फरवरी 2026 को सभी CAPF को पत्र लिखकर उनके मौजूदा ग्रुप-ए कैडर की व्यापक समीक्षा करने और प्रस्ताव भेजने को कहा था।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से इस पर आपत्ति जताई गई कि जब सुप्रीम कोर्ट ने छह महीने की समयसीमा दी थी, तो प्रस्ताव मांगने की प्रक्रिया उस अवधि के बाद शुरू की गई। उनके अनुसार, यह कोर्ट के आदेश का गंभीर उल्लंघन है।

    कोर्ट ने हलफनामे के मद संख्या 10 का भी उल्लेख किया, जिससे पता चलता है कि संबंधित मंत्रालय से प्रस्ताव अप्रैल, मई और जुलाई 2026 में प्राप्त हुए।

    पीठ ने कहा कि यह पता लगाना आवश्यक है कि क्या प्रस्ताव भेजने में देरी करने वाले संबंधित बलों को याद दिलाने के लिए कोई पत्र भेजा गया।

    कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया कि वह 2025 के आदेश के अनुपालन में की गई कार्रवाई और प्राप्त प्रस्तावों पर उठाए गए कदमों का पूरा विवरण देने वाली सभी फाइलें अगली सुनवाई में पेश करे।

    मामले को 28 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई में यह जांच की जाएगी कि कैडर रिव्यू सहित फैसले के निर्देशों को लागू करने के लिए वास्तव में क्या कदम उठाए गए और देरी के लिए कौन जिम्मेदार है।

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