सुप्रीम कोर्ट ने CRPF को फटकार लगाई: दिव्यांगता होने पर ड्राइवर को नौकरी से हटाने के लिए 1.25 करोड़ रुपये का मुआवज़ा देने का आदेश दिया
Shahadat
14 July 2026 10:32 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (13 जुलाई) को सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स (CRPF) की आलोचना की। CRPF ने ड्राइवर को नौकरी के दौरान आँखों की समस्या (दिव्यांगता) होने पर मेडिकल आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया था, जबकि कानून के मुताबिक उन्हें किसी दूसरी पोस्ट पर काम देना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि फ़ोर्स "आदर्श नियोक्ता" (model employer) के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में नाकाम रही। कोर्ट ने पूर्व कॉन्स्टेबल को बकाया वेतन, ब्याज और खर्च के तौर पर कुल 1.25 करोड़ रुपये देने का आदेश दिया। साथ ही उन्हें नौकरी पर वापस रखने के हाई कोर्ट के आदेश में बदलाव किया क्योंकि वे अब रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुके हैं।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज किया, जिसमें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने कहा कि CRPF ने 'पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ (समान अवसर, अधिकारों की सुरक्षा और पूर्ण भागीदारी) एक्ट, 1995' की धारा 47 का उल्लंघन किया, क्योंकि उन्होंने संबंधित व्यक्ति को नौकरी में बनाए रखने के बजाय मेडिकल आधार पर अयोग्य घोषित कर दिया। कोर्ट ने पाया कि CRPF उन्हें दूसरी पोस्ट देने में नाकाम रही, जो कि 'पर्सन्स विद डिसेबिलिटीज़ एक्ट, 1995' की धारा 47 (सरकारी नौकरी में भेदभाव न करना) के तहत सरकारी संस्थानों की ज़िम्मेदारी है।
PwD Act की धारा 47 अनिवार्य प्रकृति की
कोर्ट ने कहा कि PwD Act की धारा 47 अनिवार्य प्रकृति की है और यह उचित व्यवस्था (Reasonable Accommodation) के अधिकार को दर्शाती है। कोर्ट ने साफ़ किया कि अगर नौकरी के दौरान कोई शारीरिक दिव्यांगता हो जाती है तो उस व्यक्ति को या तो समान वेतन और सेवा लाभ वाली किसी दूसरी पोस्ट पर भेजा जाना चाहिए, या अगर ऐसा संभव न हो तो नियोक्ता को उन्हें किसी दूसरी पोस्ट पर समायोजित (Adjust) करना होगा, भले ही इसके लिए उनके लिए एक अतिरिक्त पोस्ट (Supernumerary Post) बनानी पड़े।
"PwD Act की धारा 47 का कानूनी आदेश इतना सख्त है कि इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। PwD Act का नाम ही सब कुछ बता देता है। यह विकलांग लोगों के लिए बनाया गया कानून है, जिसका मकसद उनके अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ उन्हें समान अवसर और पूरी भागीदारी की गारंटी देना है। अहम बात यह है कि धारा 47 की शुरुआत 'नहीं' (No) शब्द से होती है। कानून में नकारात्मक शब्दों का इस्तेमाल साफ तौर पर किसी चीज़ पर रोक लगाने के लिए किया जाता है। यह कानून को अनिवार्य बनाने का एक तरीका है। प्रतिवादी (respondent) जैसे कर्मचारी को, जो एक सरकारी कर्मचारी का दर्जा रखता है, नौकरी की सुरक्षा का अधिकार है।"
बेंच ने CRPF द्वारा बताए गए 2002 के नोटिफिकेशन का भी ज़िक्र किया, जिसमें CRPF के कॉम्बैटेंट (लड़ाकू) कर्मचारियों को एक्ट की धारा 47 के दायरे से छूट दी गई। बेंच ने कहा कि यह नोटिफिकेशन 2002 में जारी किया गया, न कि तब जब प्रतिवादी को अयोग्य घोषित किया गया (जो 11 मार्च 1998 को हुआ था)। बेंच ने साफ किया कि किसी कानून के तहत बनाए गए नियम (Delegated Legislation) को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता।
"PwD Act 1995 में लागू हुआ था, जबकि प्रतिवादी को 1998 में मेडिकल कारणों से नौकरी के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह नोटिफिकेशन 2002 में आया। PwD Act के तहत दी गई ज़िम्मेदारी अनिवार्य थी, न कि वैकल्पिक; इसलिए कानून ने अपील करने वालों (Appellants) को अपनी सुविधा के अनुसार अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का कोई विकल्प नहीं दिया। अपील करने वालों को प्रतिवादी के लिए कोई दूसरी नौकरी (पद) ढूंढनी चाहिए, न कि इस बात का इंतज़ार करना चाहिए था कि प्रतिवादी इसके लिए गुहार लगाए। वैकल्पिक पोस्टिंग न देकर अपील करने वाले एक आदर्श नियोक्ता (Model Employer) के तौर पर अपनी भूमिका निभाने में नाकाम रहे और उन्होंने कल्याणकारी प्रावधान को बेअसर कर दिया।"
Case Details: UNION OF INDIA & ORS. v. BALI RAM NO.850808321|CIVIL APPEAL No.13783/2015


