सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर द्वारा दो बिलों को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए सुरक्षित रखने के फ़ैसले को चुनौती देने वाले पंजाब की याचिका बंद की

  • सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नर द्वारा दो बिलों को राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए सुरक्षित रखने के फ़ैसले को चुनौती देने वाले पंजाब की याचिका बंद की

    शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की उस याचिका का निपटारा किया, जिसमें गवर्नर के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसके तहत उन्होंने दो बिलों को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा था। राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि एक बिल को मंज़ूरी देने से इनकार कर दिया गया और दूसरे बिल पर कुछ सवाल उठाए गए।

    चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच पंजाब की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें राष्ट्रपति द्वारा कथित तौर पर कोई कार्रवाई न किए जाने के कारण दोनों बिलों को 'मान ली गई मंज़ूरी' (Deemed Assent) घोषित करने की मांग की गई।

    पंजाब की ओर से सीनियर एडवोकेट शादान फ़रासत ने कोर्ट को बताया कि एक बिल को मंज़ूरी देने से इनकार किया गया, जबकि दूसरे बिल के संबंध में राज्य सरकार से कुछ सवाल पूछे गए।

    याचिका में शामिल दो बिल हैं - सिख गुरुद्वारा (संशोधन) बिल, 2023 और पंजाब पुलिस (संशोधन) बिल, 2023। फ़रासत ने कोर्ट को बताया कि पंजाब पुलिस बिल वापस कर दिया गया और सिख गुरुद्वारा बिल के संबंध में कुछ सवाल पूछे गए।

    उन्होंने कहा कि राज्य सरकार उन सवालों का जवाब देने की प्रक्रिया में है और उन्होंने कोर्ट से मामले को दो हफ़्ते के लिए टालने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर मामले की वजह (cause of action) बनी रहती है, तो वे याचिका पर आगे बढ़ेंगे।

    हालांकि, CJI ने सवाल किया कि कोर्ट को याचिका लंबित क्यों रखनी चाहिए?

    जस्टिस बागची ने बताया कि यह मुद्दा अब बिलों को मंज़ूरी देने की समय-सीमा से संबंधित राष्ट्रपति के संदर्भ (President's Reference) पर संविधान पीठ के फ़ैसले से तय होता है।

    फ़रासत ने कहा कि भले ही छह महीने की समय-सीमा अब लागू नहीं होती है। फिर भी अगर देरी होती है तो कोर्ट राष्ट्रपति या गवर्नर को फ़ैसला लेने का निर्देश दे सकता है।

    जस्टिस बागची ने कहा कि बिल पर विचार करने की अवधि उस तारीख से फिर से शुरू होगी, जिस तारीख को सवाल पूछे गए। इसलिए उन्होंने कहा कि "अब कोई देरी नहीं है"।

    इसके बाद फ़रासत ने कोर्ट से उनका यह बयान दर्ज करने का अनुरोध किया कि अगर कोई नई वजह (fresh cause of action) पैदा होती है तो पंजाब सरकार फिर से कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएगी। इसके बाद कोर्ट ने रिट याचिका को बेअसर मानते हुए निपटा दिया, साथ ही पंजाब को ज़रूरत पड़ने पर नई कार्यवाही शुरू करने की छूट भी दी।

    पंजाब विधानसभा से पास होने के बाद गवर्नर ने दोनों बिलों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख लिया था।

    पंजाब सरकार ने आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था और बिलों को सुरक्षित रखने के गवर्नर के फ़ैसले और उसके बाद राष्ट्रपति की ओर से कथित तौर पर कोई कार्रवाई न करने को चुनौती दी थी। सरकार ने बिलों को 'मान ली गई मंज़ूरी' (deemed assent) मिलने की घोषणा की मांग की थी।

    याचिका में सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2025 के उस फ़ैसले का हवाला दिया गया, जो तमिलनाडु के गवर्नर मामले से जुड़ा था और जिसमें बिलों पर कार्रवाई के लिए गवर्नर और राष्ट्रपति की समय-सीमा तय की गई। पंजाब ने कोर्ट के उस पुराने फ़ैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि अगर कोई गवर्नर किसी बिल को मंज़ूरी नहीं देता है तो उसे पुनर्विचार के लिए विधायिका को वापस भेजना होगा।

    Case Title – State of Punjab v. Union of India & Ors

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