सुप्रीम कोर्ट ने डेंगू से बच्चे की मौत के बाद माता-पिता की आत्महत्या से जुड़ा 2015 का स्वतः संज्ञान मामला बंद किया

Shahadat

21 Aug 2026 7:20 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने डेंगू से बच्चे की मौत के बाद माता-पिता की आत्महत्या से जुड़ा 2015 का स्वतः संज्ञान मामला बंद किया

    सुप्रीम कोर्ट ने उस स्वतः संज्ञान मामला बंद किया, जो 2015 में डेंगू से अपने 7 साल के बच्चे की दुखद मौत के बाद माता-पिता की आत्महत्या पर शुरू किया गया।

    आरोप है कि कुछ अस्पतालों द्वारा बेड की कमी का हवाला देते हुए बच्चे को भर्ती करने से इनकार करने के बाद उसकी मौत हो गई।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने दिल्ली छावनी बोर्ड (Delhi Cantonment Board) के वकील का यह बयान दर्ज करते हुए मामले को बंद कर दिया कि 'की गई कार्रवाई की योजना' (Action Taken Plan) दाखिल करने के निर्देश का पालन किया गया कोर्ट ने वकील का यह भरोसा भी दर्ज किया कि अधिकारी अपनी जिम्मेदारी के प्रति जागरूक हैं और भविष्य में जरूरी एहतियाती उपाय करते रहेंगे।

    बता दें, आरोप था कि 7 साल के बच्चे को मूलचंद अस्पताल, मैक्स अस्पताल, आकाश अस्पताल और आइरीन अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन उन्हें भर्ती करने से इनकार कर दिया गया था।

    माता-पिता की आत्महत्या से भारी आक्रोश फैल गया, जिसके परिणामस्वरूप केंद्र और दिल्ली सरकारों ने अलग-अलग जांच शुरू की। दिल्ली सरकार ने सभी अस्पतालों को नोटिस जारी किया, जबकि जिन अस्पतालों का नाम आया, उनसे यह बताने को कहा गया कि उनका रजिस्ट्रेशन क्यों रद्द न किया जाए।

    जहां मैक्स और मूलचंद अस्पतालों ने बच्चे का इलाज करने से इनकार करने की बात से इनकार किया, वहीं आकाश और आइरीन अस्पतालों ने इलाज से इनकार करने के पीछे उचित ICU सुविधाओं की कमी का हवाला दिया।

    नवंबर 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वेक्टर-जनित बीमारियों (जैसे डेंगू) का एक मुख्य कारण ठोस कचरे के प्रबंधन (Solid Waste Management) की कमी थी। कोर्ट ने मामले के दायरे को इसी मुद्दे तक सीमित किया। आज से पहले आखिरी आदेश फरवरी 2019 में पारित किया गया, जब कोर्ट ने NDMC, MCD और दिल्ली छावनी बोर्ड को एक कार्य योजना दाखिल करने का निर्देश दिया।

    गौरतलब है कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक मामला आया, जिसमें गाजियाबाद में बलात्कार और हत्या की शिकार 4 साल की बच्ची को जीवित रहने के दौरान 2 निजी अस्पतालों ने कथित तौर पर इलाज देने से इनकार कर दिया।

    CJI कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया और कहा कि अस्पताल "आपराधिक रूप से लापरवाह" थे और बच्ची को इलाज देने से इनकार करने के मामले में बेहद असंवेदनशील थे, शायद इसलिए क्योंकि वह एक गरीब परिवार से थी। कोर्ट के कहने पर अस्पताल पीड़ित के परिवार को स्वेच्छा से 12 लाख रुपये देने को तैयार हो गए। इस मामले की सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने संकेत दिया कि वह यौन उत्पीड़न के पीड़ितों और अन्य मेडिकल इमरजेंसी के मामलों में तुरंत इलाज सुनिश्चित करने के लिए गाइडलाइंस तैयार करेगा।

    Case: IN RE: OUTRAGE AS PARENTS END LIFE AFTER CHILD'S DENGUE DEATH SMW(C) No. 1/2015

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