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अधिकारियों को बेवजह तलब करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को आगाह करते हुए झारखंड हाईकोर्ट का आदेश खारिज किया

LiveLaw News Network
1 July 2021 3:07 PM GMT
अधिकारियों को बेवजह तलब करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को आगाह करते हुए झारखंड हाईकोर्ट का आदेश खारिज किया
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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक अग्रिम जमानत के मामले में झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें ''आपराधिक न्याय प्रणाली की बेहतरी'' के लिए राज्य के अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर उपस्थिति होने के लिए कहा गया था।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की खंडपीठ ने उपरोक्त फैसले पर आपत्ति जताई और सभी हाईकोर्ट को ऐसे मामले में ''अनावश्यक रूप से अधिकारियों को समन'' करने के लिए आगाह किया है,जो समाप्त हो गया है। खंडपीठ 9 और 13 अप्रैल 2021 के झारखंड हाईकोर्ट के आदेशों के खिलाफ दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी।

कोर्ट ने माना कि एक बार जब अग्रिम जमानत दे दी गई और उसकी पुष्टि हो गई,तो आमतौर पर यह मामले का अंत होगा।

''आपराधिक न्याय प्रणाली की बेहतरी'' के इरादे के बारे में, न्यायालय ने कहा कि यह एक ऐसा मामला है जिस पर जनहित याचिका के रूप में सर्वोत्तम रूप से विचार किया जा सकता है।

''इस उद्देश्य के लिए, संबंधित कागजात को हाईकोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रशासनिक पक्ष में विचार करने के लिए रखा जाना चाहिए कि, क्या तथ्यात्मक परिदृश्य मामले को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करने के लिए कहते हैं या नहीं? यदि इन पर विचार किया जाता है, तो इसे केवल एक जनहित याचिका के रूप में पंजीकृत किया जाना चाहिए।''

उपरोक्त समन के आदेश को एकल पीठ द्वारा 09.04.2021 को पारित किया गया था। जिसमें डॉक्टर स्वपन कुमार सरक को व्यक्तिगत तौर पर उपस्थिति होने के लिए कहा गया था। इस डाक्टर ने एक मृतक के शव का परीक्षण किया था और कथित तौर पर इस तथ्य का खुलासा करने में विफल रहा था कि मृतका गर्भवती थी। हालांकि, अग्रिम जमानत के लिए आवेदन के साथ संलग्न अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद, अदालत ने श्री सरक को इस मामले में एक पार्टी-प्रतिवादी के रूप में जोड़ दिया था और निम्नानुसार समन जारी किया थाः

''मृतक अंजुम बानो का पोस्टमार्टम डॉ. स्वप्न कुमार सरक द्वारा किया गया है, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में, उन्होंने यह उल्लेख नहीं किया कि मृतक की मौत से तुरंत पहले उसके गर्भ का प्री-मैच्योर गर्भपात हो गया था।''

इस साल की शुरुआत में, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों को 'उच्च अधिकारियों को बार-बार, आकस्मिक और बिना ठोस वजह के सम्मन जारी' करने के खिलाफ चेताया था और सलाह दी थी कि जिम्मेदारी के साथ अपनी शक्ति का प्रयोग करें और सिर्फ बहुत आवश्यक स्थितियों में ही समन जारी करें, ऐसा ''केवल उन्हें अपमानित करने के लिए'' ना किया जाए।

केस का शीर्षक-झारखंड राज्य बनाम बसीर अंसारी

आदेश डाउनलोड/पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें



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