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सुप्रीम कोर्ट ने यमुना नदी के प्रदूषण पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा गठित समिति से रिपोर्ट मांगी

LiveLaw News Network
19 Jan 2021 11:02 AM GMT
सुप्रीम कोर्ट ने  यमुना नदी के प्रदूषण पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा गठित समिति से रिपोर्ट मांगी
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यमुना नदी के प्रदूषण पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा गठित समिति से रिपोर्ट मांगी है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने "प्रदूषित नदियों के उपचार" के मुद्दे से संबंधित स्वत: संज्ञान मामले की सुनवाई कर रही थी और नदी की निगरानी पर एनजीटी-नियुक्त एक समिति की रिपोर्ट को बेंच के सामने पेश करने के लिए निर्देश दिया। समिति भी इस मामले में भी पक्षकार बनी है।

कोर्टरूम एक्सचेंज

आज की सुनवाई में, वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा, एमिकस क्यूरी ने इस मामले में पीठ को बताया कि 18 जनवरी को पानी की गुणवत्ता का स्तर उत्कृष्ट था और अमोनियम का स्तर नियंत्रण में था।

अरोड़ा ने कहा,

"अगर इसे बनाए रखा जा सकता है, तो यह अच्छा होगा। एनजीटी ने यमुना नदी के लिए नदी-निगरानी समिति भी नियुक्त की है।"

अरोड़ा ने अदालत से समिति से रिपोर्ट मांगने का अनुरोध किया क्योंकि यह सहायता प्रदान कर सकती है।

अरोड़ा ने पीठ को सूचित किया कि हरियाणा राज्य ने यह भी बताया है कि वे कुछ एसटीपी और सीईटीपी को अपग्रेड करने की प्रक्रिया में हैं।

इसके लिए, सीजेआई ने कहा कि रिपोर्ट के लिए अपेक्षित आदेश पारित किया जाएगा।

अरोड़ा ने यह भी कहा कि हरियाणा ने पानी में अमोनियम के स्तर को "उत्कृष्ट" पर ला दिया है जो 0.3 पीपीएम है ।

अरोड़ा ने कहा,

"स्वीकार्य बिंदु 0.9 पीपीएम है। इसका मतलब है, अगर कहीं इच्छाशक्ति होती है, तो कोई रास्ता होता ही है। यदि वे इन मानकों को बनाए रख सकते हैं, तो यह अच्छा होगा। यह दिल्ली के लिए पीने के पानी का मामला है।"

उन्होंने नोट पर निष्कर्ष निकाला कि हरियाणा और दिल्ली के बीच पानी की मात्रा जारी करने को लेकर विवाद चल रहा है और इस मुद्दे को यहां नहीं खींचा जाना चाहिए, और इस मामले को प्रदूषण को कम करने के उपायों तक ही सीमित रखना चाहिए।

इस मौके पर, हरियाणा राज्य की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत को यह कहा कि दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) द्वारा दायर याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और कई तथ्य हैं जो विवादित हैं ।

इस पर, सीजेआई ने जवाब दिया,

"वर्तमान स्तर को बनाए रखने के लिए एक आदेश देने में क्या समस्या है?"

हालांकि, दीवान ने न्यायालय के अवलोकन करने का विरोध किया और कहा कि समस्याएं दिल्ली से निकली हैं न कि हरियाणा से क्योंकि हरियाणा में डिस्चार्ज के बिंदू नहीं हैं, और यह गलत तरीके से पेश किया जा रहा है कि प्रदूषण हरियाणा के कृत्यों के कारण हैं।

सीजेआई ने दीवान को सूचित किया कि कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा और डीजेबी द्वारा याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए हरियाणा सरकार को एक सप्ताह का समय दिया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने नदी की निगरानी के लिए एनजीटी द्वारा नियुक्त समिति को यमुना नदी पर अपनी रिपोर्ट की एक प्रति प्रस्तुत करने और अदालत को सूचित करने का निर्देश दिया कि उसकी सिफारिशों को किस हद तक लागू किया गया है। इसके अलावा, समिति को एक पक्षकार के रूप में पेश किया गया है।

पृष्ठभूमि

पिछली सुनवाई में 13 जनवरी, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने "प्रदूषित नदियों के उपचार" के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया।

भारत के मुख्य न्यायाधीश एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना और न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यन की बेंच ने कहा कि जल प्रदूषण का एक प्रमुख कारण गैर-उपचारित / आंशिक रूप से उपचारित नगरपालिका अपशिष्ट और विभिन्न राज्यों और शहरों के अपशिष्टों का निर्वहन है। न्यायालय हालांकि यमुना नदी के प्रदूषण के मुद्दे पर निर्णय के साथ शुरू करेगा।

ये स्वत: संज्ञान कार्यवाही तब शुरू हुई जब सुप्रीम कोर्ट दिल्ली जल बोर्ड द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें शीर्ष अदालत के तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता के लिए आवेदन दायर कर अनुपचारित अपशिष्टों के निर्वहन को रोकने के लिए हरियाणा सरकार को निर्देश देने की मांग की गई जिनके कारण नदी के पानी में अमोनिया का स्तर बढ़ गया था। याचिकाकर्ता के अनुसार, दिल्ली एनसीटी के नागरिकों को होने वाले मानवीय संकट को रोकने के लिए हस्तक्षेप आवश्यक है।

स्वत: संज्ञान कार्यवाही की शुरुआत

जल संसाधनों के प्रदूषण और ताजे पानी की गुणवत्ता में गिरावट के मुद्दे ने बेंच को एक मामले की कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि यह आम जनता और समुद्री जीवन सहित जीवित प्राणियों को प्रभावित करने वाले अधिक महत्व का मुद्दा है।

बेंच ने कहा,

"ताजे पानी की गुणवत्ता में गिरावट का सार्वजनिक स्वास्थ्य की गुणवत्ता के साथ सीधा संबंध है। यह सच है कि सीवेज अपशिष्टों द्वारा पानी की आपूर्ति का प्रदूषण अभी भी विभिन्न प्रकार की बीमारियों और असुविधाओं का एक प्रमुख कारण है।"

न्यायालय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ (2000) के ऐतिहासिक फैसले पर भरोसा किया जिसमें कहा गया था कि सभी लोग, जो भी विकास के अपने चरण और अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में, और उनकी बुनियादी जरूरतों की बराबर मात्रा व गुणवत्ता वाले पीने के पानी तक पहुंच का अधिकार रखते हैं।

इसके अलावा, पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 47 और 48 ए के तहत राज्य नीति के निर्देश सिद्धांतों को भी सुनिश्चित किया जो नागरिकों के सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार और पर्यावरण की रक्षा के लिए राज्य पर एक कर्तव्य डालते हैं।

शहरों में जल प्रदूषण के प्रमुख कारणों में, पीठ ने कहा कि,

"नदियों, तालाबों और झीलों जैसे सतही जल संसाधनों से जहां स्थानीय निकाय द्वारा अपशिष्टों का निर्वहन होता है, अत्यधिक प्रदूषित हैं। मानव मल और अन्य प्रदूषकों के इस तरह के निर्वहन से पानी के रासायनिक, भौतिक और जैविक गुणों में गिरावट होती है। इन सभी प्रक्रियाओं से प्राकृतिक वातावरण का ह्रास होता है। "

इसके अलावा, पीठ का विचार था कि जल प्रदूषण के मुद्दे से निपटने के लिए, "सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स" स्थापित करने की प्रक्रिया औद्योगिक प्रदूषण और सीवर को सीधे नदियों और जल निकायों में फैलाने वाले शहरों को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से लागू की गई थी। हालांकि, पीठ ने वर्तमान याचिका के तथ्यों का अवलोकन करते हुए उल्लेख किया कि किसी संयंत्र के माध्यम से निर्वहन करने से पहले अपशिष्टों का उपचार नहीं किया गया है, या उपचार संयंत्र पर्याप्त रूप से कार्य नहीं करते हैं।

इसलिए, अदालत ने प्रदूषित नदियों के विमुद्रीकरण के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान कार्यवाही करने का आदेश दिया।

इसे देखते हुए बेंच ने पर्यावरण मंत्रालय, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के साथ-साथ पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी किया।

बेंच ने मीनाक्षी अरोड़ा को, जो याचिकाकर्ता के लिए वकील थी , एमिक्स क्यूरी नियुक्त किया ताकि नदियों पर स्वत: संज्ञान में न्यायालय की सहायता कर सकें।

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