सुप्रीम कोर्ट ने असम पुलिस की कस्टडी में टॉर्चर के आरोपों वाली याचिका पर GD एंट्री और CCTV फुटेज मंगाए
Shahadat
25 Sept 2026 11:13 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को आदेश दिया कि वह GD डायरी, पुलिस स्टेशन का CCTV फुटेज और गुवाहाटी हाई कोर्ट का पूरा रिकॉर्ड कोर्ट में पेश करें। यह आदेश उस याचिका पर दिया गया, जिसमें गुवाहाटी हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें दीपांकर गोगोई के साथ कथित कस्टडी टॉर्चर की CBI से जांच कराने की मांग को खारिज कर दिया गया था।
हाल ही में इस मामले में असम सरकार और पांच आरोपी पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी किया गया। याचिकाकर्ता (मृतक की बहन) को CBI को पक्षकार बनाने की अनुमति दी गई। कोर्ट ने फिलहाल सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने चल रही कार्यवाही पर भी रोक लगाई।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से वकील शाहरुख आलम की दलीलें सुनीं। कोर्ट को बताया गया कि CBI ने अभी तक अपना जवाब दाखिल नहीं किया। शाहरुख ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तीन जांच हो चुकी हैं - जिनमें हाईकोर्ट और एमिक्स (न्याय मित्र) द्वारा की गई जांच भी शामिल है - लेकिन याचिकाकर्ता के पास इन रिकॉर्ड्स तक कोई पहुंच नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि पुलिस जवाबदेही आयोग ने भी कुछ जांच की थी, जिसकी रिपोर्ट भी साझा नहीं की गई।
इस पर कोर्ट ने तीनों रिपोर्ट वकील के साथ साझा करने का आदेश दिया। हालांकि, प्रतिवादी पक्ष के वकील ने एमिकस की रिपोर्ट साझा करने पर आपत्ति जताई। कोर्ट ने आपत्तियों को खारिज कर दिया और आदेश दिया कि पूरा रिकॉर्ड साझा किया जाए।
आगे कहा गया,
"गुवाहाटी हाईकोर्ट की फाइल से पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित करें। राज्य के वकील सभी संबंधित सामग्री, GD डायरी और CCTV फुटेज (पेन ड्राइव के जरिए) भी रिकॉर्ड पर रखें। अंतरिम आदेश जारी रहेगा।"
मामले के संक्षिप्त तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट के 19 सितंबर, 2025 के आदेश को चुनौती दी, जिसमें जांच को CBI को सौंपने (कोर्ट की निगरानी में जांच) और मुआवजा देने की उनकी मांग खारिज की गई। याचिकाकर्ता ने गंभीर आरोप लगाए कि मृतक गोगोई को 2023 में लिचुबारी में आर्मी कैंटोनमेंट के पास ग्रेनेड ब्लास्ट और प्रतिबंधित 'यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ़ असम' से कथित जुड़ाव के मामले में तत्कालीन एसपी की सीधी देखरेख और भागीदारी में टिटाबार और जोरहाट सरदार पुलिस स्टेशनों के कर्मचारियों ने बार-बार गैर-कानूनी रूप से हिरासत में लिया और थर्ड-डिग्री टॉर्चर (बर्बर यातना) दिया। दावा किया गया है कि लगातार शारीरिक यातना और मानसिक अपमान के कारण मृतक ने आत्महत्या कर ली।
याचिकाकर्ता ने शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद तत्कालीन एसपी के खिलाफ FIR दर्ज की गई। कहा गया कि राज्य पुलिस की जांच में पक्षपात है। इसलिए सब-डिविजनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने पुलिस द्वारा दाखिल पहली फाइनल रिपोर्ट को खारिज कर दिया और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से दोबारा जांच कराने का निर्देश दिया।
इसके बाद 30 अप्रैल 2025 को दूसरी फाइनल रिपोर्ट दाखिल की गई, लेकिन आरोप है कि यह मजिस्ट्रेट के पिछले आदेश का उल्लंघन है, क्योंकि किसी वरिष्ठ रैंक के पुलिस अधिकारी को नियुक्त नहीं किया गया था। लेकिन दूसरी रिपोर्ट के आधार पर, मजिस्ट्रेट ने शिकायत का मामला दर्ज करने का आदेश दिया।
इस बीच याचिकाकर्ता जांच को ट्रांसफर कराने के लिए पहले ही हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुका है। हाईकोर्ट ने 'एमिक्स क्यूरी' (न्यायालय मित्र) नियुक्त किया, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में मौखिक रूप से कहा कि पुलिस ने केस डायरी के साथ छेड़छाड़ की थी, जैसा कि स्पेशल लीव पिटीशन में बताया गया था। आखिरकार, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका खारिज की।
याचिका में कहा गया,
"सम्मानपूर्वक निवेदन है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा कस्टडी में यातना देने और उससे मौत होने के गंभीर आरोपों वाले मामले में—जहां राज्य की जांच पक्षपात, हितों के टकराव और छेड़छाड़ से प्रभावित हो—हाईकोर्ट को अनुच्छेद 226 के तहत अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए CBI जांच या स्वतंत्र SIT के गठन का निर्देश देना चाहिए था, ताकि जनता का भरोसा बहाल हो सके और न्याय सुनिश्चित हो सके।"
Case Details: RIMLY GOGOI SAIKIA v THE STATE OF ASSAM AND ORS|SLP(Crl) No. 7731/2026

