सुप्रीम कोर्ट में CAA को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई 5 मई 2026 से

Praveen Mishra

19 Feb 2026 5:36 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट में CAA को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई 5 मई 2026 से

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), 2019 को चुनौती देने वाली याचिकाओं को 5 मई 2026 से शुरू होने वाले सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

    चीफ़ जस्टिस, जस्टीस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की खंडपीठ ने आज प्रक्रियात्मक निर्देशों के लिए मामले पर विचार किया। यह मामला लगभग दो वर्ष बाद सूचीबद्ध हुआ है; इससे पहले 19 मार्च 2024 को सुनवाई हुई थी।

    सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने आग्रह किया कि असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से संबंधित याचिकाओं को अलग से सुना जाए, क्योंकि इनमें नागरिकता अधिनियम की धारा 6A और इनर लाइन परमिट से जुड़े विशेष मुद्दे शामिल हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि जनवरी 2020 के आदेश के अनुसार असम और त्रिपुरा से जुड़े मामलों को अन्य मामलों से अलग श्रेणी में रखा जाना है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि पहले देश के बाकी हिस्सों से संबंधित मामलों की सुनवाई होगी, उसके बाद असम और त्रिपुरा से जुड़े मामलों पर विचार किया जाएगा।

    न्यायालय ने सुनवाई का कार्यक्रम भी तय किया। याचिकाकर्ताओं को 5 मई और 6 मई (आधा दिन) को सुना जाएगा। प्रतिवादियों की दलीलें 6 मई के दूसरे हिस्से और 7 मई को सुनी जाएंगी, जबकि प्रत्युत्तर (rejoinder) की सुनवाई 12 मई को होगी।

    नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने की अनुमति दी गई है। ऐसे प्रवासियों को “अवैध प्रवासी” नहीं माना जाएगा।

    इस कानून को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह मुस्लिम प्रवासियों को बाहर रखता है और अन्य पड़ोसी देशों से उत्पीड़न के कारण आए शरणार्थियों को शामिल नहीं करता। मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने CAA को लागू करने के लिए नियम अधिसूचित किए थे तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में आवेदन प्रक्रिया के लिए समितियों के गठन का प्रावधान किया था। हालांकि CAA नियम, 2024 को भी चुनौती दी गई है, लेकिन उस पर अभी सुनवाई नहीं हुई।

    असम के याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा है कि CAA असम समझौते के विपरीत है। वहीं, केरल राज्य ने इस कानून को चुनौती देते हुए मूल वाद (original suit) दायर किया है।

    केंद्र सरकार ने कानून का बचाव करते हुए कहा है कि यह किसी भारतीय नागरिक की नागरिकता को प्रभावित नहीं करता और कुछ समूहों को रियायत देने से अन्य समूहों को शामिल न करने मात्र से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन स्वतः नहीं होता।

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