जघन्य अपराधों में जमानत के सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी लागू : सुप्रीम कोर्ट
Praveen Mishra
18 Feb 2026 1:30 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जघन्य अपराधों में जमानत के लिए लागू सिद्धांत गंभीर आर्थिक अपराधों पर भी समान रूप से लागू होते हैं, क्योंकि ऐसे अपराध नागरिकों की आर्थिक सुरक्षा और जीवन की गुणवत्ता को सीधे प्रभावित करते हैं।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक आदतन आर्थिक अपराधी को जमानत दे दी गई थी। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने केवल सह-अभियुक्त के साथ समानता (parity) के आधार पर जमानत दी, जबकि आरोपी की सक्रिय भूमिका, आपराधिक इतिहास और बार-बार ऐसे अपराधों में शामिल होने जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार नहीं किया गया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही पूर्व के निर्णय—जैसे नीरू यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और सुधा सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य—मुख्यतः हिंसक अपराधों से जुड़े थे, लेकिन उनमें निहित सिद्धांत आर्थिक धोखाधड़ी जैसे मामलों में भी लागू होते हैं। कोर्ट ने कहा कि समाज के सदस्यों का जीवन और स्वतंत्रता केवल शारीरिक सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी आर्थिक भलाई भी इसका हिस्सा है। निर्दोष लोगों की मेहनत की कमाई ठगने वाले अपराधियों के मामलों में जमानत पर विचार करते समय गवाहों पर प्रभाव, कानून-व्यवस्था पर असर और समाज के लिए खतरे जैसे कारकों को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।
मामला एक बड़े वित्तीय घोटाले से जुड़ा था, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसने आरोपी और उसके सहयोगियों को ₹11.52 करोड़ से अधिक मूल्य का खाद्यान्न आपूर्ति किया, लेकिन उसे केवल ₹5.02 करोड़ का भुगतान मिला। शेष राशि कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों, नकली पते और कई झूठी पहचान के माध्यम से हड़प ली गई। आरोपी पर धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और धमकी सहित आईपीसी की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था, बाद में धारा 409 भी जोड़ी गई। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी कई नकली पहचान और दस्तावेजों का उपयोग करता था, लगभग 20 महीने तक फरार रहा और इनाम घोषित होने के बाद ही पकड़ा गया।
सत्र न्यायालय ने पहले जमानत याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने सह-अभियुक्त के आधार पर जमानत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी के आपराधिक इतिहास, फरारी, नकली पहचान के उपयोग और दोबारा अपराध करने की संभावना को नजरअंदाज करना गंभीर त्रुटि है। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी पहले जमानत मिलने के बाद भी अपराध करता रहा और उसके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज हैं, जिससे स्पष्ट है कि वह समाज के लिए खतरा है।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और अपील स्वीकार कर ली।

