असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ FIR की मांग वाली याचिकाओं पर 16 फरवरी को होगी सुनवाई
Praveen Mishra
14 Feb 2026 4:13 PM IST

सुप्रीम कोर्ट सोमवार (16 फरवरी) को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ दायर याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करेगा, जिनमें उनके कथित 'हेट स्पीच' संबंधी बयानों और 'पॉइंट ब्लैंक' वीडियो को लेकर प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने तथा विशेष जांच दल (SIT) गठित करने की मांग की गई है।
चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमल्या बागची की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई करेगी।
हाल ही में भाजपा असम के आधिकारिक 'X' (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से एक वीडियो साझा किया गया था, जिसमें असम के मुख्यमंत्री को उन व्यक्तियों पर गोली चलाते हुए दिखाया गया था, जो कथित रूप से मुस्लिम समुदाय से संबंधित प्रतीत होते हैं। सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया और आलोचना के बाद यह वीडियो हटा लिया गया।
सूचीबद्ध याचिकाओं में दो याचिकाएं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और एनी राजा (नेता, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) द्वारा दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में 'पॉइंट ब्लैंक' वीडियो और पूर्व में दिए गए बयानों को लेकर मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। साथ ही, यह तर्क दिया गया है कि राज्य और केंद्रीय एजेंसियां निष्पक्ष जांच करने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए एसआईटी का गठन आवश्यक है।
तीसरी याचिका चार असमिया व्यक्तियों द्वारा दायर की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री ने असम में मुस्लिम समुदाय, विशेषकर बंगाली मूल के मुसलमानों के खिलाफ बार-बार भड़काऊ और विभाजनकारी बयान दिए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि उन्होंने “मिया” और “बांग्लादेशी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिन्हें याचिकाकर्ताओं ने अपमानजनक और समुदाय के प्रति घृणा फैलाने वाला बताया है। साथ ही, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की अपील का भी आरोप लगाया गया है।
इन याचिकाकर्ताओं में डॉ. हीरेन गोहैन (सेवानिवृत्त प्रोफेसर), हरेकृष्ण डेका (पूर्व डीजीपी, असम), परेश चंद्र मलाकार (संपादक-इन-चीफ, नॉर्थईस्ट नाउ) और वरिष्ठ अधिवक्ता संतानु बोरठाकुर शामिल हैं। उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री के बयानों से समुदाय के खिलाफ भेदभाव, सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार और हिंसा को बढ़ावा मिलता है।
इन तीन याचिकाओं के अलावा, 12 व्यक्तियों द्वारा एक अन्य रिट याचिका भी दायर की गई है, जिसमें 'मिया मुसलमान', 'फ्लड जिहाद' आदि टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए संविधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा विभाजनकारी बयानबाजी पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
इसके अतिरिक्त, इस्लामिक धर्मगुरुओं के संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने भी मुख्यमंत्री के भाषणों पर आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को विभाजनकारी टिप्पणियां करने से रोकने के लिए उचित निर्देश जारी किए जाएं।

