स्पष्ट करें कि अनिवार्य जेल की सज़ा वाले मोटर वाहन अपराधों के मामले कभी भी खत्म नहीं माने गए: सुप्रीम कोर्ट का यूपी सरकार को निर्देश
Shahadat
15 Sept 2026 5:37 PM IST

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से अध्यादेश के ज़रिए यह साफ़ करने को कहा कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (MV Act) के तहत गैर-समझौता योग्य अपराधों (जिनमें अनिवार्य जेल की सज़ा और बार-बार होने वाले अपराध शामिल हैं) के लिए मुक़दमे राज्य के 2023 के कानून के तहत कभी भी खत्म नहीं माने गए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच 'उत्तर प्रदेश आपराधिक कानून (अपराधों का समझौता और मुकदमों की समाप्ति) अधिनियम, 2023' से जुड़ी अंतरिम अर्ज़ी पर सुनवाई कर रही थी। इस कानून के तहत राज्य सरकार ने 31 दिसंबर, 2021 तक लंबित मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत अपराधों के मुक़दमों को खत्म करने का प्रस्ताव दिया।
कोर्ट का यह सुझाव तब आया, जब एमिक्स क्यूरी (न्यायालय मित्र), सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल ने राज्य के प्रस्तावित संशोधन पर अपनी आपत्ति दोहराई। उन्होंने तर्क दिया कि इससे कानून को लेकर संवैधानिक चुनौती का समाधान नहीं होगा।
कोर्ट ने पिछले साल नवंबर में 2023 के संशोधन को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से सवाल किया था। इसके बाद राज्य ने कोर्ट को बताया कि वह इस प्रावधान में संशोधन करने का प्रस्ताव कर रहा है ताकि यह साफ़ हो सके कि गैर-समझौता योग्य अपराध, अनिवार्य सज़ा वाले अपराध और बाद में होने वाले अपराध खत्म नहीं माने जाएंगे।
हालांकि, एमिक्स क्यूरी ने तर्क दिया कि प्रस्तावित संशोधन का कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होगा, जब तक कि राज्य के कानून की संवैधानिक वैधता की जांच न की जाए, क्योंकि यह मोटर वाहन अपराधों को नियंत्रित करने वाले केंद्रीय कानून के साथ टकराव की स्थिति पैदा करता है।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने हलफ़नामा दायर किया, जिसमें कहा गया कि उन अपराधों से जुड़े मामलों की पहचान करने के लिए ज़िलों में कमेटियां बनाई गई हैं, जिन पर मुक़दमा चलता रहेगा।
एमिक्स क्यूरी ने कहा,
"मेरा मानना है कि माननीय जज ऐसे संशोधन की संवैधानिकता की जांच कर सकते हैं, क्योंकि केंद्रीय कानून कहता है कि आप पर मुक़दमा चलाया जाएगा। सड़क सुरक्षा नागरिकों के लिए है और अगर कोई डर या रोक-टोक नहीं होगी तो नागरिक नियमों का पालन नहीं करेंगे।"
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकील ने बेंच को बताया कि राज्य ने 2026 में एक अध्यादेश भी लाया था, जिसमें यह साफ़ किया गया कि अपराधों की इन तीन श्रेणियों को खत्म नहीं माना जाएगा।
इसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने पूछा कि उन मामलों का क्या होगा, जिनमें कानून के तहत अपराध पहले ही खत्म माने जा चुके हैं। सरकारी वकील ने बताया कि सरकार ने ऐसे मामलों की पहचान करने के लिए एक प्रक्रिया शुरू की है। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश के 75 ज़िलों में से 72 ज़िलों से जानकारी मिल चुकी है।
बेंच ने राज्य के जवाब पर विचार किया और सुझाव दिया कि सरकार एक और अध्यादेश जारी करे जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि जिन मामलों को पहले ही खत्म (Abated) माना जा चुका है, उनमें मुक़दमे फिर से शुरू किए जाएंगे।
जस्टिस पारदीवाला ने संकेत दिया कि अगर राज्य ऐसे मामलों से निपटने के लिए कोई समाधान निकालता है तो कोर्ट को संशोधनों की संवैधानिक वैधता की जांच करने की ज़रूरत नहीं पड़ सकती है।
जस्टिस पारदीवाला ने सुझाव दिया,
"इसे साफ़ शब्दों में कहें कि आप नॉन-कंपाउंडेबल अपराधों (जिनमें समझौता नहीं हो सकता), ऐसे अपराधों जिनमें जेल की सज़ा ज़रूरी है और बार-बार किए गए अपराधों के मामलों को फिर से शुरू करेंगे। अगर ऐसा अध्यादेश जारी किया जाता है तो शायद हमें संवैधानिक वैधता पर विचार करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"
जस्टिस विश्वनाथन ने सुझाव दिया कि अध्यादेश में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इन अपराधों को कभी भी खत्म (Abated) नहीं माना गया।
इसके आधार पर कोर्ट ने आदेश दिया:
"इस अर्ज़ी के ज़रिए, एमिक्स क्यूरी यूपी क्रिमिनल लॉ (अपराधों का समझौता और मुक़दमों का समापन) एक्ट, 2023 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठा रहे हैं। उनके अनुसार, संशोधन एक्ट, 2023 को संविधान की धारा 254(2) के तहत ज़रूरी राष्ट्रपति की मंज़ूरी नहीं मिली। इस संशोधन का असर यह है कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत 31 दिसंबर, 2021 तक लंबित सभी आपराधिक मुक़दमे खत्म (abated) माने जाएंगे। उनके अनुसार, राज्य सरकार को एक रिपोर्ट दाखिल करनी चाहिए जिसमें बताया जाए कि नॉन-कंपाउंडेबल अपराधों, ऐसे अपराधों जिनमें जेल की सज़ा ज़रूरी है और/या बार-बार किए गए अपराधों के मामलों को अब फिर से शुरू किया जा रहा है और उन पर मुक़दमा चलाया जा रहा है। हमने उत्तर प्रदेश सरकार का पक्ष सुना है। हम एमिकस की इस बात से सहमत हैं कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत अपराधों पर मुक़दमा न चलाने का कोई औचित्य नहीं है, खासकर उन अपराधों पर जो नॉन-कंपाउंडेबल हैं, जिनमें जेल की सज़ा ज़रूरी है और जो बार-बार किए गए अपराध हैं। हम इस मामले में राज्य से कुछ और स्पष्टता चाहते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि राज्य एक ऐसा अध्यादेश लाएगा, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा जाए कि सभी नॉन-कंपाउंडेबल अपराध, जिनमें जेल की सज़ा ज़रूरी है और/या बार-बार किए गए अपराध, उन्हें कभी भी खत्म (Abated) नहीं माना गया।"
कोर्ट सड़क सुरक्षा से जुड़े 'एस. राजशेखरन' मामले की सुनवाई कर रहा है।
Case Details: S.RAJASEEKARAN v UNION OF INDIA AND ORS. AND ORS.|W.P.(C) No. 295/2012


