BREAKING | UPI ट्रांज़ैक्शन पर चार्ज के फ़ैसले पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र से मांगी सफ़ाई

  • BREAKING | UPI ट्रांज़ैक्शन पर चार्ज के फ़ैसले पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, केंद्र से मांगी सफ़ाई

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार से एक हलफ़नामा मांगा। इसमें ₹2,000 से ज़्यादा के UPI ट्रांज़ैक्शन (व्यक्ति से मर्चेंट तक) पर चार्ज लगाने के फ़ैसले का आधार बताने को कहा गया।

    चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच वकील अंजन दत्ता की रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में केंद्रीय वित्त मंत्रालय की 14 और 15 सितंबर की उन नोटिफ़िकेशन्स को चुनौती दी गई, जिनमें ₹2,000 से ज़्यादा के कमर्शियल UPI ट्रांज़ैक्शन पर चार्ज लगाने की घोषणा की गई।

    शुरुआत में, केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमन ने कहा कि ये चार्ज 15 अक्टूबर से लागू होंगे। उन्होंने कहा कि 96% ट्रांज़ैक्शन पर यह चार्ज नहीं लगेगा और ज़रूरी सेवाओं के लिए चार्ज की सीमा ₹5 तय की गई।

    ASG ने कहा,

    "यह न तो टैक्स है और न ही फ़ीस।"

    CJI सूर्य कांत ने कहा,

    "हमें ये तथ्य हलफ़नामे पर चाहिए। यह ज़्यादातर एक तकनीकी मुद्दा है।"

    जस्टिस बागची ने पूछा,

    "क्या यह टैक्स है या फ़ीस? अगर फ़ीस नहीं है तो इस वसूली का प्रशासनिक आधार क्या है? सर्विस क्या है?"

    ASG ने साफ़ किया,

    "यह वसूली (Expropriation) नहीं है।"

    उन्होंने कहा कि भारत सरकार इन चार्जेज़ से एक रुपया भी नहीं ले रही है; यह पेमेंट एग्रीगेटर्स और बैंकों के बीच सेटलमेंट फ़ीस है। ASG ने समझाया कि जब बैंक इलेक्ट्रॉनिक ट्रांज़ैक्शन करते हैं तो लागत आती है और क्रेडिट/डेबिट कार्ड ट्रांज़ैक्शन पर चार्ज लगते हैं, जबकि UPI पेमेंट को उन चार्जेज़ से छूट दी गई। हालांकि, पूरे सिस्टम को ठीक से चलाने के लिए ये चार्ज ज़रूरी हैं।

    इसके बाद जस्टिस बागची ने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 269SU का ज़िक्र किया, जिसके तहत तय टर्नओवर सीमा वाले मर्चेंट्स के लिए ग्राहकों को पेमेंट का इलेक्ट्रॉनिक ज़रिया उपलब्ध कराना ज़रूरी है।

    जस्टिस बागची ने यह जानना चाहा,

    "धारा 269 ट्रांसफर की इजाज़त देती है... अगर यह ट्रांसफर की इजाज़त देती है तो एक असेसी (करदाता) से दूसरे असेसी के पास कैश जाता है... तो उस प्राप्ति (Receipt) की प्रकृति क्या है? UPI में इसे कौन प्राप्त करता है?...: हम [कवरेज] पर बात नहीं कर रहे हैं। हम कानूनी प्रभाव (Legal Incidence) पर बात कर रहे हैं। इसका कानूनी प्रभाव किस स्रोत से आता है?"

    जब बेंच ने केंद्र सरकार, RBI और NPCI को नोटिस जारी किया तो याचिकाकर्ता के वकील ने इस फैसले पर रोक लगाने की मांग की। उनका तर्क था कि इस कदम से काले धन के लेन-देन में बढ़ोतरी होगी। हालांकि, बेंच ने फैसले पर रोक लगाने से इनकार किया।

    यह याचिका केंद्र सरकार, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया (NPCI) और UPI एंड सर्विसेज़ स्टीयरिंग कमेटी के खिलाफ दायर की गई।

    याचिकाकर्ता का तर्क है कि कमर्शियल UPI ट्रांज़ैक्शन पर शुल्क लगाने से आम जनता पर व्यापक असर पड़ सकता है, क्योंकि कारोबार इस अतिरिक्त लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल सकते हैं।

    केंद्र सरकार ने एक ऐसा फ्रेमवर्क पेश किया, जो खास तौर पर ज़्यादा मूल्य वाले कमर्शियल UPI ट्रांज़ैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुल्क लगाने की इजाज़त देता है, जबकि व्यक्तियों और छोटे व्यापारियों के लिए UPI पेमेंट को मुफ्त बनाए रखता है। यह कदम 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007' में संशोधन और सितंबर 2026 में वित्त मंत्रालय द्वारा जारी नोटिफिकेशन के बाद उठाया गया।

    वित्त मंत्रालय का 14 सितंबर का नोटिफिकेशन, जो 'पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट' की धारा 10A के तहत जारी किया गया, RuPay डेबिट कार्ड पेमेंट और ₹2,000 तक के UPI ट्रांज़ैक्शन को इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के तौर पर बताता है। इन पर बैंक और सिस्टम प्रोवाइडर पेमेंट करने या प्राप्त करने वाले व्यक्तियों पर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शुल्क नहीं लगा सकते। इसलिए यह नोटिफिकेशन हर UPI पेमेंट पर शुल्क लगाने के बजाय, तय सीमा तक के ट्रांज़ैक्शन को सुरक्षा देता है।

    सरकार ने बाद में साफ़ किया कि नया फ़्रेमवर्क मुफ़्त पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांज़ैक्शन को बनाए रखेगा, चाहे ट्रांसफ़र की गई रकम कितनी भी हो। इसमें यह भी कहा गया कि मर्चेंट को ₹2,000 तक के पेमेंट और छोटे मर्चेंट के लिए ज़ीरो-MDR फ़्रेमवर्क के तहत आने वाले ट्रांज़ैक्शन मुफ़्त रहेंगे।

    मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) एक फ़ीस है, जो मर्चेंट पेमेंट को प्रोसेस करने से जुड़ी होती है। इसे पेमेंट इकोसिस्टम के अंदर इकट्ठा किया जाता है और इसमें शामिल संस्थाओं, जैसे बैंकों और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स के बीच बांटा जाता है। यह सरकार या NPCI द्वारा वसूला जाने वाला टैक्स नहीं है।

    घोषित फ़्रेमवर्क के तहत MDR ₹2,000 से ज़्यादा के खास पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) UPI ट्रांज़ैक्शन पर लागू होगा। स्टैंडर्ड रेट 0.4% है, जिसमें ₹75,000 या उससे ज़्यादा के ट्रांज़ैक्शन के लिए ज़्यादा से ज़्यादा चार्ज ₹300 है। कुछ ज़रूरी और कम मार्जिन वाले सेक्टर, जिनमें रेलवे, टेलीकम्युनिकेशन, इंश्योरेंस, फ़्यूल और खेती से जुड़े सामान शामिल हैं, उन पर ₹2,000 से ज़्यादा के ट्रांज़ैक्शन के लिए ₹5 का फ़्लैट MDR लगेगा। कैपिटल मार्केट ट्रांज़ैक्शन पर 0.02% का कम रेट लगेगा, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 होगी।

    घोषित फ़्रेमवर्क MDR को मर्चेंट पेमेंट इकोसिस्टम के दायरे में रखता है। वित्त मंत्रालय ने बैंकों को सलाह दी कि वे यह पक्का करें कि मर्चेंट इस चार्ज का बोझ ग्राहकों पर न डालें। फ़्रेमवर्क के तहत UPI एप्लीकेशन प्रोवाइडर्स को भी यूज़र्स पर प्लेटफ़ॉर्म फ़ीस या छिपे हुए चार्ज लगाने से मना किया गया।

    सरकार ने कहा कि लगभग 96% मर्चेंट ट्रांज़ैक्शन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, या तो इसलिए कि वे ₹2,000 से कम के हैं या फिर छोटे मर्चेंट के लिए ज़ीरो-MDR प्रावधानों के तहत आते हैं। P2PM कैटेगरी के तहत UPI QR कोड के ज़रिए हर महीने ₹1 लाख तक पाने वाले छोटे मर्चेंट को ज़ीरो MDR का फ़ायदा मिलता रहेगा।

    Case : Anjan Datta v. Union of India | WP(c) Diary No. 57387/2026

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