सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन के लिए महिला अधिकारियों के मूल्यांकन में असमानता: सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, दी राहत

Praveen Mishra

24 March 2026 3:54 PM IST

  • सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन के लिए महिला अधिकारियों के मूल्यांकन में असमानता: सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, दी राहत

    सुप्रीम कोर्ट ने सेना, नौसेना और वायुसेना में महिला शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारियों (SSCOs) के मूल्यांकन में मौजूद गहरी संरचनात्मक असमानताओं को रेखांकित करते हुए कहा है कि पूर्व में लागू नीतियों ने उनके करियर को प्रभावित किया। अदालत ने पाया कि जब महिलाओं को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) के लिए पात्र नहीं माना जाता था, उस दौर में विकसित मूल्यांकन प्रणाली ने उनके प्रदर्शन आकलन को विकृत किया।

    चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन.के. सिंह की खंडपीठ ने तीन अलग-अलग फैसलों में सेना, नौसेना और वायुसेना से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए कहा कि तीनों सेवाओं में वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACRs) और चयन प्रक्रियाएं इस धारणा से प्रभावित थीं कि महिलाओं का दीर्घकालिक करियर नहीं होगा। इस कारण उन्हें प्रशिक्षण, नियुक्तियों और पदोन्नति के अवसरों में बराबरी नहीं मिली।

    अदालत ने कहा कि जब बाद में महिलाओं को स्थायी कमीशन के लिए पात्र बनाया गया, तो यह असमानता स्पष्ट रूप से सामने आई, क्योंकि उनकी तुलना उन पुरुष अधिकारियों से की गई जिनका मूल्यांकन करियर उन्मुख प्रणाली में हुआ था।

    सेना में “कैजुअल ग्रेडिंग” पर टिप्पणी

    सेना से जुड़े मामलों में कोर्ट ने पाया कि महिला अधिकारियों को अक्सर औसत या कम ग्रेडिंग दी गई, क्योंकि उस समय उनके दीर्घकालिक नेतृत्व की संभावना पर ध्यान नहीं दिया जाता था। साथ ही, उन्हें महत्वपूर्ण नियुक्तियों और प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों तक सीमित पहुंच मिली, जिससे उनकी मेरिट प्रभावित हुई।

    नौसेना में पारदर्शिता की कमी

    नौसेना के मामलों में कोर्ट ने चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को गंभीर खामी माना। अदालत ने कहा कि चयन के मानदंड, रिक्तियों की संख्या और मूल्यांकन प्रक्रिया पहले से सार्वजनिक नहीं की गई, जिससे उम्मीदवारों को निष्पक्ष अवसर नहीं मिला।

    वायुसेना में मूल्यांकन को मनमाना ठहराया

    वायुसेना के मामले में कोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रदर्शन रिकॉर्ड का उपयोग करना, जो उस समय तैयार किए गए थे जब महिलाओं के लिए स्थायी कमीशन का विकल्प ही नहीं था, मनमाना और अनुचित है। अदालत ने यह भी पाया कि नई नीति लागू होने के बाद अधिकारियों को आवश्यक योग्यता पूरी करने का पर्याप्त समय नहीं दिया गया।

    राहत और निर्देश

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सभी मामलों में पुनर्नियुक्ति या पुनर्विचार का आदेश नहीं दिया, लेकिन प्रभावित अधिकारियों को पेंशन और अन्य लाभ प्रदान करने के निर्देश दिए। वायुसेना के मामलों में कोर्ट ने एक बारगी राहत देते हुए संबंधित अधिकारियों को 20 वर्ष की सेवा पूर्ण मानकर पेंशन का अधिकार दिया।

    इसके साथ ही अदालत ने भविष्य के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए, जिनमें चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना, मूल्यांकन मानदंडों और रिक्तियों की जानकारी पहले से सार्वजनिक करना शामिल है।

    पूर्व के फैसलों का संदर्भ

    ये निर्णय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के महत्वपूर्ण फैसलों—बबीता पुनिया (2020) और लेफ्टिनेंट कर्नल नितिशा (2021)—के बाद आए हैं, जिनमें महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन के लिए पात्र बनाया गया था।

    निष्कर्ष

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेवा कानून में निष्पक्षता का अर्थ है कि मूल्यांकन प्रणाली वास्तविक करियर अवसरों को ध्यान में रखे। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि लंबे समय से चल रहे विवादों को समाप्त करना आवश्यक है, लेकिन भविष्य में ऐसी संरचनात्मक असमानताओं को रोकने के लिए संस्थागत सुधार जरूरी हैं।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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