'उनकी ज़िंदगी दूसरों में ज़िंदा है': सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के अंग दान करने के लिए उनके परिवार की तारीफ़ की

Shahadat

16 May 2026 9:55 AM IST

  • उनकी ज़िंदगी दूसरों में ज़िंदा है: सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के अंग दान करने के लिए उनके परिवार की तारीफ़ की

    सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के परिवार की तारीफ़ की, जिन्होंने उनकी मौत के बाद उनकी कॉर्निया और हार्ट वाल्व दान किए। यह तारीफ़ कोर्ट के उस फ़ैसले के कुछ हफ़्तों बाद आई, जिसमें कोर्ट ने 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' को मान्यता देने के बाद, देश के पहले 'पैसिव यूथेनेशिया' (इच्छा-मृत्यु) मामले में जीवन बचाने वाला इलाज हटाने की इजाज़त दी थी।

    कोर्ट ने कहा,

    "हरीश ने इस नश्वर दुनिया को अपनी शर्तों पर अलविदा कहा, उनके आस-पास प्यार और करुणा थी। अपने गहरे दुख के बावजूद, उनके परिवार ने निस्वार्थ भाव से उनकी कॉर्निया और हार्ट वाल्व दान करने का उदार फ़ैसला लिया। इस तरह उनकी ज़िंदगी दूसरों में ज़िंदा है। उनकी विरासत उन लोगों की ज़िंदगी के ज़रिए ज़िंदा रहेगी, जिनकी जान उन्होंने बचाई।"

    AIIMS की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने पाया कि हरीश की मौत 24 मार्च को AIIMS के 'पैलिएटिव केयर यूनिट' में हुई। उन्हें कोर्ट के 11 मार्च के फ़ैसले के बाद वहां शिफ़्ट किया गया। वे लगभग 10 दिनों तक पैलिएटिव केयर में रहे।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि उन्हें अपनी शर्तों पर दुनिया से जाने देना और उनके कष्टों को कम करना, उनकी गरिमा को बनाए रखना था।

    कोर्ट ने कहा,

    "ट्यूब और मशीनों के जाल से उनकी शांतिपूर्ण विदाई, जीवन और मृत्यु दोनों में गरिमा को दर्शाती है। यह इस बात की भी याद दिलाती है कि मेडिकल साइंस की भी अपनी सीमाएं हैं। किसी व्यक्ति की ज़िंदगी को ऐसे तरीकों से लंबा खींचना, जिन्हें वह खुद नहीं चुनता, हमेशा सच्ची देखभाल नहीं होती। किसी को अपनी शर्तों पर दुनिया से जाने देना और उनके कष्टों को कम करना, उनकी गरिमा को उसके सबसे सच्चे अर्थों में बनाए रखना है।"

    11 मार्च, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के लिए 'क्लीनिकली एडमिनिस्टर्ड न्यूट्रिशन' (नली के ज़रिए दिया जाने वाला पोषण) हटाने की इजाज़त दी थी। हरीश 2012 में एक इमारत से गिरने के बाद सिर में चोट लगने के कारण तब से ही 'वेजिटेटिव स्टेट' (कोमा जैसी स्थिति) में थे। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2018 के 'कॉमन कॉज़' फ़ैसले के तहत गठित दो मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर भरोसा किया; दोनों ही रिपोर्ट में यह पाया गया कि उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी।

    मार्च के फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था कि हरीश की ज़िंदगी को, उसमें कोई सुधार न होने के बावजूद, बेवजह लंबा खींचना उसके अपने हित में नहीं था। कोर्ट ने दुर्घटना के बाद के 13 सालों में हरीश के परिवार द्वारा दी गई देखभाल और सहयोग की सराहना की।

    अपने ताज़ा आदेश में, जिसमें कोर्ट ने पिछले फ़ैसले के आधार पर हरीश राणा की मौत का ज़िक्र किया, कोर्ट ने कहा कि उनकी मौत उनकी अपनी शर्तों पर हुई। कोर्ट ने उनके परिवार की इस बात के लिए भी सराहना की कि उन्होंने हरीश की मौत के बाद उनकी कॉर्निया और हार्ट वाल्व दान कर दिए।

    कोर्ट ने कहा कि यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि मेडिकल साइंस की भी अपनी सीमाएं होती हैं। किसी व्यक्ति की ज़िंदगी को ऐसे तरीकों से लंबा खींचना, जिन्हें वह खुद न चुनता, हमेशा सच्ची देखभाल नहीं होती। कोर्ट ने आगे कहा कि हरीश की कहानी और इस मुक़दमे ने सभी को, यहां तक कि दोनों जजों को भी, बहुत कुछ सिखाया है।

    कोर्ट ने AIIMS के डायरेक्टर, डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ़ का आभार जताया, जिन्होंने हरीश के आखिरी दिनों में उनकी देखभाल की। ​​कोर्ट ने यह भी कहा कि मेडिकल टीम ने यह सुनिश्चित किया कि हरीश को कम से कम तकलीफ़ हो और उनकी मौत शांति से हो।

    कोर्ट ने एमिक्स क्यूरी (कोर्ट के सलाहकार वकील) रश्मि नंदकुमार और उनकी टीम का भी शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने इस मामले में कोर्ट की मदद की। साथ ही एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और उनकी टीम का भी शुक्रिया अदा किया, जिन्होंने पूरी कार्यवाही के दौरान पूरा सहयोग दिया। कोर्ट ने उन लॉ क्लर्कों की भी सराहना की, जिन्होंने इस संवेदनशील मामले पर काम किया।

    कोर्ट ने भाटी से 22 जुलाई, 2026 तक एक कंप्लायंस रिपोर्ट (पालन रिपोर्ट) दाख़िल करने को कहा। इस तारीख़ को यह मामला अगली बार सुनवाई के लिए आएगा, ताकि यह देखा जा सके कि कोर्ट के उस निर्देश का पालन हुआ है या नहीं, जिसमें देश भर के हाई कोर्ट्स को यह सुनिश्चित करने को कहा गया कि पैसिव यूथेनेशिया (इच्छा-मृत्यु) के मामलों में, जहां मेडिकल बोर्ड सर्वसम्मति से लाइफ़ सपोर्ट हटाने या रोकने की मंज़ूरी देते हैं, वहाँ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट्स को अस्पताल से सूचना मिले।

    Case Title – Harish Rana v. Union of India

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