सुप्रीम कोर्ट UGC स्टूडेंट शिकायत निवारण विनियम 2023 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत

Shahadat

16 May 2026 10:04 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट UGC स्टूडेंट शिकायत निवारण विनियम 2023 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक याचिका पर नोटिस जारी करने से इनकार किया, जहां तक वह 2012 के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विनियमों को चुनौती देती थी। कोर्ट ने याचिका पर नोटिस को केवल उस हद तक सीमित रखा, जहाँ तक वह UGC के 2023 के विनियमों के प्रावधानों को चुनौती देती है।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की खंडपीठ ने सीनियर एडवोकेट जे. साई दीपक (याचिकाकर्ताओं की ओर से) की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। इस मामले को कोर्ट के समक्ष लंबित इसी तरह की अन्य याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध किया गया।

    शुरुआत में, खंडपीठ ने 2012 के विनियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने में अनिच्छा व्यक्त की। खंडपीठ ने टिप्पणी की कि 2026 के विनियमों पर रोक लगाते समय कोर्ट ने निर्देश दिया था कि इस बीच 2012 के विनियम ही लागू रहेंगे।

    बता दें, कोर्ट विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा) विनियम, 2026 को चुनौती देने वाली कई रिट याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई कर रहा है। इस साल जनवरी में इन विनियमों को स्थगित रखने का आदेश दिया गया। साथ ही यह निर्देश भी दिया गया था कि इस बीच 2012 के विनियम ही लागू रहेंगे।

    जनवरी में सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने 2026 के विनियमों के बारे में कुछ आपत्तियां व्यक्त की थीं, जिन्हें "सामान्य वर्गों" के प्रति भेदभावपूर्ण होने के आधार पर चुनौती दी गई। कोर्ट ने सुझाव दिया था कि इन विनियमों की समीक्षा प्रख्यात न्यायविदों की एक समिति द्वारा की जानी चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ये विनियम प्रथम दृष्टया "अस्पष्ट" हैं और "इनका दुरुपयोग किया जा सकता है"।

    उच्च शिक्षा संस्थानों में "समानता" को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तैयार किए गए 2026 के विनियमों का कुछ वर्गों द्वारा विरोध किया जा रहा है। जहां एक ओर गैर-आरक्षित श्रेणियों के सदस्य इन विनियमों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं, वहीं आरक्षित श्रेणियां किसी भी प्रकार की वापसी का विरोध कर रही हैं।

    वर्तमान याचिका में क्या कहा गया?

    याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2012 के विनियमों को 2026 के विनियमों के विकल्प के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। उनका कहना है कि 2012 के विनियमों में मौजूद "कमियों" के कारण ही 2026 के विनियमों को तैयार किया गया, लेकिन 2026 के विनियमों में भी अस्पष्टताएं हैं और इनका दुरुपयोग किया जा सकता है।

    इसके अलावा, यह भी कहा गया कि भेदभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से बनाया गया कोई भी कानून उत्पीड़न या और अधिक भेदभाव का माध्यम नहीं बनना चाहिए, और न ही उसमें लोगों के किसी विशेष वर्ग के पक्ष या विपक्ष में कोई पूर्वधारणाएं शामिल होनी चाहिए।

    आगे कहा गया,

    "इस कसौटी पर कसने पर 2012 और 2026, दोनों ही विनियमों में गंभीर संवैधानिक कमियां पाई जाती हैं, जो उस मूल उद्देश्य को ही विफल कर देती हैं, जिसे वे आगे बढ़ाने का दावा करते हैं।"

    याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 2012 और 2026, दोनों ही विनियम अस्पष्टता, मनमानी, प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की कमी और दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा उपायों के अभाव से ग्रस्त हैं। इसके अलावा, इनके लागू किए जाने के समर्थन में कोई बड़े पैमाने का अनुभवजन्य डेटा भी उपलब्ध नहीं है।

    2026 के विनियमों को अन्य बातों के साथ-साथ निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी गई:

    - विनियम 3(c) भेदभाव के दायरे को सीमित करता है, क्योंकि यह भेदभाव को "जाति-आधारित भेदभाव" के रूप में उप-वर्गीकृत करता है।

    - "जाति-आधारित भेदभाव" को परिभाषित करने के लिए 'अन्य पिछड़ा वर्ग' (OBC) को एक श्रेणी के रूप में मानना, किसी भी बोधगम्य अंतर या प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्य के साथ किसी तार्किक संबंध से रहित है। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने 'एम.आर. बालाजी बनाम मैसूर राज्य' मामले में यह टिप्पणी की थी कि OBC का वर्गीकरण सामाजिक और शैक्षिक, दोनों ही आधारों पर किया जाना चाहिए। इसे पूरी तरह से जाति के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता।

    - विनियम 5(7), जो 'समता समितियों' (Equity Committees) के गठन का प्रावधान करता है, उसमें कुछ विशिष्ट वर्गों—जैसे OBC, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, आदि—के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य बनाया गया है; ऐसा करके यह "सभी वर्गों के समान प्रतिनिधित्व की आवश्यकता की अनदेखी करता है"।

    - ये विनियम भेदभावपूर्ण कार्यों या उत्पीड़न के लिए किसी भी प्रकार के दंड/सज़ा का प्रावधान नहीं करते हैं। इसका निर्धारण 'संस्था प्रमुख' द्वारा किया जाना है, जो कि "अस्वीकार्य उप-प्रत्यायोजन" (impermissible sub-delegation) की श्रेणी में आता है।

    2023 के विनियमों को निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी गई:

    - विनियम 3(f)(iv) के अनुसार, भेदभाव के विरुद्ध शिकायत केवल कुछ विशिष्ट वर्गों के लोगों द्वारा ही की जा सकती है—जैसे SC, ST, OBC, महिलाएँ, अल्पसंख्यक, या दिव्यांग व्यक्ति। सभी वर्गों के साथ समान व्यवहार न करना अपने आप में भेदभावपूर्ण है। इसलिए यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करता है।

    - भेदभाव या उत्पीड़न के लिए सज़ा/जुर्माना तय करने का काम लोकपाल (Ombudsperson) पर छोड़ दिया गया। यह अधिकार बिना किसी दिशा-निर्देश या नीतिगत ढांचे के दिया गया।

    2012 के नियमों को इन आधारों पर चुनौती दी गई:

    - नियम 3 में उच्च शिक्षण संस्थानों द्वारा भेदभाव के खिलाफ उठाए जाने वाले कदमों के बारे में सामान्य निर्देश होने के बावजूद, उप-खंड (2) में केवल SC/ST श्रेणियों के छात्रों की सुरक्षा के लिए उठाए जाने वाले कदमों के बारे में ही खास निर्देश दिए गए। UGC अनुच्छेद 14, 15 और 16 से बंधा हुआ है, इसलिए उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सुरक्षा का दायरा सभी तक फैला हो।

    - UGC अधिनियम, UGC के नियम बनाने के अधिकारों को उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) को आगे सौंपने (sub-delegation) की कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है। इसलिए 2012 के नियम उस हद तक असंवैधानिक हैं, जिस हद तक वे उच्च शिक्षण संस्थानों को नियम बनाने की शक्तियां प्रदान करते हैं [जैसे कि नियम 3(2)(h) के तहत]।

    - ये नियम भेदभाव या उत्पीड़न के लिए सज़ा/जुर्माना तय करने का काम उच्च शिक्षण संस्थानों पर ही छोड़ देते हैं, बिना कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए। वे केवल इतना कहते हैं कि सज़ा, भेदभाव/उत्पीड़न की प्रकृति के अनुरूप होनी चाहिए।

    Case Title: SANTHOSH TAMILARASAN AND ANR. Versus UNION OF INDIA AND ANR., W.P.(C) No. 457/2026

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