सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर अब 17 मार्च को होगी सुनवाई

Shahadat

10 March 2026 7:34 PM IST

  • सोनम वांगचुक की हिरासत को चुनौती देने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर अब 17 मार्च को होगी सुनवाई

    सुप्रीम कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका की सुनवाई टाल दी। इस याचिका में लद्दाख के एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत निवारक हिरासत में रखे जाने को गैर-कानूनी घोषित करने की मांग की गई। यह याचिका उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि आंगमो ने दायर की।

    जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने सुनवाई अगले मंगलवार तक के लिए टाल दी। कोर्ट को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने बताया कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की तबीयत ठीक नहीं है और वे आज कोर्ट नहीं आ पाए।

    इससे पहले 26 फरवरी को भी इस मामले की सुनवाई टाल दी गई। तब कोर्ट ने कहा था कि अगली सुनवाई में वह किसी भी हाल में इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लेगा।

    सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल (आंगमो की ओर से) ने इस पर कुछ खास नहीं कहा, लेकिन मौखिक रूप से टिप्पणी की कि इससे पूरे देश में एक "गलत संदेश" जा रहा है।

    बता दें, मेहता ने वांगचुक के भाषणों के अनुवाद को लेकर बेंच द्वारा उठाए गए मुद्दे पर अपनी बात रखने की इच्छा जताई थी। इससे पहले, जवाबी दलीलों के दौरान सिब्बल ने यह बात उठाई थी कि हिरासत आदेश में वांगचुक के जिन कथित भड़काऊ बयानों का ज़िक्र किया गया, वे केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए अनुवादित भाषणों की सूची (chart) में मौजूद नहीं थे।

    सिब्बल ने दलील दी कि हिरासत का आदेश ऐसे तथ्यों पर आधारित था, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। उन्होंने कहा कि वांगचुक ने कभी यह नहीं कहा कि वह सरकार को "उखाड़ फेंकना" चाहते हैं, और न ही उन्होंने ऐसे कोई अन्य बयान दिए, जिनका आरोप उन पर लगाया गया।

    सिब्बल के अनुसार, जब ASG नटराज ने केंद्र सरकार का जवाब पेश किया, तो केंद्र द्वारा आधार बनाए गए अनुवादित भाषणों में ये बयान कहीं भी नज़र नहीं आए।

    इसके बाद बेंच ने अनुवाद में पाई गई इस विसंगति पर सवाल उठाए।

    जस्टिस कुमार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस दौर में अनुवाद की सटीकता लगभग 98% होती है। वहीं, जस्टिस वराले ने टिप्पणी की कि वांगचुक के भाषणों के अनुवाद में किसी भी तरह की दुर्भावना नहीं होनी चाहिए। इसके बाद बेंच ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह भाषणों का सही और सटीक अनुवाद रिकॉर्ड पर पेश करे।

    Case Details: GITANJALI J. ANGMO v UNION OF INDIA AND ORS|W.P.(Crl.) No. 399/2025

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