गुजरात SEZ से ली गई बिजली पर कस्टम ड्यूटी छूट — सुप्रीम कोर्ट ने अडाणी पावर के पक्ष में फैसला दिया
Praveen Mishra
5 Jan 2026 6:06 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने आज (5 जनवरी) अडाणी पावर लिमिटेड द्वारा गुजरात हाईकोर्ट के वर्ष 2019 के आदेश के खिलाफ दायर अपील स्वीकार करते हुए कंपनी को राहत दी। गुजरात हाईकोर्ट ने 2019 में यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि कंपनी ने कस्टम ड्यूटी लगाने वाली बाद की अधिसूचनाओं को चुनौती नहीं दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को गलत ठहराते हुए कहा कि 2015 का निर्णय सिद्धांत रूप से बाद की अवधि पर भी लागू होता है।
अडाणी पावर लिमिटेड मुंद्रा पोर्ट स्थित अपने कोयला-आधारित थर्मल पावर प्लांट से विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) से घरेलू टैरिफ क्षेत्र (DTA) में बिजली आपूर्ति करता है। वर्ष 2010 में सरकार ने 26 जून 2009 से प्रतिगामी प्रभाव (retrospective effect) के साथ बिजली पर कस्टम ड्यूटी लगाई थी। गुजरात हाईकोर्ट ने 2015 में इस ड्यूटी को मनमाना और अवैध ठहराते हुए कहा था कि 26.06.2009 से 15.09.2010 तक इस अवधि के लिए कस्टम ड्यूटी नहीं लगाई जा सकती, क्योंकि बिजली पर ड्यूटी केवल विधिवत, भावी (prospective) कानून के माध्यम से ही लगाई जा सकती है। अदालत ने यह भी माना था कि कच्चे माल पर पहले ही टैक्स वसूला जा चुका है, इसलिए यह दोहरी कराधान (double taxation) का मामला बनता है।
बाद में जब अधिकारियों ने आगे की अवधि के लिए भी कस्टम ड्यूटी लगा दी, तो अडाणी पावर फिर से हाईकोर्ट पहुँची। किन्तु 2019 में हाईकोर्ट ने राहत देने से यह कहते हुए इनकार किया कि कंपनी ने 2010 और 2012 की अधिसूचनाओं को विशेष रूप से चुनौती नहीं दी है। इसके विरुद्ध कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुँची।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की खंडपीठ ने चार प्रमुख प्रश्नों पर विचार किया —
2015 के निर्णय की वास्तविक सीमा और प्रभाव क्या था?
15 सितंबर 2010 से 16 नवंबर 2016 के बीच क्या कोई ऐसा वैधानिक या तथ्यात्मक परिवर्तन हुआ था, जो अलग परिणाम को उचित ठहराता?
क्या 2019 में हाईकोर्ट यह कहने के लिए सही था कि बाद की अधिसूचनाओं को अलग-अलग चुनौती दिए बिना राहत नहीं दी जा सकती?
क्या समान पीठ (coordinate bench) होते हुए हाईकोर्ट 2015 के निर्णय के प्रभाव को सीमित कर सकती थी?
खंडपीठ ने कहा कि 2015 का निर्णय सिद्धांततः बाद की अवधि पर भी लागू था और वह केवल विशेष अधिसूचना या सीमित अवधि तक बंधा नहीं था। बाद की अधिसूचनाएँ (नं. 91/2010 और 26/2012) कोई नया कर नहीं लाती थीं, बल्कि उसी कर को बदले हुए दर (arithmetical rate) के साथ जारी रखती थीं। अतः केवल दर बदलने से कर की वैधता नहीं बन जाती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा —
संवैधानिक न्यायालय अपने पूर्व निर्णयों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं।
समान परिस्थितियों में बार-बार अलग-अलग चुनौती की औपचारिकता अनिवार्य नहीं की जा सकती।
2010 से 2016 के बीच ऐसा कोई तथ्यात्मक या कानूनी परिवर्तन नहीं था जो 2015 के निर्णय से अलग निष्कर्ष को सही ठहराए।
2019 की डिवीजन बेंच 2015 के निर्णय का पालन करने के लिए बाध्य थी, या संदेह होने पर मामला बड़ी पीठ को भेजना चाहिए था।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जब खुद कर-वसूली को 'कानून के अधिकार के बिना' घोषित कर दिया गया है, तो राज्य सरकार उस राशि को अपने पास नहीं रख सकती। अवैध वसूली की वापसी (restitution) आवश्यक परिणाम है।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित अवधि के दौरान बिजली पर वसूली गई कस्टम ड्यूटी — जो 2010 की अधिसूचनाओं और समान साधनों के माध्यम से लागू की गई थी — कानून के अधिकार के बिना थी।
अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के 28.06.2019 के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि कस्टम विभाग के क्षेत्राधिकारयुक्त आयुक्त द्वारा सत्यापन एवं रिफंड की प्रक्रिया 8 सप्ताह के भीतर पूरी की जाए।
निष्कर्षतः, अपील स्वीकार की गई और अडाणी पावर को अवैध रूप से वसूली गई राशि की वापसी का अधिकार प्रदान किया गया।

