डकैती एवं हत्या के लिए मौत की सजा का सामना कर रहे व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी
LiveLaw News Network
6 Jan 2021 2:04 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने डकैती एवं हत्या के मामले में मृत्युदंड का सामना कर रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया है।
इस मामले में, ट्रायल कोर्ट ने छह अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा- 396 एवं 412 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक कानून) की धारा 3(2)(पांच) के तहत दंडनीय अपराधों का दोषी ठहराया था। उनमें से एक दोषी हरि ओम उर्फ 'हीरो' के लिए फांसी की सजा मुकर्रर की गयी थी। उन लोगों पर एक महिला और उसके तीन बच्चों (जिनमें से दो नाबालिग थे) की हत्या का आरोप था।
अपील और डेथ रिफरेंस में, हाईकोर्ट ने हरि ओम का मृत्युदंड बरकरार रखा था तथा दो अन्य अभियुक्तों की जेल की सजा बहाल रखी थी, जबकि अन्य तीन अभियुक्तों को बरी कर दिया था। उसके बाद हरि ओम सहित तीनों दोषी व्यक्तियों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की खंडपीठ ने अपील की सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में छोटे बच्चे (मृतका के सबसे छोटे बेटे) की गवाही पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं माना जा सकता, जो इस घटना के दौरान करीब पांच वर्ष का था। कोर्ट ने रिकॉर्ड में दर्ज साक्ष्यों की फिर से समीक्षा करने के बाद कहा कि बच्चे की गवाही में कुछ विसंगतियां अथवा कमियां हैं।
"यदि हम यह मान भी लेते हैं कि अभियोजन पक्ष का गवाह संख्या 5 (उज्ज्वल) मामले के अभियुक्त हरि ओम का चेहरा पहचानता था और इस तथ्य को भी मान लें कि घटना उसके घर के अंदर ही हुई थी, जाहिर है वह वहां स्वाभाविक तौर पर मौजूद होगा, लेकिन फिर भी इस मसले पर कि क्या उज्ज्वल ने घटना को देखा था, रिकॉर्ड में दर्ज साक्ष्यों की विसंगतियों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता।"
"राधे श्याम बनाम राजस्थान सरकार मामले में एक बच्चे की गवाही को भरोसे लायक नहीं माना गया था, क्योंकि गवाह के बयान में विसंगतियां थीं और अभियोजन पक्ष के अन्य गवाहों के बयानों से उसका बयान मेल नहीं खा रहा था। ऐसी परिस्थितियों में इस मामले में उस बच्चे के बयान पर भरोसा करना सुरक्षित नहीं होगा, जिसकी उम्र इस घटना के दौरान महज पांच साल की थी।"
कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त हरि ओम को भारतीय दंड संहिता की धारा 396 के तहत दोषी साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य रिकॉर्ड में मौजूद नहीं हैं और वह संदेह के लाभ का हकदार है। अन्य दो अभियुक्त के बारे में, बेंच ने कहा कि फिंगर प्रिंट्स के अलावा उनके खिलाफ रिकॉर्ड में कोई और साक्ष्य मौजूद नहीं है।
कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए कहा,
"यदि हम यह मान भी लें कि मृतका के घर से लिये गये अंगुलियों के निशान दोनों अभियुक्तों के थे तो भी उसकी प्रामाणिकता साबित करने वाले साक्ष्यों के अभाव में उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए ये अभियुक्त संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं।"
केस का नाम : हरि ओम उर्फ हीरो बनाम उत्तर प्रदेश सरकार [क्रिमिनल अपील संख्या 1256 / 2017]
कोरम : जस्टिस उदय उमेश ललित, न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी
वकील : वरिष्ठ अधिवक्ता बी एच मार्लापल्ले (न्याय मित्र), अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी
साइटेशन : एल एल 2021 एससी 6
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