दिल्ली में रेप केस पर स्वतः संज्ञान | सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक जगहों को सुरक्षित बनाने के निर्देश दिए, 4 हफ़्ते में सुरक्षा ऑडिट का आदेश
Shahadat
29 Sept 2026 10:00 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (28 सितंबर) को Delhi-NCR में सार्वजनिक जगहों को सुरक्षित बनाने के लिए दिल्ली पुलिस और नागरिक अधिकारियों को तुरंत कुछ निर्देश जारी किए। इन निर्देशों में संवेदनशील इलाकों का सर्वे, ज़िलेवार संवेदनशीलता का नक्शा, पहचाने गए सभी पार्कों में गश्त (पेट्रोलिंग) और लाइटिंग व CCTV ऑडिट शामिल हैं। ये सभी काम चार हफ़्ते के अंदर पूरे किए जाने हैं।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने यह निर्देश उस स्वतः संज्ञान मामले में जारी किए, जो इस इलाके में नाबालिग लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों की कई घटनाओं के बाद दर्ज किया गया।
बेंच ने कहा कि सार्वजनिक जगहों को "बहुत कम रोशनी, खराब निगरानी, ढीली गश्त या प्रशासन की अन्य ऐसी कमियों की वजह से, जिन्हें रोका जा सकता था, ज़्यादा जोखिम वाले इलाके नहीं बनने दिया जा सकता।"
बेंच ने आगे कहा,
"बिना जवाबदेही के चिंता जताना, बड़े संस्थागत सवाल का जवाब देने के लिए काफी नहीं है।"
कोर्ट ने निर्देश दिया कि चार हफ़्ते के अंदर ये उपाय किए जाएं:
दिल्ली पुलिस कमिश्नर को हर पुलिस ज़िले के लिए खास टीमें बनानी होंगी, जिनकी अगुवाई डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस (DSP) के पद से नीचे का अधिकारी न करे। ये टीमें संवेदनशील इलाकों का निरीक्षण करेंगी, जिनमें बाहरी इलाके, सुनसान जगहें, पार्क, ट्रांसपोर्ट हब, बाज़ार और शिक्षण संस्थान वाले इलाके शामिल हैं। ऑडिट नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के डेटा, स्थानीय खुफिया जानकारी, पिछली और मौजूदा शिकायतों और पहले हुई घटनाओं पर आधारित होना चाहिए। टीमों को ऐसी जगहों की पहचान करनी होगी, जहां खराब रोशनी, निगरानी की कमी, अपर्याप्त गश्त, लावारिस इमारतें या खराब एक्सेस कंट्रोल (आवाजाही पर नियंत्रण) के कारण अपराध का खतरा बढ़ सकता है।
ज़िलेवार संवेदनशीलता का नक्शा तैयार करके आस-पास के पुलिस स्टेशनों के साथ साझा किया जाना चाहिए ताकि बार-बार होने वाले अपराधों और आदतन अपराधियों की जानकारी "सिर्फ़ एक पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र तक ही सीमित न रहे।"
पहचाने गए सभी सार्वजनिक पार्कों और संवेदनशील इलाकों में हर समय, खासकर शाम और सुबह-सुबह, गश्त और सुरक्षा इंतज़ाम किए जाने चाहिए। हर जगह के लिए एक तय अधिकारी ज़िम्मेदार होगा और अधिकारियों को समय-समय पर निरीक्षण का तरीका तय करना होगा।
ब्लाइंड स्पॉट (जहां नज़र नहीं जाती) को खत्म करने के लिए सभी सार्वजनिक पार्कों और संवेदनशील इलाकों में तुरंत ऑडिट किया जाना चाहिए। काम न करने वाले CCTV कैमरों और लाइटों को जल्द से जल्द ठीक या चालू किया जाना चाहिए, जहां भी नागरिकों को कमी महसूस हो या वे इसकी रिपोर्ट करें, वहां अतिरिक्त लाइटें और कैमरे लगाए जाने चाहिए। इसी तरह का ऑडिट मेट्रो स्टेशनों, बस स्टॉप, बस टर्मिनलों, रेलवे स्टेशनों और अन्य प्रमुख सार्वजनिक परिवहन सुविधाओं का भी किया जाना चाहिए, खासकर उन जगहों का जो संवेदनशील इलाकों में या उनके पास हैं।
अधिकारियों को जानकारी के अतिरिक्त स्रोत के रूप में मौजूदा शिकायत निवारण प्रणालियों, जैसे कि सीएम जन सुनवाई पोर्टल, का इस्तेमाल करना चाहिए। नागरिक अपर्याप्त रोशनी, CCTV कवरेज की कमी, अंधेरी या सुनसान जगहों और असुरक्षित एंट्री-एग्जिट पॉइंट्स की रिपोर्ट कर सकते हैं। हर रिपोर्ट को जांच के लिए संबंधित अधिकारी के पास भेजा जाना चाहिए और तय समय-सीमा के भीतर उस पर कार्रवाई की जानी चाहिए। शिकायत करने वाले को अपनी शिकायत की स्थिति और उस पर की गई कार्रवाई का पता लगाने की सुविधा होनी चाहिए।
पुलिस कमिश्नर को नागरिक और इंफ्रास्ट्रक्चर एजेंसियों के साथ मिलकर समय-समय पर इन शिकायतों का विश्लेषण करना चाहिए और बार-बार आने वाली या पुष्टि की गई शिकायतों को वल्नरेबिलिटी मैपिंग (संवेदनशीलता की मैपिंग) में शामिल करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि नागरिकों की शिकायतों को "सिर्फ अलग-थलग शिकायतें नहीं माना जाना चाहिए।"
गश्त को और तेज़ किया जाना चाहिए, जिसमें नियमित अंतराल पर मोबाइल चेक-पोस्ट और गाड़ियों की जांच शामिल हो। पुलिस को 'अभिषेक गोयनका बनाम भारत संघ' मामले में दिए गए निर्देशों को सख्ती से लागू करना चाहिए; इस मामले में कहा गया कि गाड़ियों की खिड़कियों पर काली, टिंटेड या सोलर-कंट्रोल फिल्में लगाने से अंदर की गतिविधियों को छिपाकर गंभीर अपराधों को अंजाम देना आसान हो जाता है। पुलिस को नियमों का पालन न करने वाली गाड़ियों को ज़ब्त करना चाहिए, खिड़कियों पर लगी अवैध कोटिंग हटानी चाहिए और बिना किसी देरी के दोषियों पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए।
इसके अलावा, दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को दिल्ली में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) और POCSO स्पेशल कोर्ट के बारे में चार हफ़्ते के भीतर हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा गया। इसमें चालू अदालतों की संख्या, हर अदालत में लंबित मामलों की संख्या, पिछले तीन सालों में मामलों के निपटारे की सालाना दर और अंतिम निपटारे में लगने वाले औसत समय की जानकारी होनी चाहिए।
हाईकोर्ट को यह भी निर्देश दिया गया कि वह इन घटनाओं से जुड़े मामलों को किसी खास फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट को सौंपे और यह सुनिश्चित करे कि मुकदमों का निपटारा जल्द-से-जल्द हो, और कोशिश की जाए कि सुनवाई शुरू होने के एक साल के भीतर मामला सुलझा लिया जाए।
बेंच ने अधिकारियों से यह भी कहा कि वे ज़मीनी स्तर पर मौजूदा सिस्टम कैसे काम करते हैं, इस पर एक पूरी स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करें। इनमें शामिल हैं: यौन अपराधियों का राष्ट्रीय डेटाबेस, यौन अपराधों के लिए जांच ट्रैकिंग सिस्टम (ITSSO), मिशन शक्ति, इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम (ERSS) नंबर 112, महिला हेल्पलाइन 181, सेफ सिटी प्रोजेक्ट, पुलिस स्टेशनों में महिला हेल्प डेस्क और वन स्टॉप सेंटर।
हर एक के लिए, अधिकारियों को यह बताना होगा कि क्या वह चालू है, उसमें कौन-सा इलाका और कितनी आबादी शामिल है, ज़िम्मेदार अधिकारी कौन है, पिछले तीन सालों में कितनी शिकायतें या मामले देखे गए, और औसत रिस्पॉन्स टाइम क्या है।
बेंच ने अधिकारियों से हेल्पलाइन और सपोर्ट सिस्टम का प्रचार करने और स्कूलों, कॉलेजों, शिक्षण संस्थानों और रिहायशी इलाकों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम चलाने के लिए भी कहा। ज़िला प्रशासन को मीडिया हाउस के साथ बैठक करने का निर्देश दिया गया ताकि सुरक्षा उपायों और हेल्पलाइन नंबरों के लिए अखबार में एक खास कॉलम और प्रसारण का समय तय किया जा सके, वह भी बिना किसी शुल्क के (प्रो बोनो)।
इसने मीडिया को "ज़िम्मेदार, संवेदनशील और संयमित पत्रकारिता" करने की अपनी ज़िम्मेदारी की भी याद दिलाई, और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 72 और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 23 का भी ज़िक्र किया, जो पीड़ितों की पहचान ज़ाहिर करने पर रोक लगाते हैं।
ये गाइडलाइंस आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ कथित गैंगरेप, स्वरूप नगर में एक टीनएज लड़की के साथ कथित गैंगरेप और हत्या, और चलती स्लीपर बस में एक नाबालिग लड़की के साथ कथित यौन उत्पीड़न की घटनाओं के संदर्भ में जारी की गईं; वह बस ग्रेटर नोएडा से दिल्ली तक 47 किलोमीटर से ज़्यादा चली और उसे कहीं रोका नहीं गया।
बेंच ने आगे साफ़ किया कि वह किसी व्यक्ति की गलती का आकलन नहीं कर रही है, बल्कि "उन व्यापक संस्थागत विफलताओं" को देख रही है जो किसी एक मामले से कहीं ज़्यादा बड़ी हैं।
ऊपर बताई गई बातों के आधार पर दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव, दिल्ली के पुलिस कमिश्नर और दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को नोटिस जारी किया गया।
इस मामले में सीनियर एडवोकेट लिज़ मैथ्यू को 'एमिक्स क्यूरी' (अदालत की मदद करने वाला वकील) नियुक्त किया गया।
अब इस मामले की सुनवाई 5 अक्टूबर, 2026 को होगी।
Case: In Re: Recent Rape Incidents in Delhi NCR

