सुप्रीम कोर्ट ने राज्य-यूटी को 4 महीने में नियम बनाकर सिख विवाह दर्ज करने का दिया निर्देश

Praveen Mishra

18 Sept 2025 4:15 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट ने राज्य-यूटी को 4 महीने में नियम बनाकर सिख विवाह दर्ज करने का दिया निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश में 17 राज्यों और 7 केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे आनंद विवाह अधिनियम, 1909 (Anand Marriage Act) के तहत सिख विवाहों (आनंद कारज) के पंजीकरण के लिए नियम चार माह में बनाएँ। कोर्ट ने कहा कि नियम न बनाने से सिख नागरिकों के साथ असमान व्यवहार हो रहा है और यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि जब कानून आनंद कारज को मान्यता देता है तो पंजीकरण की व्यवस्था भी होनी चाहिए। जब तक राज्य अपने नियम नहीं बनाते, तब तक सभी आनंद कारज विवाह मौजूदा सामान्य विवाह कानूनों (जैसे विशेष विवाह अधिनियम) के तहत दर्ज किए जाएँ और यदि पक्षकार चाहें तो प्रमाणपत्र में “आनंद कारज” का उल्लेख भी किया जाए।

    याचिका अमनजोत सिंह चड्ढा ने दायर की थी, जिसमें बताया गया कि कई राज्यों ने नियम नहीं बनाए हैं, जिससे अलग-अलग राज्यों में सिख दंपतियों को प्रमाणपत्र पाने में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2012 में धारा 6 जोड़ने के बाद राज्यों पर यह कानूनी बाध्यता है कि वे पंजीकरण की व्यवस्था करें।

    कोर्ट ने कहा कि विवाह अमान्य नहीं होगा, लेकिन प्रमाणपत्र उत्तराधिकार, गुज़ारा भत्ता, बीमा, संपत्ति और पारिवारिक अधिकारों के लिए बेहद ज़रूरी है।

    कोर्ट के प्रमुख निर्देश:

    1. जिन राज्यों/यूटी ने नियम नहीं बनाए हैं, वे 4 माह में नियम बनाएँ और राजपत्र में प्रकाशित करें।
    2. तब तक, सभी आनंद कारज विवाह सामान्य विवाह पंजीकरण कानूनों के तहत दर्ज हों।
    3. जिन राज्यों ने नियम बना लिए हैं, वे 3 माह में परिपत्र जारी करें और सभी जानकारी (फॉर्म, फीस, समयसीमा) पोर्टल पर डालें।
    4. हर राज्य/यूटी 2 माह में सचिव स्तर के नोडल अधिकारी नियुक्त करें जो निगरानी और शिकायत निवारण देखे।
    5. केंद्र सरकार मॉडल नियम तैयार कर राज्यों को उपलब्ध कराए और 6 माह में समेकित रिपोर्ट कोर्ट व अपनी वेबसाइट पर डाले।
    6. किसी भी आवेदन को सिर्फ इस आधार पर अस्वीकार न किया जाए कि नियम अभी नहीं बने हैं।

    कोर्ट ने कहा कि पंजीकरण से इनकार किया गया तो लिखित कारण देना होगा और वह क़ानूनी चुनौती के योग्य होगा।


    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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