'क्या भारत को अविकसित ही रहना चाहिए?' : फ़ूड पैकेज लेबलिंग पर ग्लोबल नियमों को अपनाने के केंद्र के विरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराज़गी
Shahadat
15 Aug 2026 10:39 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केंद्र के उस रुख़ को गलत बताया, जिसमें कहा गया था कि पैक्ड फ़ूड आइटम पर ज़्यादा शुगर, सोडियम या फैट की मात्रा के बारे में चेतावनी देने के मामले में वह इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स का पालन नहीं कर सकता। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या भारत को अविकसित ही रहना चाहिए, जबकि मोटापा एक बड़ी पब्लिक हेल्थ समस्या बनी हुई है।
ये टिप्पणियां 'फ़ूड सेफ़्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया' (FSSAI) द्वारा 'फ्रंट-ऑफ़-पैकेज लेबलिंग' (FOPL) को लागू न कर पाने के संदर्भ में की गईं; FOPL एक ऐसा स्टैंडर्ड है, जिसे इंटरनेशनल लेवल पर अपनाया गया।
बता दें, 10 फरवरी को कोर्ट ने कहा था कि FSSAI, FOPL के अनिवार्य पालन पर संतोषजनक हलफ़नामा दाखिल करने में नाकाम रहा है। कोर्ट ने उन्हें एक और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था। फिर 13 अगस्त को जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच के सामने इस मामले पर सुनवाई हुई। हालांकि, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर (FSSAI की ओर से) ने बेंच को बताया कि वे FOPL का पालन नहीं कर सकते क्योंकि भारतीय खान-पान के स्टैंडर्ड्स इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स से अलग हैं।
कोर्ट को यह बात पसंद नहीं आई और उसने केंद्र के उस रुख़ को गलत बताया, जिसमें कहा गया कि भारत विकसित देशों के स्टैंडर्ड्स की बराबरी नहीं कर सकता।
कोर्ट ने कहा:
"हम केंद्र के इस रुख़ से सहमत नहीं हैं कि इंटरनेशनल स्टैंडर्ड्स, और खासकर विकसित देशों के स्टैंडर्ड्स की बराबरी करना संभव नहीं है। क्या भारत को एक अविकसित देश ही बने रहना चाहिए? यही वह सवाल है जिस पर हम केंद्र से विचार करने को कह रहे हैं। दुनिया को पता होना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों, और खासकर बढ़ते बच्चों की सेहत को लेकर बहुत गंभीर है।"
कोर्ट ने फिर से कहा कि यह मामला नागरिकों, और खासकर बढ़ते बच्चों की सेहत से जुड़ा है, जिनकी सेहत के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
जस्टिस पारदीवाला ने खास तौर पर इस बात पर ज़ोर दिया कि छोटे बच्चे पैक्ड आइटम खाते हैं, जिससे उनकी सेहत और खराब होती है। इसमें UNICEF की 'चाइल्ड न्यूट्रिशन रिपोर्ट, 2025' का ज़िक्र किया गया, जिसके अनुसार 2002 और 2022 के बीच ज़्यादा वज़न वाले स्कूली उम्र के बच्चों और किशोरों का प्रतिशत 2% से बढ़कर 10% हो गया। रिपोर्ट में बताया गया कि स्कूल के आस-पास मिलने वाली चीज़ों में से लगभग 80% पैक्ड आइटम होते हैं।
इसके साथ ही इसमें 'इकोनॉमिक सर्वे 2025-25' का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें बताया गया कि भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फ़ूड का बाज़ार 2009 से 2023 के बीच 150% से ज़्यादा बढ़ गया।
यह कहते हुए कि मोटापा भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती बना हुआ है, कोर्ट ने कहा:
"हालिया NFHS डेटा खुद ही सब कुछ बता देते हैं। यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह अस्वास्थ्यकर खान-पान और जीवनशैली के कारण होता है, जिसमें प्रोसेस्ड फ़ूड का सेवन भी शामिल है, जिससे डायबिटीज़, दिल की बीमारी और हाइपरटेंशन का ख़तरा बढ़ जाता है।"
इसने बच्चों और वयस्कों पर ज़्यादा चीनी, फ़ैट और सोडियम वाले खाने के असर की ओर इशारा किया और कहा:
"हम बस इतना ही कहेंगे कि बच्चे के विकास और सेहत के लिए संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर खाना बहुत ज़रूरी है। यह न केवल व्यक्ति की शारीरिक सेहत पर असर डालता है, बल्कि यह भी तय करता है कि कोई व्यक्ति कैसा महसूस करता है, कैसा काम करता है और कैसा व्यवहार करता है।"
बेंच ने कहा कि रिफ़ाइंड चीनी, रिफ़ाइंड मैदा और ट्रांस-फ़ैट न केवल बच्चों में दिल की बीमारी, मोटापे और हाइपरएक्टिविटी का ख़तरा बढ़ाते हैं, बल्कि ये पाचन खराब होने, अस्वास्थ्यकर वज़न बढ़ने और खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ने में भी बराबर की भूमिका निभाते हैं।
इसी संदर्भ में, कोर्ट ने ज़ोर दिया कि FOPL एक मददगार टूल है जो ग्राहकों को सही फ़ैसले लेने में मदद करता है, क्योंकि यह पैकेजिंग पर ज़रूरी और आसानी से उपलब्ध पोषण संबंधी जानकारी देता है।
आगे कहा गया,
"हम बस यह कहना चाहते हैं कि हमारे और बच्चों के आस-पास का माहौल चुपचाप हमारी आदतें तय कर रहा है। लेबलिंग का एक स्टैंडर्ड फ़ॉर्मेट उलझन कम करेगा और ग्राहकों के लिए सही फ़ैसले लेना आसान बनाएगा, और FOPL ग्राहकों को जागरूक कर सकता है। FOPL से मिलने वाली जागरूकता लेबल को एक काम के टूल में बदल देगी। इस तरह FOPL की अहमियत सिर्फ़ जानकारी देने में नहीं, बल्कि स्पष्टता में है - यानी ग्राहक को सिर्फ़ कुछ बताया जाना और ग्राहक का सही जानकारी के साथ फ़ैसला लेना - इन दोनों के बीच का यही सटीक फ़र्क है।"
भारत पिछड़ा हुआ नहीं रह सकता
चूंकि केंद्र सरकार और FSSAI ने तर्क दिया कि भारत फ़ूड लेबलिंग के अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन नहीं कर सकता, इसलिए बेंच ने चिली, इज़राइल और कनाडा के उदाहरण दिए। बेंच ने बताया कि चिली सरकार ने बच्चों में ज़्यादा वज़न और मोटापे की बढ़ती समस्या से निपटने की ज़रूरत को समझते हुए फ़ूड लेबलिंग में बदलाव के उपाय किए।
चिली सरकार ने 2016 में एक नियम लागू किया, जिसके तहत अगर किसी फ़ूड प्रोडक्ट में प्रति 100 ग्राम में 22.5 ग्राम से ज़्यादा चीनी होती थी तो उस पर "हाई शुगर कंटेंट" (ज़्यादा चीनी वाला) का लेबल लगाया जाता था। बाद में इस सीमा को घटाकर प्रति 100 ग्राम 10 ग्राम कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों की खपत में काफ़ी कमी आई।
इसी तरह कोर्ट ने बताया कि कनाडा ने 2022 में 'फ़्रंट ऑफ़ पैकेज न्यूट्रिशन सिंबल' (पैकेट के सामने पोषण संबंधी जानकारी के निशान) के रूप में बदलाव किए।
कोर्ट ने कहा कि इन उदाहरणों को देने का मकसद यह बताना था कि न सिर्फ़ विकसित देश, बल्कि विकासशील देश भी पैकेजिंग के अंतरराष्ट्रीय मानकों को अपना रहे हैं।
"इस दिशा में एक सकारात्मक कदम हमारे देश के पूरी तरह से विकसित होने के प्रयासों को और तेज़ करेगा। इससे आम जनता को उन बुरे प्रभावों के बारे में जागरूकता मिलेगी जो 'देसी खाद्य पदार्थों' से भी हो सकते हैं, भले ही हमारा यह मानना हो कि देश की विविध संस्कृतियों से आने वाले इन 'देसी खाद्य पदार्थों' को कभी भी पैकेजिंग के लिए नहीं बनाया गया था।"
Case Details: 3S AND OUR HEALTH SOCIETY v UNION OF INDIA AND ANR|15 MA 1177/2025 in W.P.(C) No. 437/2024


