Shiv Sena Row | सुप्रीम कोर्ट ने ECI के 'विधायी बहुमत' टेस्ट के इस्तेमाल पर सवाल उठाए, पूछा- दोनों गुटों को आधिकारिक चुनाव चिह्न क्यों नहीं रोका गया

  • Shiv Sena Row | सुप्रीम कोर्ट ने ECI के विधायी बहुमत टेस्ट के इस्तेमाल पर सवाल उठाए, पूछा- दोनों गुटों को आधिकारिक चुनाव चिह्न क्यों नहीं रोका गया

    शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सवाल किया कि क्या भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने शिवसेना के विरोधी गुटों के बीच विवाद पर फैसला करते समय - 'चुनाव चिह्न आदेश' के पैरा 15 के तहत - पार्टी के आरक्षित चुनाव चिह्न को किसी भी गुट को न देने के विकल्प पर विचार किया था।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच उद्धव ठाकरे की उस चुनौती पर सुनवाई कर रही है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी है - जो 'चुनाव चिह्न आदेश' के पैरा 15 के तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देता है और उन्हें 'धनुष-बाण' चिह्न का उपयोग करने की अनुमति देता है।

    जस्टिस बागची ने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता देने के लिए चुनाव आयोग द्वारा 'विधायी बहुमत टेस्ट' पर निर्भर रहने पर सवाल उठाया और पूछा कि ECI ने किसी भी गुट को राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने से इनकार करने के विकल्प पर विचार क्यों नहीं किया।

    उन्होंने कहा,

    "अब अथॉरिटी के पास चार विकल्प हैं। उसने केवल तीन विकल्पों पर विचार किया। अगर एक लाइन यह कहती कि 'नहीं, यह ऐसा मामला नहीं है जहां हम चौथे विकल्प पर जा सकते हैं क्योंकि इस बहुत गहरे और ऐतिहासिक महत्व वाले चिह्न से भावनाएं जुड़ी हैं' - और जिस पर कोई भी पार्टी या गुट सहमत नहीं होता - तो हम इसे स्वीकार कर लेते।"

    जस्टिस बागची विवाद को सुलझाने में ECI के पास मौजूद चार संभावित तरीकों का जिक्र कर रहे हैं - a) पार्टी के संविधान और उसके संगठनात्मक ढांचे की जांच करना, b) संगठनात्मक-बहुमत टेस्ट लागू करना, c) विधायी-बहुमत टेस्ट लागू करना, या d) एक आखिरी विकल्प के तौर पर किसी भी गुट को आरक्षित चिह्न न देना। उन्होंने सवाल किया कि ECI ने विकल्प d) पर विचार किए बिना विकल्प c) को क्यों चुना।

    शिंदे गुट की ओर से सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने पहले तर्क दिया कि विधायी-बहुमत टेस्ट इसलिए अपनाया गया, क्योंकि ECI ने पाया कि इस मामले में पार्टी का संविधान और संगठनात्मक बहुमत व्यावहारिक नहीं है।

    कौल ने विधायी-बहुमत टेस्ट पर ECI के निर्भर रहने का बचाव जारी रखा। उन्होंने कहा कि पैराग्राफ 15 में किसी खास टेस्ट के बारे में नहीं बताया गया है और कमीशन मामले के तथ्यों के आधार पर कोई सही टेस्ट तय कर सकता है।

    हालांकि, जस्टिस बागची ने 'सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के गवर्नर के प्रधान सचिव' मामले में संविधान पीठ के फैसले पर ध्यान दिया। इस फैसले में विधायी-बहुमत टेस्ट की सीमाओं पर चर्चा की गई और यह भी कहा गया कि पैराग्राफ 15 के तहत विवादों के लिए कोई एक टेस्ट तय नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस बागची ने कहा कि 'सादिक अली और अन्य बनाम भारत का चुनाव आयोग और अन्य' जैसे पहले के फैसलों में विरोधी गुटों के बीच विवादों का फैसला करते समय विधायी ताकत पर विचार किया गया, लेकिन वे फैसले दसवीं अनुसूची से पहले के थे। उन्होंने कहा कि सुभाष देसाई फैसले में विधायी टेस्ट को पूरी तरह से खारिज नहीं किया गया, बल्कि उसकी "कमजोरी" की जांच की गई।

    जस्टिस बागची ने कहा कि संविधान पीठ ने साफ तौर पर कहा कि वह ECI के पैराग्राफ 15 वाले फैसले के गुण-दोष की जांच नहीं कर रही है, फिर भी उसने इस बात पर विस्तार से टिप्पणी की कि ऐसे विवादों को कैसे देखा जाना चाहिए और अलग-अलग बातों को कितना महत्व दिया जाना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि संविधान पीठ ने विधायी बहुमत टेस्ट को "कमजोर", "कम असरदार", "बेकार" और "बहस का विषय" जैसे शब्दों से बताया। साथ ही दूसरे संभावित टेस्ट का भी ज़िक्र किया। उन्होंने सवाल किया कि इन टिप्पणियों को इस बयान के साथ कैसे समझा जाए कि कोई एक टेस्ट तय नहीं किया जा सकता।

    कौल ने कहा कि उन टिप्पणियों से विधायी बहुमत को एक मान्य टेस्ट के तौर पर खत्म नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि ECI ने संबंधित टेस्ट पर विचार किया था और आखिर में विधायी ताकत पर भरोसा करने के कारण बताए।

    जस्टिस बागची ने जवाब दिया कि इसे ज़रूरी तौर पर विधायी टेस्ट को एकमात्र टेस्ट के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाज़त के तौर पर नहीं देखा जा सकता, जबकि संविधान पीठ ने खुद इसे कमजोर या बेकार पाया।

    इसके बाद उन्होंने यह सवाल उठाया कि अगर उपलब्ध टेस्ट विरोधी गुटों के बीच चुनने के लिए काफी मज़बूत आधार नहीं देते हैं, तो ECI को क्या करना चाहिए।

    उन्होंने कहा,

    "अगर इनमें से कोई भी टेस्ट मज़बूत नहीं लगता है तो फिर क्या? किसी एक को इनाम क्यों दें? इसे रद्द कर दें।"

    जस्टिस बागची उस आखिरी विकल्प की बात कर रहे थे जिसमें किसी भी गुट को आरक्षित चुनाव चिह्न न दिया जाए। उन्होंने इसे एक असाधारण कदम बताया और इसकी तुलना "सबसे दुर्लभ" (rarest of rare) स्थिति से की, क्योंकि ऐसा करने का मतलब है किसी पार्टी के लिए मौत की सज़ा सुनाना।

    इसके बावजूद, जज ने सवाल उठाया कि ECI ने अपने फ़ैसले में इस विकल्प पर विचार क्यों नहीं किया।

    उन्होंने कहा,

    "मान लीजिए कि सज़ा सुनाने की प्रक्रिया में यह 'सबसे दुर्लभ' स्थिति है, क्योंकि हम पार्टी के लिए मौत की सज़ा सुना रहे हैं। इसलिए ECI ने यह रास्ता तभी अपनाया होता, जब उसके पास कोई और विकल्प न होता। असल में ECI संगठन को ही खत्म कर रहा है। वह ऐसा क्यों नहीं कर रहा है? यह ऐसा कहने जैसा है कि 'मुझे (ECI को) विधायी बहुमत को देखना है।' क्या यही एकमात्र विकल्प है? क्योंकि एक और असाधारण विकल्प भी मौजूद था। उस पर कोई बात नहीं की गई।"

    इसके बाद उन्होंने इस मुद्दे को खास तौर पर न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के नज़रिए से रखा। उन्होंने पूछा कि अगर अथॉरिटी के पास चार विकल्प थे लेकिन सिर्फ़ तीन पर ही विचार किया गया, तो क्या चौथे विकल्प पर विचार न करना न्यायिक दखल का आधार बन सकता है?

    उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि कोर्ट यह तय करने की कोशिश नहीं कर रहा है कि ECI को कौन सा विकल्प अपनाना चाहिए था, बल्कि वह उस तरीके की जांच कर रहा है, जिससे कमीशन अपने फ़ैसले तक पहुंचा।

    उन्होंने कहा,

    "जब हम न्यायिक समीक्षा की बात करते हैं तो अगर चार विकल्प खुले हों और अथॉरिटी चौथे विकल्प पर कोई बात न करे तो क्या हम यह कहेंगे कि फ़ैसले में न्यायिक समीक्षा के तहत दखल दिया जा सकता है? हमें यह तय नहीं करना है, बल्कि हमें यह देखना है कि उस पर किस तरह से विचार किया गया।"

    जस्टिस बागची ने कहा कि अगर ECI ने चौथे विकल्प पर साफ़ तौर पर बात की होती और यह बताया होता कि शिवसेना के चुनाव चिह्न से जुड़े ऐतिहासिक महत्व की वजह से इसे क्यों नहीं अपनाया जा सकता तो कोर्ट उसके फ़ैसले को समझ सकता था। उन्होंने सादिक अली मामले के फ़ैसले का ज़िक्र किया, जिसमें कांग्रेस के चुनाव चिह्न से जुड़े ऐतिहासिक महत्व पर विचार किया गया।

    हालांकि, उन्होंने बताया कि ECI के फ़ैसले में ऐसी कोई बात नहीं है जिससे यह पता चले कि इस विकल्प को क्यों नहीं अपनाया जा सका। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ECI ने इस विकल्प पर कोई बात ही नहीं की।

    उन्होंने पूछा,

    “जैसे कांग्रेस में सादिक अली का मामला था, उससे एक बड़ी परंपरा जुड़ी है। हम इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। तो अगर हमें वह पैराग्राफ मिल जाता, तो क्या मैं वह सवाल नहीं पूछता?”

    जस्टिस बागची ने साफ़ किया कि कोर्ट कौल की दलीलों में दखल नहीं देना चाहता और न ही ECI के फ़ैसले की जगह अपना आकलन थोपना चाहता है।

    बागची ने कहा,

    “क्योंकि आप बहुत मज़बूत दलील दे रहे हैं कि हम ECI जैसी संस्था के फ़ैसले को मेरिट के आधार पर नहीं बदल सकते। अगर यह कोई खास संस्था या एक्सपर्ट है, तो हमें उसकी बात माननी होगी।”

    हालांकि, उन्होंने फिर कहा कि कोर्ट यह देख सकता है कि क्या किसी ज़रूरी बात या नतीजे पर ध्यान नहीं दिया गया।

    उन्होंने पूछा,

    “लेकिन जब हम ज्यूडिशियल रिव्यू (न्यायिक समीक्षा) की बात करते हैं - जैसे सभी ज़रूरी तथ्यों पर विचार करना, या कोई चौथा ज़रूरी नतीजा या कोई ऐसा नतीजा जिस पर शायद ध्यान नहीं दिया गया - तो क्या यह विचार करने लायक बात नहीं होगी?”

    कौल ने कहा कि वह अपनी दलीलों के दौरान इस सवाल का जवाब देंगे।

    सुनवाई आज भी जारी रहेगी।

    Case Title : Sunil Prabhu v. Eknath Shinde

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