Shiv Sena Row | स्पीकर विधायी बहुमत को राजनीतिक पार्टी के बराबर नहीं मान सकते: कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा
Shahadat
18 Aug 2026 10:18 PM IST

सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि महाराष्ट्र विधानसभा स्पीकर राहुल नार्वेकर ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार करते समय गैर-कानूनी तरीके से शिवसेना की विधायी पार्टी को राजनीतिक पार्टी के साथ मिला दिया।
सिब्बल ने तर्क दिया कि दसवीं अनुसूची में ऐसी किसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई, जहां विधायी पार्टी के सदस्य केवल इसलिए राजनीतिक पार्टी बन जाएं क्योंकि वे सदन में बहुमत में हैं।
सिब्बल ने कहा,
"स्पीकर ने दसवीं अनुसूची के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का पूरी तरह से उल्लंघन किया और शिवसेना राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व की अनदेखी की है; यह प्रक्रिया दसवीं अनुसूची की योजना और संरचना के खिलाफ है।"
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच उद्धव ठाकरे गुट के सदस्य सुनील प्रभु की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में महाराष्ट्र के स्पीकर द्वारा दसवीं अनुसूची के तहत एकनाथ शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार करने को चुनौती दी गई।
सिब्बल ने तर्क दिया कि अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला करते समय स्पीकर ने मूल रूप से राजनीतिक पार्टी और विधायी पार्टी को एक ही मान लिया। उन्होंने 'सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव' मामले में सुप्रीम कोर्ट की 2023 की संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि व्हिप और नेता की नियुक्ति राजनीतिक पार्टी करती है, न कि विधायी पार्टी।
उन्होंने तर्क दिया कि स्पीकर ने गलत निष्कर्ष निकाला कि विधायकों का बहुमत राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है।
सिब्बल ने कहा,
"स्पीकर ने दसवीं अनुसूची के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का पूरी तरह से उल्लंघन किया> हमारी राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व में हुए बदलावों की अनदेखी की है; यह प्रक्रिया दसवीं अनुसूची के खिलाफ है।"
सिब्बल ने कहा कि यह दृष्टिकोण सुभाष देसाई मामले के फैसले के खिलाफ था, जिसमें राजनीतिक पार्टी और विधायी पार्टी के बीच स्पष्ट अंतर बताया गया।
उन्होंने कहा,
"विधायी पार्टी राजनीतिक पार्टी नहीं है। इसलिए वह यह नहीं मान सकते कि विधायी पार्टी में फूट का मतलब राजनीतिक पार्टी में फूट है। सुभाष देसाई मामले में यह पहले ही तय हो चुका है कि आप दोनों को एक नहीं मान सकते।"
उन्होंने तर्क दिया कि कानून का ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है, जिसके तहत स्पीकर विधायी पार्टी को राजनीतिक पार्टी मान सकें। उन्होंने दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 1(c) और उसमें दी गई "विधायिका दल" (लेजिस्लेचर पार्टी) की परिभाषा का ज़िक्र करते हुए तर्क दिया कि इन प्रावधानों में विधायिका के सदस्यों के ही राजनीतिक दल बन जाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
उन्होंने कहा,
"विधायिका दल का सदस्य किसी राजनीतिक दल का हिस्सा होता है। परिभाषा के अनुसार, विधायिका दल का सदस्य खुद राजनीतिक दल नहीं हो सकता।"
उन्होंने तर्क दिया कि दसवीं अनुसूची में राजनीतिक दल और विधायिका दल के बीच अंतर किया गया और ऐसी किसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई है जिसमें विधायिका दल के सदस्य ही राजनीतिक दल बन जाएं।
सिब्बल ने स्पीकर के उस फ़ैसले पर भी सवाल उठाया जिसमें उन्होंने 2018 के नेतृत्व ढांचे को खारिज कर शिवसेना के 1999 के संविधान को आधार बनाया। स्पीकर का मानना था कि 2018 का नेतृत्व ढांचा पार्टी के संविधान के अनुरूप नहीं था और इससे यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि कौन सा गुट असली राजनीतिक दल है। इसलिए उन्होंने अन्य पहलुओं पर विचार किया।
सिब्बल ने दसवीं अनुसूची के तहत स्पीकर के इस प्रक्रिया को अपनाने के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि पार्टी के नेतृत्व ढांचे को तय करने के लिए स्पीकर शिवसेना के 1999 के संविधान पर निर्भर नहीं रह सकते थे।
स्पीकर ने गौर किया कि 2018 का संविधान, जिसमें पार्टी प्रमुख के हाथों में सारी शक्तियां केंद्रित थीं, चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं था। इसलिए उन्होंने 1999 के संविधान को आधार बनाया, जिसमें पार्टी के भीतर शक्तियों का बंटवारा अलग तरह से किया गया।
सिब्बल ने इस प्रक्रिया को अंजाम देने के स्पीकर के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाया।
उन्होंने पूछा,
"स्पीकर का कहना है कि पार्टी के संविधान को देखना ज़रूरी है और वह 1999 का संविधान है, क्योंकि ECI के रिकॉर्ड में वही संविधान उपलब्ध है। स्पीकर को इन सब मामलों में पड़ने का अधिकार क्षेत्र कहां से मिला?"
उन्होंने 'सुभाष देसाई' मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले का ज़िक्र किया, जिसमें स्पीकर को निर्देश दिया गया कि वे विरोधी गुटों के बनने से पहले ECI को सौंपी गई पार्टी संविधान की कॉपी पर विचार करें।
सिब्बल ने फ़ैसले का हवाला देते हुए कहा,
"अगर विरोधी गुट पार्टी संविधान की दो या उससे ज़्यादा कॉपी जमा करते हैं तो स्पीकर को उस कॉपी पर विचार करना चाहिए जो विरोधी गुटों के बनने से पहले ECI को सौंपी गई।"
उन्होंने कहा कि इस मामले में संविधान की कोई दो विरोधी कॉपी नहीं थीं। उन्होंने आगे कहा कि दोनों गुटों ने 2018 के संविधान को माना था और सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दोनों गुटों की सहमति से ECI को सौंपी गई कॉपी पर विचार किया जाना चाहिए।
सिब्बल ने आगे सवाल उठाया कि अगर दोनों कार्यवाही को अलग-अलग माना जा रहा है तो स्पीकर ECI की कार्यवाही से मिली जानकारी पर कैसे भरोसा कर सकते हैं।
उन्होंने पूछा,
"अगर आप कह रहे हैं कि ECI की कार्यवाही अलग है और अयोग्यता की याचिकाएं अलग हैं तो स्पीकर ECI की कार्यवाही को इन कार्यवाहियों में कैसे ला सकते हैं और यह कैसे कह सकते हैं कि 1999 का संविधान ECI के रिकॉर्ड में मौजूद था?"
उन्होंने कहा कि स्पीकर ने माना था कि 2018 का लीडरशिप स्ट्रक्चर ही सही स्ट्रक्चर है, लेकिन बाद में उसे नज़रअंदाज़ कर दिया।
सिब्बल ने कहा,
"स्पीकर बिना अधिकार क्षेत्र के राजनीतिक पार्टी की लीडरशिप की तुलना 1999 के पार्टी संविधान से करते हैं और नतीजा निकालते हैं कि लीडरशिप स्ट्रक्चर पार्टी संविधान के मुताबिक नहीं है। यह उनके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा कैसे है?"
सिब्बल ने स्पीकर के उस निष्कर्ष को भी चुनौती दी, जिसमें कहा गया कि 'पक्ष प्रमुख' के फ़ैसले को राजनीतिक पार्टी की इच्छा नहीं माना जा सकता।
स्पीकर ने उद्धव गुट की इस दलील को खारिज किया कि 'पक्ष प्रमुख' के तौर पर उद्धव ठाकरे का फ़ैसला राजनीतिक पार्टी की इच्छा के बराबर है।
सिब्बल ने तर्क दिया कि स्पीकर ने 2018 के लीडरशिप स्ट्रक्चर को तब माना था जब उससे शिंदे गुट को फ़ायदा हो रहा था, लेकिन जब यह तय करना था कि राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व कौन करता है, तो उसी स्ट्रक्चर को नज़रअंदाज़ कर दिया।
सिब्बल ने कहा,
"2018 के संविधान के तहत जो कुछ भी किया गया, उसका फ़ायदा उन्हें तब मिला। वे उसी के तहत चुने गए। तो आप इस संविधान को नज़रअंदाज़ करते हैं, एक गुट को संविधान का फ़ायदा देते हैं, और फिर वे कहते हैं कि विधायी बहुमत की वजह से वही राजनीतिक पार्टी हैं।"
उन्होंने तर्क दिया कि व्हिप उद्धव गुट के पास था और उसने विधायकों को स्पीकर के चुनाव में वोट न देने का निर्देश देते हुए व्हिप जारी किया था। शिंदे गुट के विधायकों ने व्हिप के खिलाफ वोट किया।
स्पीकर ने माना था कि शिंदे गुट द्वारा नियुक्त व्हिप और नेता की नियुक्ति सही थी। सिब्बल ने कहा कि इससे दसवीं अनुसूची की व्यवस्था "पूरी तरह से विफल" हो गई, जिसका मकसद विधायकों को उस राजनीतिक दल के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य करना है, जिसके टिकट पर वे चुने गए।
उन्होंने कहा,
"दसवीं अनुसूची राजनीतिक दल के सदस्य और विधायी दल के सदस्य के बीच अंतर करती है। इसमें ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई, जहां विधायी दल के सदस्य ही राजनीतिक दल बन जाएं, जो कि स्पीकर का निष्कर्ष है।"
सिब्बल ने यह भी तर्क दिया कि असली राजनीतिक दल तय करने के लिए चुनाव आयोग के समक्ष कार्यवाही, स्पीकर के समक्ष अयोग्यता कार्यवाही के नतीजे पर आधारित होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगर कोई गुट खुद को राजनीतिक दल बताते हुए चुनाव आयोग (ECI) के पास जाता है, जबकि उसके विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही हो तो चुनाव आयोग यह तय कर सकता है कि कौन सा गुट राजनीतिक दल है। हालांकि, यह फैसला अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय के बाद ही लिया जाना चाहिए।
सिब्बल ने कहा,
"अगर उन विधायकों को अंततः अयोग्य घोषित कर दिया जाता है तो विधानसभा में उनकी संख्या को नजरअंदाज करना होगा।"
उन्होंने कहा कि ऐसा करना जरूरी है, क्योंकि अयोग्यता कार्यवाही के नतीजे के आधार पर किसी गुट की विधायी संख्या बदल सकती है।
बहस कल (बुधवार) भी जारी रहेगी।
Case: Sunil Prabhu v. Eknath Shinde SLP(C) No. 1644-1662/2024 (and connected case)


