Shiv Sena Row | ECI के लिए 'धनुष-बाण' चिह्न शिंदे गुट को देना ज़रूरी था, क्योंकि उसने पाया कि वही असली पार्टी है: सुप्रीम कोर्ट में दलील

  • Shiv Sena Row | ECI के लिए धनुष-बाण चिह्न शिंदे गुट को देना ज़रूरी था, क्योंकि उसने पाया कि वही असली पार्टी है: सुप्रीम कोर्ट में दलील

    शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने दलील दी कि जब भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने यह तय कर लिया कि एकनाथ शिंदे गुट ही असली राजनीतिक पार्टी है तो उसके लिए शिवसेना का रिज़र्व्ड चुनाव चिह्न (धनुष-बाण) उसी गुट को आवंटित करना ज़रूरी हो गया।

    उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव चिह्न को "लगातार चलने वाली कार्रवाई" (Continuing Cause of Action) नहीं माना जा सकता, जो बाद की घटनाओं के आधार पर विरोधी गुटों के बीच बदलता रहे। उन्होंने तर्क दिया कि ECI का शिंदे गुट को 'धनुष-बाण' का निशान देने का फ़ैसला दोबारा नहीं खोला जा सकता, भले ही बाद में उस गुट को अयोग्य (Disqualified) घोषित कर दिया जाए; क्योंकि 'सिंबल्स ऑर्डर' के पैरा 15 के तहत फ़ैसला उन तथ्यों के आधार पर किया जाता है, जो विवाद पर ECI के फ़ैसले के समय मौजूद होते हैं।

    उन्होंने कहा,

    "अगर ECI अपनी समझ से इस नतीजे पर पहुँचती है कि हमारे पास सिर्फ़ 'लेजिस्लेटिव टेस्ट' (विधायी परीक्षण) का ही विकल्प बचा है, और वे हर संभव टेस्ट आज़माकर कहते हैं कि हमारे पास ऐसा करने के अलावा कोई चारा नहीं है, तो ऐसी स्थिति में माय लॉर्ड्स उस चरण पर उन्हें असली राजनीतिक पार्टी मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। एक बार जब वे ऐसा मान लेते हैं, तो चुनाव चिह्न तो उन्हें मिलना ही है। ऐसी स्थिति में यह कहना कि 'क्या वे किसी को भी न देने या कम से कम न देने के विकल्प पर विचार कर सकते थे, या क्या अयोग्यता पर फ़ैसला बदलने के साथ यह भी बदल जाएगा?' - यह सब 'सिंबल्स ऑर्डर', उसके पीछे के मकसद और आपके द्वारा दिए गए फ़ैसलों के साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी होगी।"

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच उद्धव ठाकरे की उस चुनौती पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फ़ैसले को चुनौती दी थी जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना के तौर पर मान्यता दी गई और उन्हें 'धनुष-बाण' का निशान इस्तेमाल करने की इजाज़त दी गई। क्या बाद में अयोग्य ठहराए जाने पर चुनाव चिह्न के फैसले पर दोबारा विचार किया जा सकता है?

    जस्टिस बागची के उस सवाल पर कि अगर शिंदे गुट को बाद में अयोग्य ठहराया जाता है तो क्या चुनाव चिह्न आवंटन पर दोबारा विचार किया जा सकता है, कौल ने 'सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव' मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी स्थिति में, जो सदस्य सदन में बने रहेंगे, उन्हें नए चुनाव चिह्न के लिए आवेदन करना होगा।

    जस्टिस बागची ने पूछा,

    "मान लीजिए ऐसी स्थिति है, जहां चुनाव आयोग ने पहले ही एक गुट को पुराना चुनाव चिह्न देने का फैसला कर लिया। बाद में वह गुट अयोग्य हो जाता है। तो क्या पुराने चुनाव चिह्न को बनाए रखने या चौथे विकल्प पर विचार करना सही होगा?"

    कौल ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता। उन्होंने सुभाष देसाई मामले के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि अयोग्यता और उससे होने वाले परिणाम भविष्य के लिए लागू होते हैं।

    उन्होंने बताया कि संविधान पीठ ने ऐसी स्थिति पर विचार किया था जहां जिस गुट को चुनाव चिह्न दिया गया, उसके सदस्य बाद में अयोग्य हो गए। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में सदन में बचे सदस्यों को नए चुनाव चिह्न के लिए आवेदन करना होगा। उन्होंने कहा कि पहले से आवंटित चुनाव चिह्न अपने आप उनके पास वापस नहीं आएगा।

    कौल ने इस सिद्धांत का हवाला दिया कि चुनाव चिह्न विवाद का फैसला उन तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए, जो ECI के फैसले के समय मौजूद थे। उन्होंने तर्क दिया कि बाद में अयोग्यता या पार्टी संगठन की संरचना में बदलाव के कारण चुनाव चिह्न एक गुट से दूसरे गुट में नहीं जा सकता।

    कौल ने जोर देकर कहा कि अगर ऐसा विकल्प अपनाया गया तो चुनाव चिह्न बार-बार बदलता रहेगा, क्योंकि बाद के फैसलों से गुटों की संख्या या संगठनात्मक स्थिति बदलती रहती है।

    उन्होंने कहा,

    "यहां बार-बार पक्ष बदलने का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता। इससे असल में अफरातफरी मच जाएगी, क्योंकि हर चरण में फैसले में बदलाव होने पर चुनाव चिह्न पेंडुलम की तरह एक तरफ से दूसरी तरफ घूमता रहेगा।"

    एक उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भले ही संगठनात्मक-बहुमत परीक्षण (Organizational-Majority Test) अपनाया जाए और बाद में सदस्य संगठन छोड़ दें। फिर भी ECI के फैसले का मूल्यांकन उसी तारीख के आधार पर किया जाएगा, जिस दिन वह फैसला लिया गया।

    उन्होंने कहा,

    “ऐसा नहीं हो सकता कि कोई सिंबल एक पक्ष से दूसरे पक्ष के पास चला जाए। मान लीजिए कि इसमें तीन बार बदलाव होता है—एक बार अयोग्य घोषित किया गया, फिर नहीं, और फिर दोबारा अयोग्य घोषित किया गया—तो क्या होगा? और उसके बाद हम क्या करेंगे? या फिर, इसे किसी संगठन में राजनीतिक बहुमत के मामले में परखते हैं। मैं किसी खास तारीख पर यह तय करता हूँ कि संगठन के बहुमत का प्रतिनिधित्व कौन करता है। तीन महीने बाद उनमें से कई लोग पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में चले जाते हैं। इन मुद्दों पर किसी खास तारीख पर फैसला लेकर उन्हें तय (फ्रीज) कर देना चाहिए; हर बार नया फैसला आने पर उनमें बदलाव नहीं किया जा सकता। असल मुद्दा यह है कि क्या उस तारीख पर फैसला सही लिया गया या नहीं। अगर उस तारीख पर फैसला गलत था, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है। लेकिन अगर उस तारीख पर, मौजूद तथ्यों के आधार पर फैसला सही था, तो फिर किसी भी तरह से उसमें दखल देने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।”

    ECI ने दोनों गुटों से सिंबल वापस लेने के बजाय लेजिस्लेटिव बहुमत का टेस्ट क्यों अपनाया?

    कौल ने इस सवाल पर भी बात की कि क्या ECI को किसी भी गुट को रिज़र्व्ड सिंबल न देने के चौथे विकल्प पर विचार करना चाहिए।

    उन्होंने कहा कि किसी भी गुट ने ECI या सुप्रीम कोर्ट के सामने इस विकल्प को अपनाने के लिए कोई दलील नहीं दी। उन्होंने बताया कि दोनों गुटों ने ज़ोर देकर कहा कि वे ही असली शिवसेना का प्रतिनिधित्व करते हैं और रिज़र्व्ड सिंबल अपने लिए मांगा था।

    कौल ने कहा कि जब ECI ने यह तय कर लिया कि एक गुट ही राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है, तो रिज़र्व्ड सिंबल उसी गुट को दिया जाना था।

    उन्होंने सुभाष देसाई मामले में कॉन्स्टिट्यूशन बेंच की उस चर्चा का हवाला दिया, जिसमें मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के लिए रिज़र्व्ड सिंबल के महत्व पर बात की गई। उन्होंने कहा कि यह पता चलने के बावजूद कि एक गुट राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है, सिंबल को रोककर रखना 'सिंबल्स ऑर्डर' के मकसद को ही खत्म कर देगा।

    उन्होंने कहा,

    "अगर यह सिंबल - जो राजनीतिक पार्टी के साथ इतनी अहम पहचान रखता है और जिसके ज़रिए वोटर खुद को पार्टी से जोड़ते हैं - अगर यह रेत की तरह बदलता रहेगा, तो इस पूरे मामले में कभी कोई अंतिम नतीजा नहीं निकल पाएगा, माय लॉर्ड्स। यही मेरी दलील है और इसमें कुछ भी गलत नहीं था; चुनाव आयोग को ऐसे किसी विकल्प पर विचार करने की ज़रूरत ही नहीं थी कि 'क्या मैं इसे किसी को न दूं?', क्योंकि न तो किसी ने ऐसी दलील दी थी और न ही आयोग ऐसा कर सकता था। आखिर में, और सबसे अहम बात, सादिक अली और सुभाष देसाई मामलों में कहा गया है कि जैसे ही आप किसी नतीजे पर पहुँचते हैं, तो आपको इसे किसी एक गुट को देना ही होगा।"

    कौल ने आगे कहा कि लेजिस्लेटिव टेस्ट चुनने से पहले ECI ने पार्टी के संविधान, पार्टी के पदों, मिले वोटों, लेजिस्लेटिव ताकत, राजनीतिक पार्टी की सदस्यता और अन्य ज़रूरी बातों पर गौर किया था।

    उन्होंने तर्क दिया कि सिर्फ़ इसलिए ECI की गलती नहीं निकाली जा सकती, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट किसी दूसरे टेस्ट को बेहतर मान सकता है। उन्होंने कहा कि जब तक कोर्ट को यह न लगे कि ECI का फ़ैसला पूरी तरह से गलत या मनमाना था, तब तक उस फ़ैसले में दखल नहीं दिया जा सकता, बशर्ते उसमें समझदारी से विचार किया गया हो।

    उन्होंने कहा,

    "अगर चुनाव आयोग अपनी समझदारी से सभी तथ्यों पर विचार करता है तो यह एक अलग बात है कि अगर आप (जज) इस नतीजे पर पहुंचें कि उन्होंने हमारे सिद्धांतों को पूरी तरह गलत तरीके से लागू किया है; लेकिन अगर आपको लगता है कि उन्होंने सोच-समझकर फैसला लिया है और एक उचित और तर्कसंगत नतीजे पर पहुंचे हैं (ECI), तो बस इतना ही काफी है।"

    कौल ने तर्क दिया कि सुभाष देसाई मामले में संविधान पीठ के फैसले में चुनाव चिह्न आदेश के पैरा 15 के तहत विवादों को सुलझाने के लिए विधायी-बहुमत परीक्षण (लेजिस्लेटिव-मेजॉरिटी टेस्ट) को बाहर नहीं किया गया।

    उन्होंने कहा कि हालाँकि सुभाष देसाई मामले में कुछ स्थितियों में विधायी परीक्षण को "कमजोर", "बेअसर" या "बेकार" बताया गया, लेकिन साथ ही फैसले में यह भी कहा गया कि "कोई भी परीक्षण बाहर नहीं है" और ECI किसी खास विवाद के तथ्यों और जटिलताओं के हिसाब से कोई परीक्षण तय करने के लिए स्वतंत्र है।

    कौल ने कहा,

    "विधायी बहुमत का परीक्षण एक वैध परीक्षण बना हुआ है।" उन्होंने तर्क दिया कि इसे कमजोर या बेकार बताने वाली टिप्पणियों को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता।

    उनका कहना था कि ECI ने असल में कई अहम बातों पर गौर करने के बाद यह नतीजा निकाला कि शिवसेना विवाद की स्थितियों में विधायी ताकत ही सही परीक्षण है।

    कौल ने कहा कि इसलिए सुप्रीम कोर्ट के सामने सवाल यह था कि क्या वह नतीजा इतना गलत, तर्कहीन, दुर्भावनापूर्ण या बाहरी बातों से प्रभावित था कि उस पर न्यायिक समीक्षा के तहत दखल देने की ज़रूरत पड़े।

    उन्होंने याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि ECI ने पार्टी के संविधान की जाँच करके खास तौर पर शिवसेना विवाद के लिए कोई नया कानूनी सिद्धांत बनाया था। उन्होंने कहा कि आयोग दशकों से राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिक ढाँचे पर ज़ोर देता रहा है।

    इस मामले की सुनवाई अगले हफ़्ते भी जारी रहेगी।

    Case Title : Sunil Prabhu v. Eknath Shinde

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story