Shiv Sena Row | सुप्रीम कोर्ट में शिंदे गुट की दलील- ECI ने सिर्फ़ लेजिस्लेटिव विंग में बंटवारे पर नहीं, बल्कि पूरी पार्टी में असंतोष पर भी विचार किया
Shahadat
15 Sept 2026 8:06 PM IST

शिवसेना मामले में एकनाथ शिंदे गुट ने आज सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2022 का विवाद सिर्फ़ पार्टी के लेजिस्लेटिव विंग (विधायकों के समूह) में बंटवारे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक संगठन और उसके कैडर में असंतोष को भी दिखाता है। इसलिए इलेक्शन सिंबल्स (रिज़र्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर के पैराग्राफ 15 के तहत यह तय करना भारत के चुनाव आयोग (ECI) के अधिकार क्षेत्र में है कि कौन-सा गुट असली शिवसेना का प्रतिनिधित्व करता है।
शिंदे गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल, उद्धव ठाकरे गुट की उस दलील का जवाब दे रहे हैं, जिसमें कहा गया कि ECI के पास सिंबल्स ऑर्डर के पैराग्राफ 15 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने का कोई आधार नहीं है, सिर्फ़ इसलिए कि शिवसेना के कुछ विधायक लेजिस्लेटिव पार्टी से अलग हो गए।
कौल ने ECI के 17 फरवरी, 2023 के उस फ़ैसले का बचाव किया, जिसमें शिंदे गुट को शिवसेना के तौर पर मान्यता दी गई और उसे 'धनुष-बाण' का चुनाव चिह्न दिया गया। ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में उस फ़ैसले को चुनौती दी है। यही बेंच सुनील प्रभु की उस चुनौती पर भी सुनवाई कर रही है, जिसमें महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर के 10 जनवरी, 2024 के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसमें उन्होंने दसवीं अनुसूची के तहत किसी भी गुट के विधायकों को अयोग्य ठहराने से इनकार किया।
उद्धव ठाकरे गुट ने दलील दी थी कि विवाद के मकसद से "बंटवारा" राजनीतिक पार्टी के भीतर होना चाहिए और इसे सिर्फ़ लेजिस्लेचर में विरोधी गुटों की संख्या के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।
कौल ने कहा कि शिंदे गुट का पक्ष यह है कि लेजिस्लेटिव विंग में बंटवारा पार्टी के भीतर व्यापक दरार का सिर्फ़ एक हिस्सा है।
उन्होंने अपनी बात रखी,
“एक और तर्क यह दिया गया कि जब आप ECI के पास गए तो उनके पास अधिकार-क्षेत्र (Jurisdiction) मानने और पहली नज़र में यह कहने का कोई आधार नहीं है कि पार्टी में फूट पड़ी है। हमारा पक्ष हमेशा से यही रहा है कि पार्टी में असंतोष था। उस समय शिवसेना और BJP ने मिलकर चुनाव लड़ा था। नतीजे भी दोनों के मिलकर चुनाव लड़ने पर ही आए थे। याचिकाकर्ताओं को ही पता होगा कि उन्होंने क्यों अलग होने का फैसला किया और ऐसी पार्टी के साथ गठबंधन किया, जो विचारधारा के मामले में शिवसेना के बिल्कुल उलट है। असंतोष रातों-रात पैदा नहीं होता। आखिरकार, लोगों ने कहा कि यह सब ऐसे नहीं चल सकता और प्रस्ताव में कहा गया कि पार्टी में तानाशाही जैसा माहौल है, कोई अपनी बात नहीं रख सकता। तभी ECI के सामने पैरा 15 के तहत याचिका दायर की गई कि पार्टी में फूट पड़ गई है और हम ही असली शिवसेना का प्रतिनिधित्व करते हैं।”
कौल ने तर्क दिया कि ECI ने केवल विधायी (Legislative) फूट के आधार पर अधिकार-क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने कहा कि आयोग के पास ऐसे सबूत थे जिनसे राजनीतिक पार्टी के भीतर असंतोष का पता चलता है।
उन्होंने तर्क दिया कि ऐसी कोई कानूनी शर्त नहीं है कि पैरा 15 के तहत फूट की शुरुआत राजनीतिक पार्टी के संगठनात्मक विंग से ही होनी चाहिए; फूट विधायी विंग से शुरू होकर बाद में राजनीतिक संगठन तक भी फैल सकती है।
कौल ने कहा,
“यह काफी है कि फूट विधायी पार्टी से शुरू हो और राजनीतिक पार्टी तक पहुंचे।”
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि शिंदे गुट ने ECI से यह नहीं कहा कि वह केवल शिंदे का समर्थन करने वाले विधायकों की संख्या के आधार पर राजनीतिक पार्टी में फूट का निष्कर्ष निकाले। उन्होंने कहा कि दोनों गुटों द्वारा एक-दूसरे को अयोग्य ठहराने की याचिकाओं के अलावा, पार्टी कार्यकर्ताओं में असंतोष, अलग-अलग बैठकें और नेतृत्व तथा मुख्य सचेतक (Chief Whip) के पद के लिए परस्पर विरोधी दावे भी किए जा रहे थे।
उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के बाद कांग्रेस और NCP के साथ गठबंधन, राष्ट्रीय अधिवेशन न बुलाना और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में किए गए बदलावों ने इस असंतोष को और हवा दी।
उन्होंने कहा,
"चुनाव आयोग के पास जाने से पहले और 'सिंबल ऑर्डर' के पैरा 15 के तहत याचिका दायर करने के समय भी हमारे द्वारा प्रस्ताव पारित किए गए। पार्टी के भीतर मतभेद और दो गुटों का उभरना—जैसे कि चुनाव से पहले एक जैसी विचारधारा वाली पार्टी के साथ गठबंधन के बावजूद, चुनाव नतीजों के बाद सत्ता हासिल करने के लिए आप उस पार्टी के साथ मिल गए, जो आपकी पार्टी के मूल्यों, संस्कृति और मान्यताओं के पूरी तरह खिलाफ थी। इन्हीं वजहों से राजनीतिक पार्टी के भीतर गुट बने और फूट पड़ी।"
कौल ने पैरा 15 के विवाद पर फैसला करते समय शिवसेना के 2018 के संविधान की जांच करने के ECI के फैसले का भी बचाव किया।
ठाकरे गुट ने तर्क दिया कि पार्टी संविधान की वैधता और लोकतांत्रिक स्वरूप की जांच करके ECI ने ऐसा अधिकार क्षेत्र अपना लिया जो कानून में नहीं है। कौल ने कहा कि ECI 1990 के दशक से ही मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक संविधान पर जोर देता रहा है, और संगठनात्मक बहुमत तय करने के लिए यह प्रासंगिक है।
कौल ने कहा,
“वजह यह है कि अगर मनमानापन और बिना किसी नियम के काम करने का तरीका (ad-hocism) हो, तो हम कैसे तय करेंगे कि बहुमत किसके पास है? राजनीतिक पार्टी का बहुमत एक अहम पैमाना है; इसके लिए ज़रूरी है कि उसके पास बड़ी संख्या में चुने हुए सदस्य हों। क्योंकि यही कैडर और आम लोगों की इच्छा को दिखाता है।”
उन्होंने बताया कि शिवसेना का 1999 का संविधान तब बना था, जब ECI ने पार्टी से अपने संगठनात्मक ढांचे में लोकतांत्रिक तत्व शामिल करने को कहा था।
कौल ने कहा,
“एक समय शिवसेना ने कहा कि हमारा संविधान चुनाव की इजाज़त नहीं देता। ECI ने शिवसेना को मनाया और स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे इसके लिए राज़ी हो गए... और एक संशोधित संविधान (1999) अस्तित्व में आया, जिसमें लोकतांत्रिक कामकाज के सभी सिद्धांत शामिल थे, जो RP एक्ट में हुए संशोधनों और ECI के निर्देशों के अनुरूप थे। उसके बाद अचानक 2018 में नया संविधान सामने आया। इसने उस लोकतांत्रिक स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया, जो 1999 में ECI के सभी राजनीतिक पार्टियों को दिए गए निर्देशों के बाद अपनाया गया था।”
उन्होंने तर्क दिया कि 2018 का संविधान 1999 के ढांचे से काफी अलग था और संगठनात्मक-बहुमत का टेस्ट लागू करते समय ECI को उस बदलाव की जांच करने का अधिकार है। कौल ने आगे कहा कि ECI ने पाया कि 2018 का संविधान उसके रिकॉर्ड में नहीं है। उन्होंने संगठनात्मक चुनावों के संबंध में अनिल देसाई द्वारा ECI को भेजे गए 27 जनवरी, 2018 के पत्र पर ठाकरे गुट के भरोसे को चुनौती दी।
उन्होंने कहा,
“ECI ने साफ तौर पर कहा कि 'हमारे पास यह संविधान नहीं है। इसे कभी हमारे पास रजिस्टर नहीं कराया गया'। सुभाष देसाई मामले के फैसले में कहा गया कि स्पीकर भी पार्टी के संविधान को देखते समय उसी संविधान को देखेंगे, जो ECI के पास रजिस्टर है। वे एक ऐसे पत्र का हवाला दे रहे हैं, जिसमें कुछ चुनाव कराने की बात कही गई है। उस पत्र में ऐसी कोई बात नहीं है, जिससे पता चले कि उसके साथ 2018 का संविधान भी भेजा गया।”
उन्होंने इस तर्क का भी विरोध किया कि शिंदे गुट 2018 के संविधान पर सवाल नहीं उठा सकता, क्योंकि शिंदे खुद इसके तहत बनाए गए पद पर रह चुके हैं।
उन्होंने कहा,
"यह मामला मेरे खिलाफ़ 'एस्टॉपेल' (यानी पहले की किसी बात या काम के आधार पर बाद में कुछ कहने से रोकना) का नहीं है, जैसे कि मैं संविधान के तहत किसी पद के चुनाव को चुनौती दे रहा हूँ... यह उस टेस्ट के बारे में है, जिसका इस्तेमाल ECI यह तय करने के लिए करती है कि राजनीतिक पार्टी में बहुमत का प्रतिनिधित्व कौन करता है।"
कौल ने ठाकरे गुट द्वारा सुप्रीम कोर्ट की 2023 की संविधान पीठ के फैसले (सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव) की व्याख्या पर भी सवाल उठाए, खासकर राजनीतिक पार्टी और उसकी विधायी पार्टी (लेजिस्लेटिव पार्टी) के बीच अंतर को लेकर।
उन्होंने तर्क दिया कि संविधान पीठ ने व्हिप और विधायी पार्टी के नेता की नियुक्ति के संदर्भ में इन दोनों अवधारणाओं के बीच अंतर किया और पैरा 15 के तहत ECI द्वारा विधायी ताकत पर विचार करने को पूरी तरह से बाहर नहीं किया।
कौल ने कहा,
"यह कहना तथ्यात्मक और कानूनी रूप से गलत है कि सुभाष देसाई मामले में कहा गया कि सिंबल ऑर्डर में विधायी पार्टी का कोई ज़िक्र नहीं है। इसलिए उसकी कोई जगह नहीं है और उस पर विचार नहीं किया जा सकता। सुभाष देसाई मामले में कहा गया कि सिंबल ऑर्डर के तहत सिंबल को फ्रीज़ करने और किसी राजनीतिक पार्टी को सिंबल मिलने के लिए सीटें और हासिल किए गए वोट महत्वपूर्ण बातें हैं। सादिक अली मामले का हवाला देते हुए, इसमें कहा गया है कि विधायी बहुमत का टेस्ट पैरा 15 के तहत एक प्रासंगिक टेस्ट है।"
उन्होंने आगे कहा कि संविधान पीठ की राजनीतिक पार्टी और विधायी पार्टी को एक न मानने की चर्चा इस संदर्भ में हुई थी कि व्हिप नियुक्त करने का अधिकार किसके पास है।
कौल ने कहा,
"दूसरी तरफ़ यह तर्क दिया गया कि विधायी पार्टी द्वारा नियुक्त व्हिप राजनीतिक पार्टी के व्हिप का भी प्रतिनिधित्व करता है। उस संदर्भ में, सुभाष देसाई मामले में कहा गया कि आप विधायी और राजनीतिक पार्टी को एक नहीं मान सकते। संविधान पीठ ने वोटों और विधायी बहुमत के महत्व को माना... यह कहना कि इसे पूरी तरह से हटा दिया गया या खत्म कर दिया गया, पूरी तरह से गलत व्याख्या है।"
उन्होंने राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य मामले के फैसले में भी अंतर बताया, जिसका हवाला ठाकरे गुट ने यह तर्क देने के लिए दिया कि दसवीं अनुसूची के उद्देश्यों के लिए विभाजन राजनीतिक पार्टी में होना चाहिए, न कि केवल विधायी पार्टी में।
कौल ने बताया कि राणा मामला दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता से संबंधित है, जबकि ECI के सामने विवाद सिंबल ऑर्डर के पैरा 15 के तहत उठा है, जिसके लिए आयोग को यह तय करना होता है कि कौन-सा प्रतिद्वंद्वी समूह मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है। शिवसेना के संगठनात्मक इतिहास पर कौल ने कहा कि 2018 के संविधान में 'पक्ष प्रमुख' का पद नहीं बनाया गया, जैसा कि ठाकरे गुट का दावा है। उन्होंने बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद 14 जनवरी 2013 को इस पद के गठन से जुड़े प्रस्ताव का ज़िक्र किया और बताया कि इसके बाद उद्धव ठाकरे को 2013-2018 की अवधि के लिए इस पद पर चुना गया।
इस मामले में बहस कल भी जारी रहेगी।
Case: Sunil Prabhu v. Eknath Shinde, SLP(C) Nos. 1644-1662/2024 and connected case


