सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा: भारतीय मछुआरों को श्रीलंका की समुद्री सीमा में न जाने के लिए जागरूक करें
Shahadat
6 Oct 2026 3:35 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि भारतीय तमिल मछुआरों को कच्चातिवु द्वीप के पास मछली पकड़ने के लिए श्रीलंका के समुद्री इलाके में न जाने के बारे में जागरूक करने की ज़रूरत है।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच उन रिट याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें 1974 के भारत-श्रीलंका समुद्री समझौते के ज़रिए कच्चातिवु द्वीप को श्रीलंका को सौंपने को "असंवैधानिक" बताया गया और मछुआरों के अधिकारों को सीमित करने वाले 1976 के समझौते को भी चुनौती दी गई।
भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी के अनुरोध पर इस मामले की सुनवाई टालते हुए, कोर्ट ने सवाल किया कि वह इस मामले को कब तक लंबित रख सकता है।
जस्टिस कुमार ने यह भी पूछा कि क्या इस मामले में कोई प्रगति हुई:
"क्या आप उनसे संधि के बारे में बात कर रहे हैं?"
इस पर AG ने जवाब दिया:
"सरकार इसमें नहीं पड़ना चाहती। उन्होंने शुरू में इस पर बात की थी, लेकिन बाद में किसी समय इसे छोड़ दिया।"
AG ने कहा कि श्रीलंका के साथ भारत के "बहुत अच्छे संबंध" हैं, जिन्हें वह खराब नहीं करना चाहता।
जस्टिस कुमार ने पूछा कि श्रीलंकाई नौसेना द्वारा तमिल मछुआरों की गिरफ्तारी के मुद्दे पर सरकार क्या कर रही है। सीनियर एडवोकेट पी. विल्सन (मछुआरों की ओर से) ने कहा कि समझौते को मंज़ूरी देने के लिए संविधान की अनुसूची I में संशोधन की ज़रूरत थी, जो नहीं हुआ। उन्होंने मछुआरों की बार-बार गिरफ्तारी और उन पर हमलों का मुद्दा भी उठाया।
AG ने कहा कि प्रदूषण के कारण भारतीय तटों पर मछलियाँ नहीं मिल रही हैं, और यही कारण है कि मछुआरे भारतीय समुद्री सीमा पार कर जाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर वे मछली पकड़ने के मकसद से वहाँ जाते रहेंगे, तो उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा।
उन्होंने कहा,
"मछुआरों को श्रीलंका के समुद्री इलाके में न जाने के लिए कहा जाता है, फिर भी वे वहाँ चले जाते हैं। देखिए, असल में तमिलनाडु में मछुआरों ने वहाँ मछलियों की उपलब्धता लगभग खत्म कर दी है और इसलिए वे वहाँ जाना चाहते हैं। हम अपने समुद्रों को प्रदूषित कर रहे हैं। वे यहाँ नहीं आ रहे हैं।"
उन्होंने कहा कि भारत सरकार "हालात को लेकर जागरूक" है और डिप्लोमैटिक स्तर पर कदम उठा रही है। वहीं, तमिलनाडु राज्य के एडिशनल एडवोकेट जनरल प्रशांतो चंद्र सेन और हरिप्रिया ने कहा कि इस मामले को केंद्र सरकार को श्रीलंका के साथ मिलकर सुलझाना चाहिए। हरिप्रिया ने बताया कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने केंद्र को पत्र लिखकर मछुआरों की सुरक्षा के लिए कदम उठाने का अनुरोध किया है, खासकर श्रीलंकाई नौसेना द्वारा हाल ही में की गई 20 गिरफ्तारियों के मद्देनजर।
इस पर जस्टिस कुमार ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि भारतीय मछुआरों के विपरीत श्रीलंकाई लोगों में नागरिक समझ (Civic Sense) बेहतर है। इसलिए उनके समुद्री इलाकों में प्रदूषण नहीं है। शायद यही कारण है कि मछलियाँ भटककर भारतीय जलक्षेत्र से बाहर चली जाती हैं।
उन्होंने कहा:
"मैं खुद श्रीलंका गया हूं। यह देखकर हैरान रह गया कि मुझे सड़क पर या पुराने शहर में भी कोई कचरा फैलाता हुआ नहीं दिखा। वे हमारे विपरीत, नागरिक रूप से बहुत जागरूक हैं। यह दुखद स्थिति है। इसलिए जाहिर है कि वे अपने समुद्र में भी कुछ नहीं फेंकते। अगर वे अपनी सड़कों पर ऐसा नहीं करते हैं तो जाहिर है कि वे अपने समुद्र में भी ऐसा नहीं करेंगे। शायद यही कारण है कि मछलियाँ भटककर श्रीलंकाई जलक्षेत्र में चली जाती हैं।"
मामले को फरवरी 2027 के लिए सूचीबद्ध करते हुए जस्टिस कुमार ने कहा कि गिरफ्तारियों के बारे में कुछ करने की ज़रूरत है, शायद तमिल मछुआरों को समुद्री सीमा पार न करने के प्रति जागरूक करना होगा।
कहा गया,
"या तो आप मछुआरों को एक निश्चित बिंदु से आगे न जाने के लिए जागरूक करें।"
AG वेंकटरमणी ने जवाब दिया कि ये मछुआरे तमिलनाडु के हैं और राज्य सरकार को ही उन्हें जागरूक करना होगा।
अदालत ने शुरू में आदेश दिया कि भारतीय मछुआरों की सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय किए जाएं, लेकिन AG ने आपत्ति जताते हुए अनुरोध किया कि अदालत की ऐसी टिप्पणी दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों पर असर डाल सकती है। हालांकि, जस्टिस कुमार ने कहा कि भारतीय मछुआरों को उनके कार्यों के प्रति जागरूक करने के लिए इस बारे में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है।
अदालत ने आदेश दिया:
"माननीय अटॉर्नी जनरल ने कहा है कि सरकार इन मुद्दों के प्रति जागरूक है और तदनुसार आवश्यक उपाय करेगी। मामले को फरवरी में सूचीबद्ध करें।"
गौरतलब है कि पिछली बार भी मामले को स्थगित कर दिया गया, क्योंकि AG ने कोर्ट को बताया कि वे श्रीलंका के एक प्रतिनिधिमंडल के आने की उम्मीद कर रहे हैं और सरकार मुद्दों को सुलझाने की कोशिश करेगी।
Case Title : A.K. SELVARAJ Vs UNION OF INDIA MINISTRY OF EXTERNAL AFFAIRS SECRETARY

