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' सीआरपीसी धारा 97 एक मृत-पत्र बन गई है ' : सुप्रीम कोर्ट ने पिता द्वारा पत्नी को अवैध बंधक बनाने पर धारा 97 का सहारा लेने को कहा

LiveLaw News Network
20 May 2021 5:28 AM GMT
 सीआरपीसी धारा 97 एक मृत-पत्र बन गई है  : सुप्रीम कोर्ट ने पिता द्वारा पत्नी को अवैध बंधक बनाने पर धारा 97 का सहारा लेने को कहा
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस याचिकाकर्ता को सीआरपीसी की धारा 97 ( अवैध तरीके से बंधक व्यक्ति की खोज) का सहारा लेने का आग्रह किया जिसने पिता द्वारा उसकी पत्नी की अवैध हिरासत के खिलाफ धारा 32 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी।

न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी ने कहा,

"धारा 97, सीआरपीसी इन शॉर्टकट्स के कारण एक मृत-पत्र बन गई है।"

गौरतलब है कि उक्त धारा 97 में यह प्रावधान है कि यदि किसी जिला मजिस्ट्रेट, उप-मंडल मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में बंधक है कि से हिरासत एक अपराध के बराबर है, तो वह एक तलाशी-वारंट जारी कर सकता है, और जिस व्यक्ति को ऐसा वारंट निर्देशित किया गया है, वह इस प्रकार बंधक व्यक्ति की तलाश कर सकता है; और उसके अनुसार तलाशी की जाएगी, और यदि व्यक्ति पाया जाता है, तो उसे तुरंत एक मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जाएगा, जो मामले की परिस्थितियों में ऐसा आदेश देगा, जो उचित लगे।

न्यायमूर्ति माहेश्वरी और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस की अवकाश पीठ पति द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसकी पत्नी को उसके पिता द्वारा अवैध रूप से हिरासत में रखा गया है।

मामले के तथ्य यह थे कि याचिकाकर्ता ने 28 साल की उम्र में इस साल अप्रैल में 20 साल की उम्र की युवती से शादी की थी। यह तर्क दिया गया था कि पत्नी के परिवार के सदस्यों को शादी की सूचना मिलने के बाद, उन्होंने उसे बेरहमी से पीटा और अपने आवास पर एक कमरे में बंद कर दिया ताकि उसे अपने वैवाहिक घर में याचिकाकर्ता के साथ रहने से रोका जा सके।

याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी के परिवार के सदस्यों के साथ इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास किया था, लेकिन प्रतिवादी-पिता और उसके परिवार के अन्य सदस्यों ने याचिकाकर्ता को जान से मारने की धमकी दी।

याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि उसने बाद में क्षेत्र के एसएचओ के पास शिकायत दर्ज कराई थी लेकिन पुलिस अधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सीएम के 'जन सुनवाई पोर्टल' पर यूपी राज्य के मुख्यमंत्री के समक्ष एक ऑनलाइन आवेदन भी किया था।

याचिकाकर्ता ने आग्रह किया कि कोई अन्य विकल्प नहीं बचा तो उसने अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर कर प्रतिवादी-अधिकारियों को अदालत के समक्ष अपनी पत्नी को पेश करने का निर्देश देने की मांग की, जिसे पिता ने अपने आवास पर अवैध रूप से हिरासत में लिया है। याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि वह और पत्नी दोनों ही बालिग हैं और उन्होंने बिना किसी दबाव और स्वतंत्र इच्छा से एक-दूसरे को 2 साल से अधिक समय से जानने के बाद शादी को अंजाम दिया है।

शुरू में जस्टिस माहेश्वरी ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा,

''आप 32 के तहत आए हैं.. हाईकोर्ट इस मामले से निपटने के लिए सक्षम क्यों नहीं है?''

याचिकाकर्ता के वकील ने जवाब दिया, "राज्य में मौजूदा कोविड की स्थिति को देखते हुए, इलाहाबाद उच्च न्यायालय 3-4 महीने बाद सुनवाई की तारीख दे रहा है ... ज्यादातर ट्रायल कोर्ट भी काम नहीं कर रहे हैं ..."

न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने कहा,

"तो आप धारा 97, सीआरपीसी का सहारा क्यों नहीं ले सकते? 97 का अदालतों से कोई लेना-देना नहीं है!"

पीठ ने तब मामले को कुछ समय के टाल दिया ताकि अधिवक्ता को सीआरपीसी के उक्त प्रावधान को पढ़ने के लिए समय दिया जा सके।

जब मामले को फिर से बुलाया गया, तो अधिवक्ता ने प्रस्तुत किया कि उन्होंने धारा 97 को पढ़ा है। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने अवैध हिरासत के संबंध में अधिकार क्षेत्र के पुलिस स्टेशन के एसएचओ से संपर्क किया है और यहां तक ​​कि राज्य के सीएम के समक्ष ऑनलाइन आवेदन भी दायर किया है।

न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने सुझाव दिया,

"हमने वह सब देखा है- सीएम को शिकायत, एसएचओ को ... और 32 'नहीं' है ... आप 97 के तहत क्यों नहीं जा सकते?"

वकील ने आगे कहा

"फिर मैं 97 के तहत जाने के लिए इस याचिका को वापस लेने की स्वतंत्रता चाहता हूं।"

न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने टिप्पणी की,

"अच्छा! 97 इन शॉर्टकट के कारण संहिता में एक मृत-पत्र बन गया है।"

इसके बाद पीठ ने अपना आदेश सुनाया- "याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार उचित सहारा लेने की स्वतंत्रता के साथ याचिका को वापस लिया गया।"

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