चेक अनादरण मामलों में अपील के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट को संदेह, मुद्दा बड़ी पीठ को भेजा
Amir Ahmad
14 Feb 2026 12:42 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण प्रश्न बड़ी पीठ को संदर्भित किया कि क्या परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा 138 के तहत चेक अनादरण मामले में शिकायतकर्ता, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 372 के प्रावधान (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 413) के तहत बिना धारा 378(4) के अंतर्गत विशेष अनुमति प्राप्त किए, बरी होने के आदेश के खिलाफ अपील दायर कर सकता है।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ एम/एस एवरेस्ट ऑटोमोबाइल्स द्वारा एम/एस राजित एंटरप्राइजेज के विरुद्ध दायर विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका 10 अप्रैल 2024 को पंजाब एंड हरियाणा हाइकोर्ट द्वारा पारित निर्णय को चुनौती देते हुए दायर की गई।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से हालिया निर्णय सेलेस्टियम फाइनेंशियल बनाम ए. ज्ञानसेकरन (2025 आईएनएससी 804) पर भरोसा किया गया, जिसमें समन्वय पीठ ने कहा था कि NI Act की धारा 138 के मामले में शिकायतकर्ता पीड़ित की श्रेणी में आता है। इसलिए वह धारा 372 के प्रावधान के तहत अपील दायर करने का हकदार है। उस निर्णय में यह भी कहा गया कि ऐसी अपील दायर करने के लिए धारा 378(4) के तहत विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
हालांकि, वर्तमान खंडपीठ ने टिप्पणी की कि सेलेस्टियम फाइनेंशियल के निर्णय में पूर्व के बाध्यकारी निर्णयों सत्य पाल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2015) 15 एससीसी 613 तथा सुभाष चंद बनाम राज्य (दिल्ली प्रशासन) (2013) 1 एससीसी 802 पर विचार नहीं किया गया, जिनमें शिकायतकर्ता की अपील संबंधी अधिकारों की व्याख्या भिन्न रूप में की गई।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि वह दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 372 और 378 की योजना के संबंध में समन्वय पीठ द्वारा की गई व्याख्या से सहमत नहीं है। अदालत ने उल्लेख किया कि धारा 378(1), (2) और (3) को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि धारा 372 का प्रावधान अभियोजन एजेंसी और पीड़ित के बीच अंतर को ध्यान में रखते हुए जोड़ा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इंगित किया कि धारा 378(4) और (5) को संहिता में जानबूझकर बनाए रखा गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यदि किसी शिकायत पर आरंभ अभियोजन का परिणाम बरी होना है तो शिकायतकर्ता को हाइकोर्ट में अपील दायर करने से पहले अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है।
मामले के दूरगामी प्रभाव को देखते हुए खंडपीठ ने कहा कि इस प्रश्न पर प्रामाणिक निर्णय के लिए बड़ी पीठ द्वारा विचार किया जाना आवश्यक है। इसके लिए प्रकरण को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के समक्ष बड़ी पीठ के गठन हेतु उपयुक्त निर्देशों के लिए प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया।

