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साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 - 'व्याख्या करने में विफलता' परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला के लिए केवल एक अतिरिक्त कड़ी हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
12 Aug 2021 5:00 AM GMT
साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 - व्याख्या करने में विफलता परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला के लिए केवल एक अतिरिक्त कड़ी हो सकती है: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी की व्याख्या करने में विफलता को केवल परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी करने के लिए एक अतिरिक्त कड़ी के रूप में माना जा सकता है।

न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति ए एस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि यदि श्रृंखला में अन्य परिस्थितियां स्थापित नहीं होती हैं, तो व्याख्या करने में ऐसी विफलता आरोपी को दोषी ठहराने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती है।

साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 में प्रावधान है कि जब कोई तथ्य विशेष रूप से किसी व्यक्ति की जानकारी में होता है, तो उस तथ्य को साबित करने का भार उस पर होता है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी (महिला) को मृतका और उसके बच्चों के चारों ओर मिट्टी का तेल डालने और आग लगाने का दोषी ठहराया था, क्योंकि वह घर में आग लगने का कारण बताने में विफल रही थी।

इस मामले में अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी की शादी मृतका के पति (जो उसकी पहली पत्नी थी और उसके दो बच्चे थे) से हुई थी। घर में आग लगने के कारण पहली पत्नी और बच्चों की मौत हो गई। पति, सास और आरोपी महिला (दूसरी पत्नी) पर मुकदमा चलाया गया और ट्रायल कोर्ट ने केवल आरोपी महिला को ही दोषी ठहराया था। यह देखने के बाद कि मृतकों के साथ आरोपी भी सो रही थी और ऐसी परिस्थिति में उसकी यह राय थी कि अगर घर में गलती से आग लग जाती है तो आरोपी को भी जलने से जख्म होना चाहिए थी। चूंकि वह बिना किसी जख्म के घर से बाहर आई थी, इसलिए यह माना गया कि वह दोषी है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले की पुष्टि की।

अपील में, पीठ ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि के लिए परिस्थितियों की श्रृंखला में लिंक स्थापित करना आवश्यक है। इसने कहा कि केवल संदेह ही पर्याप्त नहीं होगा, जब तक कि अभियोजन पक्ष द्वारा दिए गए परिस्थितिजन्य साक्ष्य इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच जाते कि यह "सत्य होना चाहिए" और "सत्य हो सकता है" नहीं।

रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का हवाला देते हुए, पीठ ने निम्नलिखित टिप्पणियां कीं:

मृतक की सहायता के लिए आगे नहीं आने की नैतिक गलती किसी व्यक्ति को उस अपराध के लिए दोषी ठहराने की परिस्थिति नहीं हो सकती है, जो हत्या के समान गंभीर है। प्राकृतिक मानव आचरण यह है कि जब कोई घटना या दुर्घटना होती है तो तत्काल प्रतिक्रिया दृश्य से दूर होने और खुद को बचाने की होती है। अगर मध्य रात्रि को किसी भी कारण से आग लगती है और अगर अपीलकर्ता जाग गयी थी और उसने आग को भले ही औरों से पहले देखा था, लेकिन तब घर के अन्य सदस्यों के बारे में पता करने के बजाय घर से बाहर भागना स्वाभाविक व्यवहार है। दूसरे को बचाने के वास्ते घर में वापस आने के लिए एक व्यक्ति को बहुत साहस करना पड़ता है या करुणा से अभिभूत होना पड़ता है और ऐसा न करना, संकट में साथी की मदद के लिए न आना नैतिक रूप से गलत माना जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति को अपराध के लिए दोषी ठहराने की परिस्थिति नहीं हो सकती है जो कि हत्या के रूप में गंभीर है, जब तक कि अन्य परिस्थितियां आरोपी को दोषी साबित करने के प्रबल निष्कर्ष तक न पहुंचाये।"

कोर्ट ने कहा कि घायल नहीं होने के एक मात्र कारण को घर में आग लगाने के लिए दोषी ठहराने की स्थिति के रूप में नहीं माना जा सकता है।

इस मामले में हाईकोर्ट ने दूसरी शादी को घरेलू प्रभुत्व की इच्छा और विवाह के पंजीकरण से एक दिन पहले 17.02.2006 को गुजारा के लिए दस्तावेज के निष्पादन को एक परिस्थिति और मकसद बताया था।

इस संबंध में, पीठ ने कहा:

"यह इस कारण से है कि संपत्ति के केवल एक हिस्से के लिए पहली पत्नी के पक्ष में गुजारा भत्ता की व्यवस्था के बाद शादी को पंजीकृत किया गया था, जो ऐसी स्थिति में एक सामान्य बात है और इसे वर्तमान प्रकृति के कथित अपराध के मजबूत मकसद के रूप में नहीं माना जा सकता है, जहां अपीलकर्ता अपने ही घर को नष्ट कर देगा और वह भी बिना कोई अन्य घटना के, जबकि वे एक ही घर में एक साथ रहते हैं और आग की घटना शादी की तारीख से छह महीने से अधिक समय के बाद हुई है। इसलिए, यदि इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है, तो मन में उठने वाला संदेह अपीलकर्ता की ओर संदेह का इशारा करने के लिए हाईकोर्ट द्वारा दिए गए कारणों से अधिक होंगे और उस स्थिति में निश्चित रूप से संदेह का लाभ अपीलकर्ता के पक्ष में जाना चाहिए।"

व्याख्या करने में विफलता को केवल परिस्थितियों की श्रृंखला को पूरा करने के लिए एक अतिरिक्त कड़ी के रूप में माना जा सकता है

हाईकोर्ट ने आरोपी को मृतका और उसके बच्चों के चारों ओर मिट्टी का तेल डालने और आग लगाने का दोषी ठहराया था, क्योंकि अपीलकर्ता धारा 106 के तहत व्याख्या करने के इस तरह के दायित्व के मद्देनजर आग लगने का कारण बताने में विफल रहा था।

इस संदर्भ में, यह कहा गया:

"जैसा कि 'शरद वृद्धिचंद शारदा (सुप्रा)' मामले में कहा गया है कि व्याख्या करने में विफलता को केवल परिस्थितियों की श्रृंखला को पूरा करने के लिए एक अतिरिक्त कड़ी के रूप में माना जा सकता है। मौजूदा मामले में, चूंकि श्रृंखला में अन्य परिस्थितियां स्थापित नहीं होती हैं, इसलिए इसे अपीलकर्ता के खिलाफ लागू नहीं किया जा सकता है। दूसरी ओर, मामला यह है कि आग आधी रात को लगी थी जब अपीलकर्ता और अन्य लोग सो रहे थे और वह चिल्लाते हुए बाहर आई थी। अपीलकर्ता द्वारा आग के कारणों का स्पष्टीकरण केवल तभी उत्पन्न होता, इस आशय का कोई अन्य सबूत होता कि अपीलकर्ता पहले से ही जाग रही थी और आग लगने से पहले ही घर से बाहर आ गयी थी।"

इसलिए, अपील स्वीकार करते हुए, पीठ ने कहा कि आरोपी बरी होने का हकदार है क्योंकि संदेह का लाभ उसके पक्ष में है।

केस: पारुबाई बनाम महाराष्ट्र सरकार; क्रिमिनल अपील संख्या 1154 / 2018

साइटेशन: एलएल 2021 एससी 371

कोरम: न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना

अधिवक्ता: अपीलकर्ता के लिए अधिवक्ता सुधांशु एस. चौधरी, प्रतिवादी-सरकार के लिए अधिवक्ता सचिन पाटिल

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