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अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 15ए के तहत पीड़ित को आरोपी के खिलाफ अदालती कार्यवाही को नोटिस अनिवार्य : सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
30 Oct 2021 4:57 AM GMT
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 15ए के तहत पीड़ित को आरोपी के खिलाफ अदालती कार्यवाही को नोटिस अनिवार्य : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 15ए के तहत पीड़ित या आश्रित को अदालत की कार्यवाही का नोटिस जारी करना अनिवार्य है।

न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्न की पीठ ने कहा कि इस आवश्यकता के अनुसार, पीड़ित या उनके आश्रित को एक उचित और समय पर नोटिस जारी किया जाना चाहिए।

धारा 15ए(3) के तहत, पीड़ित या उसके आश्रित को जमानत याचिका सहित किसी भी अदालती कार्यवाही के उचित, सटीक और समय पर नोटिस का अधिकार होगा और विशेष लोक अभियोजक या राज्य सरकार पीड़ित को इस अधिनियम के तहत किसी भी कार्यवाही के बारे में सूचित करेगी। धारा 15ए(5) के अनुसार, एक पीड़ित या उसके आश्रित को इस अधिनियम के तहत किसी आरोपी की जमानत, आरोपमुक्ति, रिहाई, पैरोल, दोषसिद्धि या सजा या किसी भी संबंधित कार्यवाही या दलील और फाइल के संबंध में किसी भी कार्यवाही में अपना पक्ष रखने तथा दोषसिद्धि, दोषमुक्ति या सजा पर लिखित दलील देने का हकदार होगा।

एक अभियुक्त को जमानत देने के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शिकायतकर्ता द्वारा दायर अपील में एक तर्क यह था कि हाईकोर्ट द्वारा शिकायतकर्ता को नोटिस जारी नहीं करके अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 15ए के प्रावधानों का मौलिक उल्लंघन किया गया है, क्योंकि वह संबंधित अधिनियम के तहत किसी भी कार्यवाही में सुनवाई का हकदार था।

कोर्ट ने धारा 15ए का हवाला देते हुए कहा:

धारा 15A की उप-धारा (3) पीड़ित या उनके आश्रितों को जमानत की कार्यवाही सहित किसी भी अदालती कार्यवाही की उचित, सटीक और समय पर सूचना देने का वैधानिक अधिकार प्रदान करती है। इसके अलावा, उप-धारा (3) में अधिनियम के तहत किसी भी कार्यवाही के बारे में पीड़ित को सूचित करने के लिए एक विशेष लोक अभियोजक या राज्य सरकार की आवश्यकता होती है। उप-धारा (3) एक पूर्व सूचना का अधिकार प्रदान करती है, यह अभिव्यक्ति "किसी भी जमानत कार्यवाही सहित किसी भी अदालत की कार्यवाही के उचित, सटीक और समय पर नोटिस" के उपयोग से स्पष्ट है। उप-धारा (5) पीड़ित या आश्रित को सुनवाई का अधिकार प्रदान करती है।

कोर्ट ने कहा कि पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों की रक्षा के लिए धारा 15 ए की शुरुआत की गई थी, जिनके अधिकारों को आपराधिक न्याय प्रणाली के समान लाभार्थी के रूप में अक्सर उनकी कमजोर सामाजिक स्थिति के कारण अनदेखा कर दिया जाता है।

पीठ ने 'हेमल अश्विन जैन बनाम भारत संघ' मामले में गुजरात हाईकोर्ट के फैसले का हवाला दिया,

7. गुजरात उच्च न्यायालय का यह निष्कर्ष कि धारा 15ए (3) के तहत पीड़ित या आश्रित को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के लिए अदालत की कार्यवाही का नोटिस जारी करना अनिवार्य है, राजस्थान हाईकोर्ट के निर्णय सहित विभिन्न हाईकोर्ट कोर्ट के निर्णयों में झलकता है। हम खुद को इस प्रस्ताव से सहमत पाते हैं और मानते हैं कि धारा 15ए की उप-धारा (3) और (5) प्रकृति में अनिवार्य हैं।

कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले में नोटिस देने और सुनवाई के इस अधिकार का उल्लंघन किया गया है। कोर्ट ने कहा कि जब शिकायतकर्ता ने जमानत रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया, तो उसका मानना था कि उस विशेष स्तर पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करने से कमी दूर हो जाएगी।

इस दृष्टिकोण को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:

"संविधि के जनादेश का स्पष्ट उल्लंघन किया गया है। संसद द्वारा उप-धारा (3) और (5) पेश की गई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जिस व्यक्ति के खिलाफ अपराध किया गया है या उसके आश्रितों को भी पक्ष रखने का अधिकार हो। इन प्रावधानों का ईमानदारी से पालन किया जाना चाहिए। हम एकल न्यायाधीश के इस निष्कर्ष से सहमत नहीं हो सकते हैं कि पीड़ित या उनके आश्रित को नोटिस जारी नहीं करने और उन्हें संबंधित कार्यवाही (जमानत प्रदान करने के लिए) में सुनवाई के अवसर से वंचित करने में दोष को बाद में (जमानत रद्द करने के लिए) एक कार्यवाही में सुनवाई का अवसर प्रदान करके उन्हें ठीक किया जा सकता है। क़ानून के जनादेश के तहत हर स्तर पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का अनुपालन देखा जाना चाहिए।"

कोर्ट ने कहा कि धारा 15ए की उप-धारा (3) में प्रावधान है कि पीड़ित या उनके आश्रित को उचित और समय पर नोटिस जारी किया जाना चाहिए।

"इसका मतलब यह होगा कि पीड़ितों या उनके आश्रितों को पहले या जल्द से जल्द नोटिस दिया जाता है। यदि नोटिस जारी करने में अनुचित देरी होती है, तो पीड़ित, या जैसा भी मामला हो, उनके आश्रितों को मामले में हुई प्रगति की जानकारी नहीं होगी और यह अभियुक्तों के बचाव का प्रभावी ढंग से विरोध करने के उनके (पीड़ितों या आश्रितों के) अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। यह अंततः जमानत की कार्यवाही या मुकदमे में देरी करेगा, जिससे अभियुक्तों के अधिकार भी प्रभावित होंगे।"

एससी-एसटी सदस्यों पर अत्याचार बीते दिनों की बात नहीं है

20. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों पर अत्याचार अतीत की बात नहीं है। उन पर अत्याचार आज भी हमारे समाज में एक वास्तविकता बनी हुई है। इसलिए जिन वैधानिक प्रावधानों को संसद ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के 16 उपाय के रूप में अधिनियमित किया है, उनका पालन किया जाना चाहिए और ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए। मौजूदा मामले में धारा 15ए की उप-धारा (3) और (5) में सन्निहित वैधानिक आवश्यकताओं का स्पष्ट उल्लंघन हुआ है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने के आदेश में कोई तर्क भी नहीं है। जमानत आदेश को रद्द करते हुए पीठ ने कहा:

"पहले प्रतिवादी के वकील की प्रस्तुतियाँ दर्ज करने के अलावा, यह ध्यान देने के अतिरिक्त कि लोक अभियोजक ने जमानत का विरोध किया था, हाईकोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पहले प्रतिवादी को जमानत पर रिहा करना उचित और समीचीन था।" इस तरह के आदेश आदर्श नहीं हो सकते। कारणों को रिकॉर्ड करने का कर्तव्य सबमिशन रिकॉर्ड करके और उसके बाद "तथ्यों और परिस्थितियों में" एक सर्वव्यापी सूत्र के जरिये समाप्त नहीं किया जा सकता है। जमानत देने के आधार को इंगित करने वाले संक्षिप्त कारण आवश्यक हैं, क्योंकि ये कोर्ट द्वारा दिये गये ऐसे कारण होते हैं जो आदेश के आधार को इंगित करते हैं।"

केस का नाम और उद्धरण: हरिराम भांभी बनाम सत्यनारायण एलएल 2021 एससी 607

मामला संख्या और दिनांक: सीआरए 1278/2021 | 29 अक्टूबर 2021

कोरम: जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस बीवी नागरत्न

वकीलः अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजीत कुमार ठाकुर, प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता मनीष शर्मा, अधिवक्ता चेतन्या सिंह

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