CEC विरोध के बीच वकीलों की हिरासत और इंटरनेट बंद होने पर SCBA पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
12 Oct 2026 12:07 PM IST

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने संविधान के आर्टिकल 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। यह कदम 10 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के पास पुलिस द्वारा वकीलों के साथ कथित बदसलूकी और उनकी हिरासत के मामले में उठाया गया है। SCBA ने इसमें शामिल अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और अदालतों तक पहुँच को प्रभावित करने वाली पाबंदियों की समीक्षा की मांग की।
याचिका में आरोप लगाया गया कि कई वकीलों - जिनमें सीनियर वकील, महिला वकील और वरिष्ठ नागरिक शामिल हैं - को ज़बरदस्ती पुलिस की गाड़ियों में बिठाया गया और हिरासत में लेने का कारण बताए बिना ले जाया गया। इसमें कहा गया कि SCBA को घटना के वीडियो मिले और बाद में दखल के बाद हिरासत में लिए गए वकीलों को रिहा कर दिया गया।
SCBA ने हिरासत का कानूनी आधार और अवधि, शामिल अधिकारी, बल का प्रयोग और पुलिस की चेन ऑफ़ कमांड के ज़रिए जारी निर्देशों का ब्यौरा देने वाली स्टेटस रिपोर्ट मांगी।
याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत लगाई गई पाबंदियों के दायरे और उन्हें लागू करने के तरीके को भी चुनौती दी गई। इसमें आरोप लगाया गया कि सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों के आस-पास की सड़कों पर बैरिकेड्स लगाने से वकीलों और मुकदमों से जुड़े लोगों की आवाजाही में रुकावट आई।
इसमें इंटरनेट सेवाएं बंद करने और सुप्रीम कोर्ट मेट्रो स्टेशन को बंद करने पर भी चिंता जताई गई। दावा किया गया कि ये कदम चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) से सलाह-मशविरा किए बिना उठाए गए।
SCBA ने BNSS की धारा 163 के तहत जारी आदेश को पेश करने, CCTV और बॉडी-कैमरा फुटेज व अन्य संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और अदालतों व वकीलों के चैंबर तक उचित पहुँच सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की। साथ ही, पाबंदियों के कारण अदालत न पहुँच पाने वाले वकीलों के लिए सुरक्षा उपायों की भी मांग की गई।
याचिका में यह स्पष्ट किया गया कि SCBA हड़ताल, बहिष्कार या अदालती कामकाज से दूर रहने का समर्थन नहीं करता है।
SCBA की याचिका में ये मांगें की गई:
"1) ऐसे उचित रिट, आदेश या निर्देश जारी किए जाएं, जिनसे प्रतिवादी नंबर 1 और 2 को 10 अक्टूबर 2026 की घटनाओं पर एक स्टेटस रिपोर्ट रिकॉर्ड पर रखने के लिए कहा जाए। इसमें हर हिरासत की जानकारी, कानूनी आधार और अवधि, शामिल अधिकारियों की पहचान, इस्तेमाल की गई कोई भी ताकत, संबंधित निर्देश और कमांड की चेन शामिल हो।
2) 'रिट ऑफ़ मैंडमस' या कोई अन्य उचित रिट, आदेश या निर्देश जारी किया जाए जिसमें 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' की धारा 163 के तहत जारी आदेश को पूरा पेश करने का निर्देश हो। इसमें आदेश के कारण उसका दायरा (इलाका), अवधि और लागू होने की शर्तें, और अदालतों व आस-पास के इलाकों तक पहुंच को प्रभावित करने वाली बैरिकेडिंग और पाबंदियों का आधार भी बताया जाए।
3) संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया जाए कि वे घटना से जुड़े संबंधित रिकॉर्ड, CCTV फुटेज, बॉडी-कैमरा फुटेज (अगर कोई हो), हिरासत के रिकॉर्ड, आदेश और वीडियो को सुरक्षित रखें और इस माननीय न्यायालय के निर्देशानुसार न्यायालय के समक्ष पेश करें।
4) उक्त आदेश और बैरिकेडिंग के दायरे और उनके लागू होने के तरीके की समीक्षा का निर्देश दिया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पाबंदियाँ केवल उतनी ही हों जितनी मौजूदा हालात में कानूनी रूप से ज़रूरी और उचित हों।
5) वकीलों, मुकदमों से जुड़े लोगों और वैध कारणों से सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाई कोर्ट, पटियाला हाउस कोर्ट, राउज़ एवेन्यू कोर्ट, वकीलों के चैंबर और प्रभावित रिहायशी इलाकों में जाने वाले अन्य लोगों के लिए उचित व्यवस्था, तय रास्ते और स्पष्ट निर्देश जारी करने का निर्देश दिया जाए, जो कानूनी सुरक्षा जाँच के अधीन हों।"
यह याचिका वकील दीपक कंसल ने तैयार की थी और AoR प्रज्ञा बघेल ने दाखिल की थी।
सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन ने भी वकीलों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की।
कल, रविवार को एक विशेष सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि निहत्थे नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए, और वकीलों, पत्रकारों व अन्य पेशेवरों को उनके पेशेवर कर्तव्यों को निभाने से नहीं रोका जाना चाहिए।
Case Title : Supreme Court Bar Association VERSUS Union of India & Ors.

