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"हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे वकीलों पर आक्षेप करने का कोई इरादा नहीं था" : एससीबीए ने सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को हाईकोर्ट के लिए पदोन्नत करने के मामले में स्पष्टीकरण दिया

LiveLaw News Network
14 Jun 2021 5:20 AM GMT
हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे वकीलों पर आक्षेप करने का कोई इरादा नहीं था : एससीबीए ने सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को हाईकोर्ट के लिए पदोन्नत करने के मामले में स्पष्टीकरण दिया
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सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने रविवार को स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के वकीलों को हाईकोर्ट के जजों के रूप में पदोन्नत करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) को लिखे गये पत्र का मकसद हाईकोर्ट में पदोन्नति के लिए सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के नाम पर विचार करने का समान अवसर उपलब्ध कराया जाना था।

एससीबीए की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है,

"पत्र में इस्तेमाल किये गये शब्द केवल अपने वकीलों के नाम पर विचार के लिए पारदर्शी एवं मजबूत प्रणाली शुरू करने से संबंधित बिंदुओं पर जोर देने के वास्ते थे।"

अपने उस बयान के संबंध में कि "सुप्रीम कोर्ट के वकील हाईकोर्ट के वकीलों से ज्यादा मेधावी हैं" एससीबीए के अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने स्पष्ट किया कि उनका इरादा हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे वकीलों पर किसी तरह का आक्षेप करना नहीं था। उन्होंने कहा है कि उनका बयान सुप्रीम कोर्ट वकीलों के नामों पर हाईकोर्ट कॉलेजियम द्वारा समान रूप से विचार किये जाने के सीमित उद्देश्य के लिए था।

विकास सिंह के अनुसार, भारत में प्रैक्टिस कर रहा प्रत्येक वकील भारत का नागरिक है और उन्हें पदोन्नति देने के बारे में केवल मेरिट के आधार पर ही निष्पक्षता पूर्वक विचार किया जाना चाहिए। इससे कोई लेना-देना नहीं होना चाहिए कि वे कहां प्रैक्टिस करते हैं।

आगे यह भी स्पष्ट किया गया है कि एससीबीए के पत्र में साफ कहा गया है कि हाई कोर्ट कॉलेजियम उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के वकीलों को कोई तरजीह दिए बिना सबसे योग्य उम्मीदवार चुनने के लिए उनके संबंधित बार के वकीलों के साथ उन्हें प्रदान किए गए अन्य नामों पर विचार कर सकता है।

एससीबीए ने सीजेआई से अनुरोध किया है कि सिविल, क्रिमिनल, कंस्टीच्यूशनल और कॉमर्शियल कानून आदि से संबंधित सभी प्रकार के मामलों में व्यापक अनुभव और साबका (एक्सपोजर) होने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के नामों पर हाईकोर्ट कॉलेजियम द्वारा पदोन्नति के लिए विरले ही विचार किया जाता है, क्योंकि वे नियमित तौर पर हाईकोर्ट के समक्ष प्रैक्टिस नहीं करते और पेशेगत तौर पर हाईकोर्ट के सहयोगियों की तुलना में अधिक मेधावी होने के बावजूद वे इस तरह के अवसर खो देते हैं।

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