Sambhal Mosque Dispute | दिसंबर 2024 के आदेश के कारण हाईकोर्ट सर्वे के आदेश को सही नहीं ठहरा सकता: सुप्रीम कोर्ट में अहमदी की दलील
Shahadat
28 July 2026 10:20 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल की जामा मस्जिद की मैनेजमेंट कमिटी की उस चुनौती पर सुनवाई की, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई, जिसने मस्जिद का सर्वे करने के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति को सही ठहराया था। मस्जिद कमिटी का तर्क था कि हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 12 दिसंबर, 2024 के उस आदेश को नज़रअंदाज़ किया, जिसमें अदालतों को पूजा स्थलों से जुड़े विवादों में प्रभावी अंतरिम आदेश पारित करने से रोका गया।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने जामा मस्जिद मैनेजमेंट कमिटी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट हुज़ेफ़ा अहमदी की दलीलें सुनीं।
बेंच मस्जिद कमिटी की स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) पर सुनवाई कर रही है, जिसमें हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें कहा गया कि मस्जिद के खिलाफ हिंदू वादियों का मुकदमा 'पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991' के तहत वर्जित नहीं है और सर्वे के आदेश को सही ठहराया गया।
कमिश्नर के दौरे के बाद सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल की कार्यवाही पर तब तक रोक लगाई थी, जब तक कि हाई कोर्ट इस आदेश के खिलाफ मस्जिद कमिटी की चुनौती पर फैसला न कर ले। 19 मई, 2025 को हाईकोर्ट ने आदेश को सही ठहराया और यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट का ढांचे तक पहुंच की अनुमति देने का फैसला सही था, क्योंकि हिंदू वादियों का मुकदमा 'पूजा स्थल अधिनियम, 1991' के तहत वर्जित नहीं है; यह ढांचे के धार्मिक स्वरूप को बदलने की कोशिश नहीं करता, बल्कि केवल पूजा के लिए पहुंच का अधिकार मांगता है।
12 दिसंबर, 2024 के आदेश का हवाला देते हुए अहमदी ने सवाल किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जल्दबाजी में आदेश क्यों पारित किए, जबकि उन्हें पहले ही दिन यह बताया गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को निर्देश दिया है कि वे धार्मिक स्थलों को बदलने की मांग करने वाले मुकदमों में "प्रभावी आदेश" पारित न करें।
इसके अलावा, उन्होंने कोर्ट को 1991 के अधिनियम की धारा 3 और 4 के बारे में बताया और कहा कि यह कानून पूजा स्थलों को बदलने पर रोक लगाता है और धार्मिक स्वरूप से संबंधित किसी भी मुकदमे पर रोक लगाता है।
बेंच के सामने दलीलें रखते हुए अहमदी ने कहा कि मुकदमा इस तरह से तैयार किया गया, जैसे कि इसमें केवल पूजा का अधिकार मांगा जा रहा हो। हालांकि, असल में यह मस्जिद को मंदिर में बदलने की कोशिश थी, जिस पर 1991 के कानून के तहत रोक है। उन्होंने तर्क दिया कि चालाकी से ड्राफ्टिंग करके कानूनी रोक से बचा नहीं जा सकता।
उन्होंने कहा:
"मैंने पूरी अर्ज़ी इसलिए पढ़ी, क्योंकि यह किसी ऐसे व्यक्ति की अर्ज़ी नहीं है, जो बस वहां जाना चाहता है। मुख्य बात यह है कि वे वहां पूजा करना चाहते हैं और उनका मूल तर्क यह है कि यह एक हिंदू मंदिर था, जिसे नष्ट कर दिया गया। 'प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट' (पूजा स्थल कानून) का मकसद ठीक इसी तरह की समस्या को हल करना था।"
इस मौके पर जस्टिस नरसिम्हा ने पूछा कि क्या अहमदी कोर्ट से इन सभी मुद्दों पर कोई निष्कर्ष देने के लिए कह रहे हैं, जो ट्रायल कोर्ट में चल रहे मुकदमे का विषय हैं।
अहमदी ने कहा कि उनका मुख्य तर्क यह है कि सर्वे कमिश्नर की नियुक्ति नहीं की जा सकती थी, क्योंकि मुकदमा ही कानून के तहत वर्जित (barred) था। इसलिए कमिश्नर की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने से पहले, ट्रायल कोर्ट को यह देखना चाहिए था कि मुकदमा वर्जित है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि फैसले में 1991 के कानून को सही ठहराया।
उन्होंने कहा,
"मैंने हाईकोर्ट का ध्यान इस बात की ओर दिलाया कि जब मुकदमा ही नहीं चल सकता तो कमिश्नर की नियुक्ति का कोई सवाल ही नहीं उठता। अगर कानून का मकसद ही इसे शुरुआती स्तर पर ही रोकना है तो सर्वे कमिश्नर की नियुक्ति कैसे हो गई? हाई कोर्ट ने धारा 3 के असर पर ध्यान नहीं दिया।"
उन्होंने आगे कहा:
"मेरा विनम्र निवेदन है कि इस पर स्पष्ट रोक है। इस बात पर विचार करने के लिए कि रोक है या नहीं, हमें यह देखना होगा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश आपके (सुप्रीम कोर्ट के) उस आदेश के खिलाफ है जिसमें कहा गया कि हम प्रावधानों के असर पर विचार कर रहे हैं। संबंधित जज को आगे नहीं बढ़ना चाहिए। एक बार जब वे उन सवालों पर विचार करने लगते हैं, जो आपके फैसले के दायरे में आते हैं, तो मामले को उस फैसले वाले मामले के साथ जोड़ दिया जाना चाहिए। मैंने पहले ही दिन यह बात कही थी और उस पर आपत्ति भी जताई गई थी।"
अहमदी ने 'प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958' का भी हवाला दिया, जो संभल मस्जिद पर लागू होता है क्योंकि यह एक संरक्षित स्मारक है। अहमदी ने 1958 के कानून की धारा 16 का ज़िक्र करते हुए कहा कि उसमें भी स्वरूप बदलने पर इसी तरह की रोक है। इस धारा के अनुसार, किसी संरक्षित स्मारक—जो पूजा-स्थल भी हो—का इस्तेमाल उसके मूल स्वरूप के विपरीत किसी भी काम के लिए नहीं किया जा सकता।
इसके अलावा, अहमदी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निष्कर्ष को भी चुनौती दी, जिसमें कहा गया कि मुतवल्लियों और सरकार के बीच हुए कथित समझौते में जामा मस्जिद के मालिकाना हक को स्पष्ट नहीं किया गया।
इस मामले में बहस अगले हफ़्ते भी जारी रहेगी।
Case Details: COMMITTEE OF MANAGEMENT JAMI MASJID, SAMBHAL Vs HARI SHANKAR JAIN| SLP (C) Diary No. 46111 of 2025(AOR Anil Kumar) and COMMITTEE OF MANAGEMENT, JAMI MASJID SAMBHAL, AHMED MARG KOT SAMBHAL vs. HARI SHANKAR JAIN|SLP (C) 21599/2025 (AOR Fazail Ahmad)


