सबरीमला सुनवाई: धार्मिक प्रथाओं में राज्य हस्तक्षेप पर सार्वभौमिक नियम बनाना मुश्किल—सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

22 April 2026 5:17 PM IST

  • सबरीमला सुनवाई: धार्मिक प्रथाओं में राज्य हस्तक्षेप पर सार्वभौमिक नियम बनाना मुश्किल—सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमला मामले की सुनवाई के सातवें दिन कहा कि धार्मिक प्रथाओं में राज्य कब हस्तक्षेप कर सकता है, इस पर कोई सार्वभौमिक या भविष्य के लिए लागू होने वाले दिशा-निर्देश तय करना संभव नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों का निर्णय हर केस के तथ्यों पर निर्भर करेगा।

    चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 9-जजों की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 25(2)(b) के तहत राज्य की शक्तियों के दायरे पर विस्तृत सुनवाई की। इस पीठ में जस्टिस बी. वी. नागरत्ना, जस्टिस एम.एम. सुन्द्रेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

    सीजेआई की अहम टिप्पणी

    चीफ जस्टिस ने कहा कि “सामाजिक कल्याण और सुधार” एक व्यापक अवधारणा है और राज्य जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। यदि समाज किसी सामाजिक बुराई को समाप्त करना चाहता है, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।

    हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि—

    अदालत भविष्य के लिए कोई सामान्य नियम तय नहीं कर सकती

    हर मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों के आधार पर होगा

    महिला प्रवेश पर सवाल

    सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने यह सवाल उठाया कि यदि राज्य कानून बनाकर सबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देता है, तो क्या इसे धार्मिक प्रथा में हस्तक्षेप माना जाएगा या सामाजिक सुधार के रूप में सही ठहराया जा सकता है।

    सीनियर एडवोकेट गोपाल सुब्रमण्यम ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालत को यह जांच करनी होगी कि—

    संबंधित प्रथा प्राचीन परंपरा या रीति-रिवाज का हिस्सा है या नहीं

    क्या इससे श्रद्धालुओं के पूजा के अधिकार का हनन होता है

    उन्होंने चेतावनी दी कि “सामाजिक सुधार” के नाम पर धार्मिक स्वतंत्रता में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।

    पीठ की अन्य टिप्पणियां

    जस्टिस बागची ने अनुच्छेद 25(2)(b) को “सीमित दायरा” बताते हुए कहा कि धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप केवल सामाजिक सुधार के स्पष्ट उद्देश्य से ही किया जा सकता है।

    वहीं, जस्टिस सुन्द्रेश ने कहा कि हर मामले में “आवश्यक धार्मिक प्रथा” (Essential Religious Practice) की जांच जरूरी नहीं होती।

    जस्टिस अरविंद कुमार ने यह भी सवाल उठाया कि जब एक ही धर्म में अलग-अलग प्रथाएं हों, तो अदालत किस आधार पर निर्णय करेगी।

    महत्वपूर्ण निष्कर्ष

    अदालत ने संकेत दिया कि—

    धार्मिक स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है

    राज्य का हस्तक्षेप सीमित और न्यायिक जांच के अधीन रहेगा

    हर मामले में संतुलन बनाना आवश्यक होगा

    मामले की सुनवाई जारी है और आगे भी इस पर बहस होगी।

    Next Story