सबरीमाला मामला: महीने में 3 दिन 'अछूत' नहीं माना जा सकता—अनुच्छेद 17 पर जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी

Praveen Mishra

7 April 2026 8:20 PM IST

  • सबरीमाला मामला: महीने में 3 दिन अछूत नहीं माना जा सकता—अनुच्छेद 17 पर जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी

    सबरीमाला संदर्भ मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 17 के लागू होने के सवाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि किसी महिला को महीने के तीन दिनों तक “अछूत” मानना और चौथे दिन उसे अछूत न मानना तर्कसंगत नहीं है।

    जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी

    जस्टिस नागरत्ना ने कहा:

    “एक महिला को हर महीने तीन दिन अछूत नहीं माना जा सकता और चौथे दिन यह स्थिति खत्म नहीं हो सकती।”

    उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 17 ऐतिहासिक रूप से छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई को खत्म करने के लिए बनाया गया था, इसलिए इसे सबरीमाला मामले में कैसे लागू किया जा सकता है, इस पर संदेह है।

    सॉलिसिटर जनरल का विरोध

    इस दौरान भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के सबरीमाला फैसले में दी गई उस टिप्पणी का विरोध किया, जिसमें महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को “अछूत प्रथा” से जोड़ा गया था।

    उन्होंने कहा:

    “सबरीमाला के एक फैसले में कहा गया कि महिलाओं को अछूत की तरह ट्रीट किया जा रहा है—मुझे इस पर कड़ा आपत्ति है।”

    उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत पश्चिमी समझ के अनुसार न तो पितृसत्तात्मक है और न ही जेंडर स्टीरियोटाइप वाला समाज।

    मासिक धर्म नहीं, आयु का आधार: SG

    तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध मासिक धर्म (menstruation) के आधार पर नहीं, बल्कि एक निश्चित आयु वर्ग (10-50 वर्ष) के आधार पर है।

    उन्होंने कहा कि भगवान अयप्पा के अन्य मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर कोई रोक नहीं है और सबरीमाला एक “विशिष्ट” (sui generis) मंदिर है, जिसकी परंपराएं अलग हैं।

    धार्मिक प्रथाओं का सम्मान

    सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि धार्मिक संप्रदायों की परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

    उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे मज़ार या गुरुद्वारा जाने पर सिर ढकना होता है, वैसे ही कुछ धार्मिक प्रथाएं होती हैं जिन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।

    संविधान पीठ में सुनवाई जारी

    9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इस मामले में व्यापक संवैधानिक सवालों पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह फिलहाल 2018 के फैसले के गुण-दोष पर नहीं, बल्कि बड़े संवैधानिक मुद्दों पर विचार करेगा।

    सॉलिसिटर जनरल ने अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 से जुड़े संविधान सभा के बहसों का भी हवाला देते हुए कहा कि “Essential Religious Practices” (आवश्यक धार्मिक प्रथाएं) तय करना अदालत का काम नहीं, बल्कि विधायिका का विषय है।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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