CEC प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, मनोज झा ने दायर की याचिका
Shahadat
11 Oct 2026 10:15 AM IST

RJD सांसद मनोज झा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि 10 अक्टूबर को दिल्ली में CEC ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने ज़रूरत से ज़्यादा बल का इस्तेमाल किया।
झा का आरोप है कि पुलिस ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों, छात्र नेताओं, वकीलों, राजनेताओं और आम नागरिकों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लिया, उनका अपहरण किया या उन्हें नज़रबंद किया, साथ ही "महिला प्रदर्शनकारियों का यौन उत्पीड़न" भी किया।
उन्होंने बताया कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने आज, यानी 11 अक्टूबर को एक और विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया।
AoR फौजिया शकील के ज़रिए दायर याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि CPI(M) नेता MA बेबी के मामले में कोर्ट के आदेश (कि ट्रेन और मेट्रो सेवाओं को पूरी तरह से नहीं रोका जाना चाहिए) का उल्लंघन किया गया। कहा गया है कि अधिकारियों ने दिल्ली की मुख्य सड़कों, मेट्रो स्टेशनों, ट्रेनों, इंटरनेट आदि को बंद करके दिल्ली के निवासियों को भारी परेशानी में डाला।
सांसद का कहना है कि BNSS की धारा 163 के तहत जारी आदेश गैर-कानूनी है और पुलिस ने उन हथियारबंद गुंडों के खिलाफ कार्रवाई न करके पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई, जिन्होंने निहत्थे प्रदर्शनकारियों को धमकाया और उन पर हमला किया।
CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में सक्रिय रूप से शामिल होने के नाते, झा ने मांग की कि 9-10 अक्टूबर के बीच दिल्ली पुलिस की कार्रवाइयों - जिनमें गैर-कानूनी हिरासत, इंटरनेट बंद करना, मेट्रो/ट्रेन सेवाएं बंद करना और ज़रूरत से ज़्यादा बल का इस्तेमाल शामिल है - को गैर-कानूनी घोषित किया जाए।
सांसद की याचिका में आरोप लगाया गया कि अधिकारियों ने 6000 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद, वरिष्ठ वकील, वकील, निहत्थे छात्र और विरोध प्रदर्शन से न जुड़े आम नागरिक शामिल थे।
आगे कहा गया,
"खबरें हैं कि विरोध प्रदर्शन से पहले 250 ट्रेनें रद्द कर दी गईं और दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में 45 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए। बताया जा रहा है कि पुलिस ने बस स्टेशनों का दौरा किया और होटलों व OYO कमरों की तलाशी ली ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रदर्शनकारी वहां मौजूद न हों।"
याचिका में कहा गया कि अधिकारियों ने जनपथ-कर्तव्य पथ इलाके के 4 किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट सर्विस बंद कर दी थीं। पोर्टेबल फ़ोन जैमर लगाने की भी खबरें आईं, जबकि "किसी भी कानून में दिल्ली पुलिस को टेलीकम्युनिकेशन जाम करने की ताकत नहीं दी गई।"
राम लीला मैदान बनाम होम सेक्रेटरी, यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले में कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए झा का कहना है कि शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और दिल्ली पुलिस की कार्रवाई साफ़ तौर पर मनमानी, ग़ैर-कानूनी और आर्टिकल 19(1) का उल्लंघन करने वाली है।
याचिका में यह भी कहा गया कि वर्दीधारी कर्मचारियों द्वारा नेम टैग हटाने, सादे कपड़ों में अनजान लोगों और खुद को 'विजिलेंटे' (स्वयंभू रक्षक) बताने वाले लोगों के शामिल होने, और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ यौन उत्पीड़न/छेड़छाड़ की व्यापक खबरें आई हैं, जो अनीता ठाकुर बनाम जम्मू-कश्मीर सरकार मामले के फ़ैसले का सीधा उल्लंघन है।
याचिका में कहा गया,
"सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए हैं जिनमें बजरंग दल के गुंडे प्रदर्शनकारियों पर हमला कर रहे हैं, जबकि पुलिसकर्मी सिर्फ़ तमाशबीन बने हुए हैं।"

