Rape-Murder Of Ghaziabad Girl | पीड़ित बच्ची का इलाज करने से मना करने वाले प्राइवेट अस्पताल 'आपराधिक रूप से लापरवाह': सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
30 July 2026 5:40 PM IST

गाज़ियाबाद में 4 साल की बच्ची के रेप और मर्डर केस में, जिसमें SIT जांच के आदेश दिए गए, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि जिन प्राइवेट अस्पतालों ने बच्ची के जीवित रहते हुए उसका इलाज करने से मना किया, वे "आपराधिक रूप से लापरवाह" हैं।
कोर्ट को यह भी बताया गया कि SIT ने अपनी रिपोर्ट में दो प्राइवेट अस्पतालों और संबंधित स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की।
ASG ऐश्वर्या भाटी ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच को इस घटनाक्रम के बारे में जानकारी दी। ASG ने बताया कि संबंधित SHO को उनके पद से हटाकर पुलिस लाइन्स भेज दिया गया, पुलिस स्टेशन 6 महीने तक CCTV फुटेज सुरक्षित रखने के लिए कदम उठा रहा है और उस इलाके में (जहाँ असामाजिक गतिविधियां होती थीं) सफाई अभियान चलाया गया और गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं ताकि स्थानीय लोगों को लगे कि यह एक मनोरंजन का इलाका है।
CJI कांत ने कहा कि पिछली सुनवाई में यह देखा गया कि यह मामला "घोर आपराधिक लापरवाही" और "संवेदनशीलता की कमी" का था, "सिर्फ इसलिए कि पीड़ित बच्ची एक गरीब परिवार से थी"। उन्होंने आगे कहा कि अस्पतालों को पहले एक सुझाव दिया गया। अभी यह देखना बाकी है कि वे इस संबंध में क्या करते हैं। पार्टियों को SIT रिपोर्ट देखने का मौका देने के लिए मामले की सुनवाई टाल दी गई।
पीड़ित बच्ची के माता-पिता की ओर से सीनियर एडवोकेट एन. हरिहरन ने कहा कि रिपोर्ट देखने के बाद यदि कोई सुझाव हुआ, तो वे उसे लेकर वापस आएंगे।
बता दें, इस मामले में 24 अप्रैल को SIT गठित करने का आदेश दिया गया था। उस तारीख को याचिकाकर्ता पक्ष ने आरोप लगाया था कि पीड़ित के पिता को पुलिस अधिकारियों ने CrPC की धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराने के लिए "घसीटा" और FIR में कही गई बातों को दोहराने के लिए मजबूर किया। दूसरी ओर, राज्य ने बताया कि मुख्य आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गई और संबंधित कोर्ट ने इसका संज्ञान ले लिया।
SIT का गठन करते हुए कोर्ट ने प्राइवेट अस्पतालों की भूमिका की स्वतंत्र जांच के आदेश दिए। इसमें कहा गया कि पीड़ित के माता-पिता राज्य की जांच से असंतुष्ट थे और कोर्ट का भी मानना था कि अपराध की बर्बर प्रकृति को देखते हुए राज्य के अधिकारियों का ध्यान इस मामले की ओर जाना चाहिए।
Case Title : XXX v. STATE OF UTTAR PRADESH, W.P.(Crl.) No. 139/2026


