राजस्थान ने दौसा में अवैध खनन की शिकायतों पर कार्रवाई न होने की बात मानी, सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के बाद उच्च-स्तरीय समिति बनाई
Shahadat
10 May 2026 8:10 PM IST

राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने दौसा ज़िले में अवैध खनन और पत्थर तोड़ने की गतिविधियों पर कथित तौर पर कार्रवाई न करने के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने के लिए उच्च-स्तरीय समिति बनाई। यह कदम तब उठाया गया, जब कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि अगर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखाई गई तो मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से पेश होना पड़ेगा।
राज्य सरकार ने आगे यह भी माना है कि पहली नज़र में अवैध खनन और पत्थर तोड़ने के बारे में ग्रामीणों द्वारा की गई शिकायतों पर ज़मीनी स्तर के अधिकारियों द्वारा कोई प्रभावी या ठोस कार्रवाई होती नहीं दिखी।
हलफ़नामे में कहा गया,
"अभी तक ज्ञात तथ्यों और उपलब्ध रिकॉर्ड की जांच करने पर पहली नज़र में ऐसा लगता है कि संबंधित ज़मीनी अधिकारियों ने उस समय, उस इलाके के ग्रामीणों (जिनमें याचिकाकर्ता की बहन भी शामिल है) द्वारा अवैध खनन और पत्थर तोड़ने के बारे में की गई शिकायतों की सच्चाई का पता लगाने के लिए कोई प्रभावी या ठोस कार्रवाई नहीं की।"
यह अनुपालन हलफ़नामा जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की खंडपीठ द्वारा 8 मई, 2026 को सिकराय तहसील के कलवान गाँव के ग्रामीणों द्वारा 2020 से चल रहे कथित अवैध खनन कार्यों के बारे में की गई शिकायतों पर राज्य सरकार के जवाब से असंतोष व्यक्त करने के बाद दायर किया गया।
यह कार्यवाही प्रकाश द्वारा दायर एक याचिका से शुरू हुई, जो उन ग्रामीणों में से एक है, जिसे 2021 के एक हिंसा मामले में दोषी ठहराया गया। यह मामला कथित अवैध खनन, अतिक्रमण और पत्थर तोड़ने वाली इकाइयों से होने वाले प्रदूषण के विरोध में हुए प्रदर्शनों से जुड़ा है। यह मुद्दा गांव से गुज़रने वाली अरावली पर्वतमाला में कथित अवैध विस्फोटों और पत्थर तोड़ने वाली इकाइयों द्वारा कथित तौर पर उन्हें दी गई लीज़ की सीमा से बाहर काम करने के कारण पैदा हुआ।
12 फरवरी, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामले में प्रकाश की सज़ा निलंबित की। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यह घटना संबंधित अधिकारियों की पूरी तरह से निष्क्रियता का सीधा परिणाम लगती है, जो ग्रामीणों की बार-बार शिकायतों के बावजूद अवैध खनन और पत्थर तोड़ने की गतिविधियों को रोकने में कथित तौर पर विफल रहे।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने दस्तावेज़ पेश किए, जिसमें आरोप लगाया गया कि कई पत्थर तोड़ने वाली इकाइयों ने पंचायत की ज़मीन, वन भूमि और चरागाह भूमि पर अतिक्रमण कर लिया। साथ ही ग्रामीणों ने बार-बार अवैध विस्फोटों, धूल प्रदूषण, सड़कों को नुकसान, घरों और स्कूलों में दरारें पड़ने, और निवासियों में सिलिकोसिस की बीमारी फैलने के बारे में शिकायतें की थीं।
8 मई, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि खनन गतिविधियों से जुड़ी गंभीर विसंगतियों के बारे में याचिकाकर्ता की बहन ने 2020 में ही अधिकारियों को अवगत करा दिया था, लेकिन राज्य के हलफनामे में अभी भी इन शिकायतों पर की गई किसी भी कार्रवाई का ज़िक्र नहीं था।
राज्य को अंतिम अवसर देते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि 11 मई, 2026 को होने वाली अगली सुनवाई से पहले कोई ऐसा हलफनामा दायर नहीं किया जाता, जिसमें ठोस कार्रवाई का विवरण हो तो राजस्थान के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्टीकरण देना होगा कि "इतने गंभीर मामले को नज़रअंदाज़ करने" के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।
9 मई, 2026 को दायर अपने अनुपालन हलफनामे में राज्य ने कहा कि वर्तमान सुप्रीम कोर्ट मामले से पहले ज़मीनी स्तर पर यह मुद्दा किसी भी संस्थागत माध्यम से वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में नहीं लाया गया। साथ ही राज्य ने यह दावा भी किया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तत्काल सुधारात्मक उपाय शुरू कर दिए गए।
हलफनामे में कहा गया,
"प्रतिवादी राज्य के वरिष्ठ प्रशासनिक नेतृत्व ने अवैध खनन के मामलों में किसी भी प्रकार की निष्क्रियता को किसी भी स्तर पर न तो कभी बर्दाश्त किया और न ही भविष्य में कभी बर्दाश्त करेगा; क्योंकि अवैध खनन को सही तौर पर एक ऐसे अपराध के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो कानून के शासन और सार्वजनिक राजकोष की नींव पर ही प्रहार करता है।"
राज्य ने कोर्ट को सूचित किया कि 9 मई, 2026 के एक सरकारी आदेश के तहत 24 घंटे के भीतर ही एक उच्च-स्तरीय समिति का गठन कर दिया गया।
हलफनामे के अनुसार, इस समिति में संभागीय आयुक्त (Divisional Commissioner) को अध्यक्ष, खान एवं पेट्रोलियम विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव द्वारा नामित प्रतिनिधि को सदस्य और ज़िला कलेक्टर को सदस्य-सचिव के रूप में शामिल किया गया।
इस समिति को कथित निष्क्रियता के लिए ज़िम्मेदार अधिकारियों की पहचान करने, उनके खिलाफ विभागीय या अन्य दंडात्मक कार्रवाई की अनुशंसा करने तथा क्षेत्र में अवैध खनन और पत्थर तोड़ने (Stone Crushing) की गतिविधियों पर अंकुश लगाने हेतु संस्थागत उपायों का सुझाव देने का दायित्व सौंपा गया।
राज्य ने कोर्ट को बताया कि समिति को एक माह के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार ही कार्रवाई की जाएगी।
हलफनामे में कहा गया,
"संबंधित अधिकारी इस माननीय न्यायालय को आगे यह आश्वासन देते हैं कि वे पूरे मामले की व्यक्तिगत रूप से निगरानी करेंगे, जिसमें उपर्युक्त समिति के कामकाज, इस माननीय न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों के अनुपालन और इस माननीय न्यायालय द्वारा समय-समय पर व्यक्त की गई चिंताओं के आधार पर की जाने वाली सभी आवश्यक अनुवर्ती कार्रवाई शामिल है।"
यह SLP एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड नामित सक्सेना के माध्यम से दायर की गई।
Case Title – Prakash v. State of Rajasthan

