नस्लीय भेदभाव | सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से संवेदनशील मामलों में जल्द सुनवाई के लिए नीतिगत फ़ैसला लेने का आग्रह किया
Shahadat
1 April 2026 8:39 PM IST

पूर्वोत्तर के लोगों के ख़िलाफ़ नस्लीय भेदभाव को चुनौती देने वाली PIL पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने आज संवेदनशील मामलों में जल्द सुनवाई की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से अनुरोध किया कि वे इस मुद्दे को प्रशासनिक स्तर पर देखें और एक व्यापक नीतिगत फ़ैसला लेने पर विचार करें।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने यह आदेश एडवोकेट मोदोइया कायिना द्वारा दायर और सीनियर एडवोकेट प्रदीप राय द्वारा बहस की गई एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
संक्षेप में मामला
इस PIL में पूर्वोत्तर के उन छात्रों द्वारा सामना किए जाने वाले नस्लीय और क्षेत्रीय भेदभाव का मुद्दा उठाया गया, जो पढ़ाई के लिए बड़े शहरों में जाते हैं; साथ ही अन्य नागरिकों के साथ भी उनके पहनावे, जातीयता, बोलने के लहजे या मूल स्थान के आधार पर होने वाले भेदभाव का ज़िक्र किया गया।
पढ़ाई, काम या रहने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में जाने वाले ऐसे नागरिकों के ख़िलाफ़ नस्लीय गालियों, अपमानजनक शब्दों, सामाजिक बहिष्कार और शारीरिक हिंसा के इस्तेमाल का आरोप लगाते हुए याचिकाकर्ता ने 2014 में अरुणाचल प्रदेश के छात्र निडो तानिया की मौत के मामले का ज़िक्र किया, जिसकी दिल्ली में एक हिंसक नस्लीय हमले में हत्या कर दी गई।
इसमें कहा गया कि तानिया की मौत के बाद गृह मंत्रालय द्वारा एमपी बेज़बरुआ समिति का गठन किया गया, जिसने पूर्वोत्तर के लोगों के ख़िलाफ़ नस्लीय भेदभाव के बारे में कई अहम निष्कर्ष दिए। इसके बावजूद, केंद्र या राज्यों की ओर से कोई प्रभावी संस्थागत प्रतिक्रिया नहीं मिली है।
सुनवाई के दौरान, राय ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता की मुख्य मांग ऐसे मामलों में समय-सीमा के भीतर सुनवाई से जुड़ी है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दायर किए जाने के बावजूद, सुनवाई कई सालों से लंबित पड़ी है।
उन्होंने दावा किया,
"भले ही जांच पूरी हो गई हो और चार्जशीट भी दायर कर दी गई हो। फिर भी तय समय-सीमा का पालन नहीं किया जा रहा है। मैं सिर्फ़ इसी मुद्दे पर बात कर रहा हूँ - समय-सीमा के भीतर सुनवाई। जांच पूरी, चार्जशीट दायर... फिर भी 3 साल, 4 साल से मामला लंबित है... और इस बीच छात्र वापस लौट जाते हैं।"
उनकी बात सुनकर, CJI ने इस तरह आदेश लिखवाया:
"हमें ऐसा लगता है कि ऐसे मामलों में बारी से पहले सुनवाई की ज़रूरत है। इसलिए हम इस याचिका को बिना किसी मेरिट या आरोपों पर कोई राय दिए, निपटा रहे हैं। साथ ही हम दिल्ली हाईकोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस से अनुरोध करते हैं कि वे इन मुद्दों पर प्रशासनिक स्तर पर विचार करें और एक समग्र नीतिगत फ़ैसला लें, जिससे ऐसे संवेदनशील मुकदमों की बारी से पहले सुनवाई के लिए एक कारगर समय-सीमा तय हो सके। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि हाई कोर्ट के माननीय चीफ जस्टिस या हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति, अगर उन्हें उचित लगे, तो इस मामले में पीठासीन अधिकारी को मुकदमे के जल्द निपटारे के लिए प्रशासनिक निर्देश जारी कर सकते हैं।"
हाल ही में कोर्ट ने एक और याचिका—एक PIL—पर सुनवाई की, जिसमें पूर्वोत्तर के लोगों के ख़िलाफ़ पहचान और नस्ल के आधार पर होने वाली हिंसा को रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई। इस मामले को निपटाते हुए, कोर्ट ने भारत के अटॉर्नी जनरल से कहा कि वे उठाए गए मुद्दों की जांच करें।
Case Title: MODOYIA KAYINA Versus UNION OF INDIA AND ORS., Diary No. 6014-2026

