पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या | दोषी के जेल ट्रांसफर की अर्ज़ी पर सुप्रीम कोर्ट ने IB से जानकारी मांगी
Shahadat
13 Oct 2026 7:58 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) से इस बारे में जानकारी मांगी कि क्या 1995 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के दोषी जगतार सिंह हवारा को दिल्ली की तिहाड़ जेल से पंजाब की जेल में ट्रांसफर किया जा सकता है। पंजाब सरकार ने कानून-व्यवस्था पर संभावित असर को लेकर चिंता जताई।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच हवारा की उस अर्ज़ी पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने पंजाब की जेल में ट्रांसफर की मांग की थी। इसका मुख्य कारण अपनी बुज़ुर्ग माँ से मिलना था, जिनकी हालत गंभीर बताई जा रही है। कोर्ट ने कहा कि वह ट्रांसफर से सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर के बारे में IB की राय लेने के बाद ही इस अनुरोध पर विचार करेगा।
कोर्ट ने कहा कि वह पंजाब सरकार की आपत्तियों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता, खासकर इसलिए क्योंकि इस मामले में ऐसे मुद्दे शामिल हैं, जो सिर्फ़ एक कैदी तक सीमित नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि हालांकि वह ऐसे अनुरोधों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने को तैयार है, लेकिन उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उसके आदेश से राज्य में और समस्याएँ न पैदा हों।
जस्टिस सुंदरेश ने कहा कि इस मामले को सामान्य हत्या का मामला नहीं माना जा सकता, क्योंकि राज्य ने अपराध से जुड़ी विचारधारा के लगातार प्रभाव को लेकर चिंता जताई।
उन्होंने कहा,
"लेकिन हम पंजाब राज्य की आपत्ति को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं?... बड़ी समस्या अभी भी बनी हुई है। ऐसा नहीं है कि उसे कोई शिकायत है। यह धारा 302 का कोई साधारण मामला नहीं है। जैसे A ने B को मारा, B ने C को मारा - इसमें कोई समस्या नहीं है, क्योंकि यह उस व्यक्ति तक ही सीमित रहता है। लेकिन यह कुछ विचारधाराओं, कुछ विचारों पर आधारित है। पंजाब राज्य का कहना है कि यह विचारधारा अभी भी जीवित है। इसके फिर से बढ़ने की संभावना है। यह एक ऐसी चिंता है जिसका समाधान हमें करना होगा।"
दिल्ली सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को दिल्ली और पंजाब सरकारों द्वारा ट्रांसफर का विरोध करते हुए दायर किए गए हलफनामों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि हवारा को छह मामलों में दोषी ठहराया जा चुका है और जनवरी 2004 में चंडीगढ़ की मॉडल जेल से उसके भागने का ज़िक्र किया, जब वह और दूसरे कैदी भागने के लिए सुरंग खोदकर निकल गए।
भाटी ने बताया कि हवारा को दिल्ली से पंजाब ट्रांसफर करने का प्रस्ताव पहले दिल्ली सरकार के गृह विभाग को भेजा गया, लेकिन सक्षम अधिकारी ने उसे नामंज़ूर कर दिया। उन्होंने पंजाब की किसी दूसरी जेल में ट्रांसफर के लिए हाईकोर्ट में हवारा की पिछली नाकाम कोशिश का भी ज़िक्र किया और कहा कि जेल में उसके व्यवहार के कारण उसे तीन बार सज़ा दी गई।
ASG ने राज्यों के बीच ज़्यादा जोखिम वाले कैदियों के ट्रांसफर के बारे में गृह मंत्रालय की एडवाइज़री का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि एडवाइज़री में ऐसे ट्रांसफर से पहले इंटेलिजेंस एजेंसियों से सलाह लेने की बात कही गई। अगर एजेंसियां नकारात्मक जानकारी देती हैं तो ऐसे ट्रांसफर से बचना चाहिए।
जनवरी 2025 में पंजाब सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे का ज़िक्र करते हुए भाटी ने कहा कि केंद्रीय और राज्य एजेंसियों की गोपनीय रिपोर्टों में हवारा के ट्रांसफर के खिलाफ़ राय दी गई। उन्होंने कहा कि एजेंसियों ने आशंका जताई कि ट्रांसफर से शांति, सांप्रदायिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। उसके साथियों की मदद से उसके भागने का जोखिम बढ़ सकता है।
हवारा की ओर से सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने आपत्तियों का विरोध किया और कोर्ट से मामले की परिस्थितियों और बीते समय पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि हवारा ने जेल में लगभग 31 साल बिताए हैं और जिन घटनाओं का ज़िक्र किया जा रहा है, वे दशकों पहले बड़े सामाजिक उथल-पुथल के दौर में हुई थीं।
गोंसाल्वेस ने अगस्त 1995 में बेअंत सिंह की हत्या की पृष्ठभूमि का ज़िक्र करते हुए जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार और अक्टूबर 1984 में दिल्ली में सिख-विरोधी हिंसा की ओर इशारा किया। उन्होंने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के 2010 के उस फ़ैसले की ओर भी कोर्ट का ध्यान खींचा जिसमें हवारा की मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया गया। तर्क दिया कि उस फ़ैसले में उसके मामले का आकलन करने के लिए ज़रूरी परिस्थितियां शामिल थीं।
गोंसाल्वेस ने कहा कि हवारा के पिछले व्यवहार को उसके खिलाफ़ नहीं माना जाना चाहिए। तर्क दिया कि पुरानी घटनाओं पर विचार करते समय बीते समय को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि प्रस्तावित ट्रांसफ़र जेल से रिहाई की कोई मांग नहीं थी, बल्कि सिर्फ़ पंजाब की एक हाई-सिक्योरिटी जेल में शिफ्ट करने की अपील थी, जहाँ हवारा अपनी 82 साल की माँ से मिल सके।
गोंसाल्वेस ने पैरोल के संबंध में पंजाब के मुख्यमंत्री के हालिया पत्र का भी ज़िक्र किया और तर्क दिया कि हवारा को अपने परिवार के करीब रखने की अनुमति देने के मामले में यह पत्र अहम है। उन्होंने कहा कि दशकों तक जेल में रहने के बावजूद उनके क्लाइंट की मानवीय भावना खत्म नहीं हुई।
जस्टिस सुंदेश ने अनुरोध के मानवीय पहलू को माना, लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि इस मामले का फ़ैसला सिर्फ़ इसी आधार पर नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कोर्ट को संबंधित राज्यों की राय को भी महत्व देना होगा और ट्रांसफ़र के व्यापक नतीजों से जुड़ी चिंताओं पर भी विचार करना होगा।
उन्होंने कहा कि कोर्ट आम तौर पर पैरोल और दूसरी तरह की राहतों पर सकारात्मक रूप से विचार करने के पक्ष में रहता है, चाहे अपराध कैसा भी हो। उन्होंने बताया कि मद्रास हाईकोर्ट के जज के तौर पर उन्होंने सरकारी वकील की आपत्तियों के बावजूद एक बड़े बम-ब्लास्ट मामले में आरोपी लगभग 30 से 40 कैदियों को पैरोल दी थी। उन्होंने कहा कि कैदियों को अपने परिवारों से मिलने देने का उन पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
उन्होंने कहा,
"लेकिन फिर भी आपत्ति के बावजूद मैंने पैरोल दी। वे सभी वापस आ गए। तब वे पूरी तरह से बदले हुए इंसान थे। यानी उसके बाद उनका स्वभाव शांत हो गया। क्योंकि वे अपने परिवारों से मिल पाए। उनमें से कुछ अपने पोते-पोतियों से भी मिल पाए। तो, कुछ उम्मीद तो है ही।"
हालांकि, उन्होंने कहा कि हवारा का मामला एक अलग तरह की चिंता पैदा करता है, क्योंकि पंजाब ने जो आशंकाएं जताई हैं, वे कैदी के व्यक्तिगत व्यवहार से कहीं आगे की हैं। उन्होंने कहा कि कोर्ट को समाज पर पड़ने वाले संभावित नतीजों पर विचार करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके आदेश से पंजाब में और समस्याएं पैदा न हों।
उन्होंने कहा,
“इसमें कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन असल दिक्कत यह है कि कहीं कोई ऐसी स्थिति न बन जाए, जिससे कोई नई समस्या खड़ी हो जाए। बस यही चिंता है। व्यक्तिगत तौर पर हमें कोई दिक्कत नहीं है, पैरोल देने में भी नहीं। पहले भी अपराध चाहे जैसा भी हो, हम हमेशा पैरोल देने के पक्ष में रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के तौर पर हमें लोगों के पक्ष में सोचना होता है और हर अपराधी का भविष्य होता है। हमें इस पर सकारात्मक नज़रिए से सोचना होगा कि बहुत पहले क्या हुआ था। देखिए, जैसा कि किसी ने कहा है, अगर आप एक व्यक्ति की हत्या करते हैं तो आप हत्यारे कहलाते हैं। अगर आप हज़ार लोगों को मारते हैं, तो आप विजेता कहलाते हैं। बस यही फ़र्क है। यह सब नज़रिए का फ़र्क है। लेकिन हमें इसके नतीजों पर भी गौर करना होगा कि समाज पर इसका क्या असर पड़ सकता है। यहाँ हमें सावधान रहने की ज़रूरत है। हमें ऐसी कोई स्थिति पैदा नहीं करनी चाहिए, जिससे और समस्याएं बढ़ें। हमारी चिंता यही है।”
उन्होंने हवारा के मामले को अलग नज़रिए से देखा, क्योंकि पंजाब की चिंताएँ सिर्फ़ उस कैदी तक सीमित नहीं थीं, बल्कि इस बात पर भी थीं कि उसे दूसरे लोग हीरो मान सकते हैं, जिससे आगे चलकर और समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।
जस्टिस सुंदेश ने कहा कि ट्रांसफ़र का आदेश देने से पहले अदालत को यह तसल्ली करनी होगी कि राज्य की चिंताओं का उचित समाधान किया गया।
उन्होंने कहा,
“हो सकता है कि वह ऐसा न करे। लेकिन अगर उसे हीरो माना जाता है, तो समस्या खड़ी हो सकती है। हमें कोई दिक्कत नहीं है। हो सकता है कि उसका स्वभाव नरम पड़ जाए। वह शांत हो जाए। वह सोचे कि यह गलत था। कोई दिक्कत नहीं। हम इस पर कुछ नहीं कह सकते। लेकिन आप जानते हैं, उसके बाद क्या स्थिति बन सकती है, यह हम नहीं कह सकते। यही चिंता की बात है। हम इन सभी बातों का अंदाज़ा लगाने में सक्षम हैं। खैर, हम इसका पता लगा लेंगे।”
अदालत ने संकेत दिया कि वह फ़ैसला लेने से पहले IB से जानकारी लेगी और इस मामले की और जाँच-पड़ताल करेगी।
मामले की पृष्ठभूमि
हवारा को 1995 में चंडीगढ़ में हुए बम धमाके में बेअंत सिंह और 16 अन्य लोगों की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया। जुलाई, 2007 में निचली अदालत ने उसे मौत की सज़ा सुनाई। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2010 में उसकी सज़ा बरकरार रखी, लेकिन मौत की सज़ा को उम्रकैद में बदल दिया, जिसमें उसे अपनी बाकी ज़िंदगी जेल में बितानी होगी। हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपीलें अभी भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।
चंडीगढ़ की बुडैल जेल में सज़ा काटते समय हवारा जनवरी 2004 में सुरंग खोदकर भाग गया। 2005 में उसे दिल्ली में एक दूसरे मामले में गिरफ़्तार किया गया और बाद में तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
2018 में हवारा ने दूसरी जेल में ट्रांसफ़र की मांग करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन 23 जुलाई 2018 को उसकी याचिका खारिज कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मौजूदा ट्रांसफ़र याचिका पर 27 सितंबर 2024 को नोटिस जारी किया।
Case Title : Jagtar Singh Hawara v. Government of NCT of Delhi & Ors.

