पुणे पोर्शे हिट-एंड-रन मामला | सुप्रीम कोर्ट ने खून के सैंपल बदलने के आरोपित दो व्यापारियों की जमानत याचिकाओं पर नोटिस जारी किया

Praveen Mishra

7 Jan 2026 1:07 PM IST

  • पुणे पोर्शे हिट-एंड-रन मामला | सुप्रीम कोर्ट ने खून के सैंपल बदलने के आरोपित दो व्यापारियों की जमानत याचिकाओं पर नोटिस जारी किया

    सुप्रीम कोर्ट ने आज 2024 पुणे पोर्शे हिट-एंड-रन केस में आरोपित व्यवसायियों आशीष मित्तल और आदित्य सूद की जमानत याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है। इस हादसे में दो लोगों की मौत हो गई थी, जब कथित तौर पर शराब के नशे में एक नाबालिग द्वारा चलाई जा रही अन्‍रजिस्टर्ड Porsche Taycan कार ने उन्हें टक्कर मार दी थी।

    मित्तल और सूद पर आरोप है कि उन्होंने कार में मौजूद दो अन्य नाबालिग आरोपियों (कथित चालक को छोड़कर), जो शराब के प्रभाव में थे, उनके ब्लड सैंपल्स अपने सैंपल्स से बदलवाए। उन पर आईपीसी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के प्रावधानों के तहत जालसाजी, सबूत से छेड़छाड़ और रिश्वत के आरोप लगाए गए हैं।

    न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के आदेश के विरुद्ध दायर याचिकाओं पर नोटिस जारी किया।

    पृष्ठभूमि

    बॉम्बे हाई कोर्ट ने 16 दिसंबर 2025 को इस मामले के आठ आरोपियों की जमानत अर्जियां खारिज कर दी थीं। न्यायमूर्ति श्याम चंदक की एकल पीठ ने विशाल अग्रवाल, आशीष मित्तल, आदित्य सूद, अरुणकुमार सिंह, अशफाक मकंदार, अमर गायकवाड़, डॉ. अजय तावरे और डॉ. श्रीहारी हलनोर की याचिकाएँ अस्वीकार कीं।

    विशाल अग्रवाल मुख्य आरोपी (नाबालिग चालक) के पिता हैं। डॉ. अजय तावरे (हेड, फ़ॉरेंसिक मेडिसिन) और डॉ. श्रीहारी हलनोर (चीफ मेडिकल ऑफिसर) पर ब्लड सैंपल बदलने के आरोप हैं। अशफाक मकंदार और अमर गायकवाड़ पर आरोप है कि उन्होंने डॉक्टरों और अग्रवाल के बीच संपर्क-स्थापना में मध्यस्थता की।

    अदालत के अनुसार, आदित्य सूद ने अपने नाबालिग बेटे के स्थान पर अपना ब्लड सैंपल दिया, जबकि आशीष मित्तल ने अरुणकुमार सिंह के बेटे के स्थान पर अपना सैंपल दिया। हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन साक्ष्यों से छेड़छाड़ और झूठे प्रमाण गढ़ने की साजिश का मज़बूत प्रथमदृष्टया मामला बनता है, ताकि दुर्घटना के समय कार चला रहे जुवेनाइल को बचाया जा सके।

    अदालत ने पाया कि झूठे मेडिकल सर्टिफिकेट तैयार किए गए, एमएलसी रजिस्टर में ग़लत प्रविष्टियाँ की गईं, और ब्लड सैंपल्स पर ग़लत लेबल लगाए गए—ताकि यह दिखाया जा सके कि आरोपी शराब के प्रभाव में नहीं थे। अदालत ने यह भी कहा कि ये कृत्य रिश्वत के बदले और नाबालिग आरोपी को धारा 304 आईपीसी के तहत दंड से बचाने के उद्देश्य से किए गए।

    आरोपियों का तर्क था कि वे दुर्घटना से जुड़े नहीं हैं, उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, और उनकी संवैधानिक अधिकारों (अनुच्छेद 21 व 22) का उल्लंघन हुआ, क्योंकि गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं दिए गए। राज्य ने इसका विरोध करते हुए कहा कि महत्वपूर्ण साक्ष्य — नाबालिगों के ब्लड सैंपल — से छेड़छाड़ की गई, और गवाह (जिनमें मेडिकल छात्र एवं आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति शामिल हैं) दबाव और धमकी के प्रति संवेदनशील हैं।

    हाई कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य आपराधिक न्याय प्रणाली की मूल आधारशिला है और पुलिस जांच का उद्देश्य राज्य के भरोसे साक्ष्य एकत्र करना है, जबकि आरोपियों ने मिलकर इस प्रक्रिया को कमजोर करने का प्रयास किया। अदालत ने यह भी माना कि जांच में कमियाँ होना अपने-आप में जमानत का आधार नहीं बनता और पीड़ितों को भी कानून के समान संरक्षण का अधिकार है।

    अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के तर्क पर अदालत ने कहा कि कोई ठोस प्रतिकूल प्रभाव प्रदर्शित नहीं हुआ और आरोपियों को अपने कृत्य तथा उसके परिणामों का पूरा ज्ञान था। इन निष्कर्षों के आधार पर हाई कोर्ट ने आठों जमानत याचिकाएँ खारिज कर दीं, जिसके विरुद्ध अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दायर की गई है।

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