मौजूदा कानून यह पक्का करता है कि 'प्रधानमंत्री का आदमी' ही मुख्य चुनाव आयुक्त बने: CEC कानून को चुनौती देने वालों की दलील
Shahadat
6 May 2026 8:02 PM IST

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के सामने दलील दी कि चुनाव आयुक्त कानून, 2023 यह पक्का करता है कि प्रधानमंत्री द्वारा सुझाए गए लोगों को ही चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया जाएगा। इससे किसी भी दूसरे उम्मीदवार का चुना जाना नामुमकिन हो जाता है और चुनाव आयोग की आज़ादी कमज़ोर होती है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के समूह की सुनवाई कर रही थी। इस कानून में यह प्रावधान है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी चयन समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक मंत्री और विपक्ष के नेता (LoP) शामिल होंगे।
यह मामला इस बेंच के सामने तब आया, जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया, क्योंकि याचिकाकर्ता एक ऐसे कानून को चुनौती दे रहे हैं, जो CJI को चयन पैनल से हटाता है।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से सीनियर वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि कानून की धारा 7 कार्यपालिका को ज़्यादा अहमियत देती है और यह 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में संविधान पीठ के फैसले के खिलाफ है। उस फैसले में एक ऐसी प्रक्रिया तय की गई, जिसके तहत नियुक्तियां एक ऐसी समिति द्वारा की जानी थीं, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शामिल हों। कोर्ट ने यह प्रक्रिया तब तक अपनाए जाने का निर्देश दिया था, जब तक कि संसद नियुक्तियों को नियंत्रित करने के लिए कोई कानून नहीं बना लेती।
हंसारिया ने साफ किया कि याचिकाकर्ता यह दलील नहीं दे रहे हैं कि CJI का चयन पैनल में होना ज़रूरी है, बल्कि वे यह कह रहे हैं कि चयन पर सत्ताधारी पार्टी का नियंत्रण नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा,
"इसका मकसद यह है कि वह 'प्रधानमंत्री का आदमी' न हो। जिस कानून को चुनौती दी गई, उसके तहत अगर प्रधानमंत्री किसी 'X' व्यक्ति की नियुक्ति का सुझाव देते हैं तो फिर किसी और व्यक्ति की नियुक्ति होने का कोई रास्ता ही नहीं बचता। संविधान सभा के सदस्यों ने यह बात ज़ाहिर की थी कि यह संस्था आज़ाद और निष्पक्ष होनी चाहिए। उस समय की सरकार के अधीन नहीं होनी चाहिए।"
उन्होंने दलील दी कि संविधान सभा ने लगातार इस बात पर ज़ोर दिया था कि चुनाव आयोग आज़ाद और निष्पक्ष होना चाहिए। उस समय की सरकार के नियंत्रण में नहीं होना चाहिए। डॉ. बी.आर. अंबेडकर और दूसरे सदस्यों के भाषणों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव एक ऐसी संस्था द्वारा कराए जाने चाहिए, जो कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर हो।
हंसारिया ने दलील दी कि संसद भले ही CEC और ECs की नियुक्ति को नियंत्रित करने के लिए कानून बना सकती है, लेकिन वह किसी संवैधानिक अदालत के फैसले को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रद्द नहीं कर सकती। उन्होंने तर्क दिया कि नियुक्तियों में कार्यपालिका को अंतिम निर्णय का अधिकार देना, 'अनूप बरनवाल' मामले में स्थापित सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
उन्होंने कहा कि सत्ताधारी दल का चुनाव परिणामों में सीधा हित होता है, इसलिए नियुक्तियों पर कार्यपालिका का नियंत्रण 'हितों का टकराव' (Conflict of Interest) पैदा करता है। न्यायिक स्वतंत्रता के साथ तुलना करते हुए उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह न्यायिक नियुक्तियों को कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर रखा जाना चाहिए, ठीक यही बात चुनाव आयोग पर भी लागू होती है।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया,
"जिस तरह न्यायपालिका को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए जजों की नियुक्ति के मामले में कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर रहना ज़रूरी है, उसी तरह चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया भी कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर होनी चाहिए; क्योंकि चुनाव आयोग के कामकाज और सत्ताधारी दल के बीच हितों का टकराव होता है। भारत के चुनाव आयोग द्वारा कराए गए चुनावों के परिणामों में सत्ताधारी दल का एक स्वाभाविक और सीधा हित जुड़ा होता है।"
जस्टिस दत्ता इस बात से सहमत थे कि चुनावों को सरकार के हाथों से बाहर रखा जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह सवाल उठाया कि क्या संविधान सभा की बहसों में यह ज़रूरी था कि चुनाव आयुक्तों को चुनने की प्रक्रिया भी कार्यपालिका के नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त हो।
जस्टिस दत्ता ने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल मामले में एक अंतरिम व्यवस्था तय की थी ताकि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक पैदा हुए खालीपन को भरा जा सके। उन्होंने सवाल किया कि क्या संसद द्वारा बनाया गया कोई कानून उस फैसले से बंधा होना चाहिए।
इसके जवाब में सीनियर वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि हालांकि संसद कानून बनाने में सक्षम है, लेकिन वह ऐसा कोई ढांचा नहीं बना सकती जो कार्यपालिका के हाथों में पूरी तरह से नियंत्रण सौंप दे। उन्होंने तर्क दिया कि इस फैसले का आधार चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के संवैधानिक सिद्धांत थे, और कानून बनाकर इन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
उन्होंने विवादित कानून पर हुई संसदीय बहसों का भी हवाला दिया और कहा कि कार्यपालिका के वर्चस्व को लेकर चिंताएं जताई गई थीं। सदस्यों ने उस समिति के औचित्य पर सवाल उठाए, जिसमें प्रधानमंत्री और एक केंद्रीय मंत्री बहुमत में होते हैं।
हंसारिया ने आगे कहा कि संविधान बनने से पहले और बाद में बनी विभिन्न समितियों ने कार्यपालिका के हाथों में सत्ता के केंद्रीकरण से बचने के लिए व्यापक आधार वाली चयन समितियों की सिफारिश की थी। उन्होंने तर्क दिया कि इन सभी सिफारिशों का मूल सिद्धांत कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण को रोकना ही था।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चुनावों में होने वाली अनियमितताएं अक्सर परिणाम घोषित होने के बाद 'अटल सत्य' (Fait Accompli) बन जाती हैं, क्योंकि चुनाव याचिकाओं के ज़रिए मिलने वाले उपाय किसी पक्षपाती मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) के अवैध या दुर्भावनापूर्ण फैसलों का पूरी तरह से समाधान नहीं कर पाते।
उन्होंने कहा,
"हम तो बस एक निष्पक्ष नियुक्ति चाहते हैं। हमें उस व्यक्ति पर पूरा भरोसा होना चाहिए।"
सीनियर वकील गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि हालांकि अनूप बरनवाल मामले में संविधान पीठ ने संसद द्वारा बनाए जाने वाले किसी भी कानून के तहत चयन समिति में CJI को शामिल करना अनिवार्य नहीं किया, लेकिन उसने यह स्पष्ट रूप से कहा था कि नियुक्तियों पर कार्यपालिका का पूर्ण नियंत्रण नहीं हो सकता।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह 'निर्णय का आधार' (Ratio Decidendi) संवैधानिक सिद्धांतों से ही लिया गया था। साथ ही तर्क दिया कि चूंकि संविधान में कोई संशोधन नहीं हुआ है, इसलिए मौजूदा कानून उस सिद्धांत से अलग नहीं हो सकता।
बहस कल (गुरुवार) भी जारी रहेगी।
Case Title - Dr. Jaya Thakur v. Union of India and connected cases

