डायन बताकर प्रताड़ित करने जैसी प्रथाएं अभी भी जारी; अंधविश्वास संवैधानिक नैतिकता पर हावी: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
13 Aug 2026 8:32 PM IST

भारतीय समाज के कुछ हिस्सों में डायन बताकर प्रताड़ित करने (विच-हंटिंग) की प्रथा के बने रहने पर गहरी चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बेबुनियाद डर कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता पर हावी रहते हैं, जिससे कमज़ोर महिलाएं बेरहम हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का शिकार होती हैं।
यह टिप्पणी ओडिशा में 1998 में पुनी नाइक की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने और उम्रकैद की सज़ा के खिलाफ बाल्कू ओरम की अपील को खारिज करते समय की गई। कोर्ट ने पाया कि ओरम और उसके सह-आरोपियों ने नाइक पर डायन होने का आरोप लगाकर बेरहमी से हमला किया, जिससे आखिरकार उसकी मौत हो गई।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने कहा,
"...इस मामले के तथ्यों ने कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर दिया, जिसमें एक बेबस महिला को डायन करार दिया गया और मृतक की बेटी पर इसका क्या असर पड़ा होगा, जिसे अपनी माँ की सबसे बेरहम तरीके से हत्या होते देखना पड़ा।"
'अंधविश्वास और बेबुनियाद डर कानून के शासन पर हावी हैं'
कोर्ट ने अफ़सोस जताया कि "डायन बताकर प्रताड़ित करने की बीमारी" समाज के कुछ हिस्सों में अभी भी मौजूद है, जहां पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और बेबुनियाद डर संवैधानिक मूल्यों और कानून के शासन से ऊपर हो सकते हैं।
कोर्ट ने आगे कहा,
"यह सच है कि डायन बताकर प्रताड़ित करने की बीमारी हमारे समाज के कुछ हिस्सों में अभी भी मौजूद है, जहां पूर्वाग्रह, अंधविश्वास और बेबुनियाद डर कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता पर हावी हो जाते हैं। डायन बताकर प्रताड़ित करने से जुड़ी क्रूरता सिर्फ़ हत्या तक सीमित नहीं है; इसमें पीड़ितों - ज़्यादातर महिलाओं - को यातना, पिटाई, यौन हिंसा और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में अंधविश्वासी मान्यताओं या डर को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे कमज़ोर महिलाएं सामूहिक नफ़रत का शिकार हो जाती हैं।"
कोर्ट ने कहा कि संविधान द्वारा ऐसी अपमानजनक प्रथाओं पर रोक लगाने और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के बावजूद, देश में ऐसी प्रथाएं अभी भी मौजूद हैं, जहां "कभी-कभी सबसे मुश्किल हालात में, किसी महिला पर उन कामों का आरोप लगाना आसान रास्ता बन जाता है, जो उसने किए ही नहीं थे; यह एक गहरी सामाजिक सोच को दर्शाता है जो समाधान के बजाय अक्सर बलि का बकरा ढूंढती है।"
कोर्ट ने कहा,
"ऐसे हालात में 'तर्क' को ही प्राथमिकता दी जा सकती है, क्योंकि तर्क ही वह एकमात्र गुण है, जो सामूहिक अतार्किकता के खिलाफ एक ढाल की तरह खड़ा रहता है।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि संविधान समानता, भाईचारे और वैज्ञानिक सोच पर आधारित समाज की कल्पना करता है। कोर्ट ने कहा कि महिलाओं का अपमान करने वाली या उन्हें नुकसान पहुंचाने वाली प्रथाओं के लिए ऐसी संवैधानिक व्यवस्था में कोई जगह नहीं है।
कोर्ट ने गौर किया कि इन संवैधानिक आदर्शों के बावजूद, समाज के कुछ हिस्सों में 'विच-हंटिंग' (डायन बताकर प्रताड़ित करने) जैसी प्रथाएं अभी भी जारी हैं।
आगे कहा गया,
"भारत के संविधान ने समानता, भाईचारे और वैज्ञानिक सोच के सिद्धांतों पर आधारित समाज की कल्पना की थी, जिसमें महिलाओं का अपमान करने वाली किसी भी प्रथा को खत्म किया जाना था। इसके बावजूद, हमारे समाज के कुछ हिस्सों में 'विच-हंटिंग' जैसी प्रथाएं अभी भी जारी हैं। हमारे जैसी संवैधानिक लोकतंत्र व्यवस्था तब तक नहीं टिक सकती, जब तक ऐसी अपमानजनक प्रथाएँ कानून के शासन और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों को चुनौती देती रहेंगी।"
फैसले की शुरुआत डॉ. अंबेडकर के इस कथन से हुई - "एक न्यायपूर्ण समाज वह है, जिसमें ऊपर की ओर सम्मान की भावना और नीचे की ओर तिरस्कार की भावना, एक दयालु समाज के निर्माण में विलीन हो जाती है।"
नतीजतन, अपील खारिज की गई।
Cause Title: BALKU ORAM VERSUS STATE OF ODISHA


