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न्यायिक समीक्षा की शक्ति: सुप्रीम कोर्ट ने कैसे 2021 में सरकारी फैसलों में बदलाव किया

Manu Sebastian
3 Jan 2022 10:21 AM GMT
न्यायिक समीक्षा की शक्ति: सुप्रीम कोर्ट ने कैसे 2021 में सरकारी फैसलों में बदलाव किया
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चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एनवी रमाना ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा, "यदि न्यायपालिका के पास न्यायिक समीक्षा की शक्ति नहीं होगी तो इस देश में लोकतंत्र का कामकाज अकल्पनीय होगा।"

उन्होंने समझाया कि संविधान ने तीन सह-समान अंगों का निर्माण किया है, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। न्यायपालिका को अन्य दो अंगों द्वारा उठाए गए कदमों की वैधता की समीक्षा करने की भूमिका दी गई है। सीजेआई रमाना ने कहा, "न्यायिक समीक्षा" को "न्यायिक अतिरेक" के रूप में ब्रांड करना एक "भटका हुआ सामान्यीकरण" है।

वर्ष 2021 में कार्यकारी कार्यों की न्यायिक समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी संवैधानिक भूमिका पर बल दिया।

कोर्ट ने नीति निर्माण के लिए निर्धारित कार्यकारी क्षेत्र में प्रवेश न करने की सावधानी बरती, हालांकि कार्यकारी निर्णेयों में पाई गई संवैधानिक कमियों को दूर करने में संकोच नहीं किया। न्यायालय के हस्तक्षेप फलदायी भी रहा, जैसा कि हमने महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणियों के आलोक में कार्यपालिका को अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करते देखा।

आइए उनमें से कुछ पर एक नजर डालते हैं।

COVID टीकाकरण नीति में बदलाव

2021 में सकारात्मक न्यायिक समीक्षा के लिए सबसे अच्छा उदाहरण केंद्र सरकार द्वारा COVID टीकाकरण नीति को बदलने का फैसला रहा है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसमें कई खामियों को उजागर किया था।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस एस रविंद्र भट्ट ने प्रथम दृष्टया टिप्पणियां की कि केंद्र और राज्यों के लिए दोहरी मूल्य नीति और मुक्त टीके से 18-44 वर्ष को बाहर रखना मनमाना और भेदभावपूर्ण था।

30 अप्रैल को पारित एक विस्तृत आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने यह तक कहा कि वैक्सीन पॉलिसी "जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार के लिए नुकसानदेह" है और "संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के जनादेश के अनुरूप बनाने के लिए इस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।"

31 मई के आदेश में न्यायालय ने अपने पिछले आदेश से कुछ कदम आगे जाकर केंद्र से कहा,

(1) वैक्सीन खरीद इतिहास पर पूरा डेटा प्रस्तुत करें।

(2) न्यायालय के समक्ष सभी प्रासंगिक दस्तावेज और फाइल नोटिंग पेश करें, जिसके कारण नीति बनी।

(3) बताएं कि 35,000 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन का उपयोग टीके की खरीद के लिए कैसे किया गया था और स्पष्ट करें कि इस राशि का उपयोग 18-44 वर्ष की श्रेणी को मुफ्त टीके देने के लिए क्यों नहीं किया जा सकता है।

केंद्र के इस तर्क का खंडन करते हुए कि कार्यकारी नीति का निर्णय न्यायिक जांच से परे है, कोर्ट ने समझाया,

"हमारा संविधान अदालतों को मूक दर्शक बनने की परिकल्पना नहीं करता है, जबकि कार्यकारी नीतियों द्वारा नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो। न्यायिक समीक्षा और कार्यपालिका की नीतियों के संवैधानिक औचित्य‌ की मांग करना आवश्यक कार्य है, जिसे करने की जिम्‍मेदारी अदालतों को दी गई है।"

"महामारी की दूसरी लहर से जूझते हुए, जब यह दो प्रतिस्पर्धी और प्रभावोत्पादक नीतिगत उपायों के बीच चयन करता है, तो यह न्यायालय कार्यपालिका के ज्ञान का दूसरा अनुमान लगाने का इरादा नहीं रखता है। हालांकि, यह निर्धारित करने के लिए अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करना जारी रखता है कि क्या चुना गया नीतिगत उपाय तर्कसंगतता के मानकों के अनुरूप है, प्रकट मनमानी के खिलाफ है और सभी व्यक्तियों के जीवन के अधिकार की रक्षा करता है"।

सात जून को प्रधानमंत्री ने वैक्सीन की दोहरी मूल्य निर्धारण नीति को बदलने और 18-44 वर्ष आयु वर्ग को मुफ्त टीकाकरण लाभ देते हुए वैक्सीन नीति में बदलाव की घोषणा की। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा जाहिर की गई दो प्रमुख चिंताएं थीं।



COVID के बीच कोर्ट द्वारा स्वत: संज्ञान हस्तक्षेप के बाद यूपी सरकार ने कांवड़ यात्रा की अनुमति रद्द कर दी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा समाचार पत्रों की रिपोर्टों के आधार पर इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने COVID के खतरे के बीच "कांवड़ यात्रा" आयोजित करने की अनुमति रद्द कर दी।

जस्टिस आरएफ नरीमन और ज‌स्टिस बीआर गवई की बेंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश राज्य कांवड़ यात्रा को आगे नहीं बढ़ा सकता है, खासकर तब जब केंद्र सरकार ने इसे आयोजित करने के खिलाफ स्टैंड लिया हो। पीठ ने अपने आदेश में कहा "धार्मिक भावनाएं जीवन और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार के अधीन हैं।" (मामला : इन रि एला‌र्मिंग न्यूजपेपर रिपोर्ट ‌रिगार्ड‌िंग कांवड़ यात्रा इन स्टेट ऑफ यूपी।)

इसी मामले के दरमियान केरल सरकार द्वारा बकरीद के लिए लॉकडाउन में ढील का मुद्दा अदालत के संज्ञान में लाया गया था। केरल सरकार की कार्रवाई की अदालत ने कड़ी आलोचना की। हालांकि, उस समय तक त्योहार समाप्त हो गया था, अदालत ने आदेश दिया कि यदि केरल सरकार द्वारा घोषित ढील से "COVID-19 बीमारी का प्रसार" होता है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।



कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के रिक्त पदों को भरने के लिए सरकार पर दबाव डाला

सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के विभिन्न न्यायाधिकरणों में बढ़ती रिक्तियों को गंभीरता से लिया और रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए कड़ी टिप्पणियां कीं।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एनवी रमाना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एल नागेश्वर राव ने सर्च-कम-सेलेक्‍शन कमेटी द्वारा अनुमोदित नामों में से चेरी-प‌िकिंग करने, चयन सूची के बजाय प्रतीक्षा सूची से नामों को लेने के लिए 'केंद्र सरकार' की आलोचना की।

पीठ ने ट्रिब्यूनल रिफॉर्म्स एक्ट 2021 पर भी नाखुशी जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि यह "अदालत द्वारा रद्द किए गए प्रावधानों की आभासी प्रतिकृति" है।

कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र सरकार ने NCLT और ITAT जैसे ट्रिब्यूनल में नियुक्तियों को अधिसूचित किया । पीठ ने रिक्त पदों के कारण देश में कई डीआरटी और डीआरएटी के काम न करने पर भी ध्यान दिया और हाईकोर्ट से बैंक वसूली मामलों के संबंध में रिट याचिकाओं पर विचार करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता आयोगों में रिक्तियों से निपटने के लिए एक स्वत: संज्ञान लिया। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र और राज्य सरकारों को समयबद्ध तरीके से नियुक्ति प्रक्रिया को पूरा करने के निर्देश दिए।



केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट की आलोचनात्मक टिप्पणियों के बाद ईडब्ल्यूएस मानदंड पर फिर से विचार करने का फैसला किया

एनईईटी-पीजी काउंसलिंग से संबंधित याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए आरक्षण की पात्रता निर्धारित करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा अपनाई गई 8 लाख रुपये की वार्षिक आय सीमा और अन्य मानदंडों के औचित्य पर सवाल उठाया।

पीठ की चिंताओं को दो रूपों में संक्षेपित किया जा सकता है,

-विशाल क्षेत्रीय आय असमानताओं की परवाह किए बिना, 8 लाख रुपये की सीमा पूरे देश में समान रूप से कैसे लागू की जा सकती है?

-यह देखते हुए कि ओबीसी श्रेणी में क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए आय सीमा 8 लाख रुपये थी, पीठ ने पूछा कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी पर समान सीमा कैसे लागू की जा सकती है, जिसमें सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन की कोई अवधारणा नहीं है। सुनवाई की विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहां पढ़ें।

जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने ईडब्ल्यूएस सीमा के औचित्य पर अपने संदेह को दर्ज करते हुए एक विस्तृत आदेश पारित किया और विशिष्ट प्रश्नों आठ बिंदु उठाए। 25 नवंबर को, केंद्र सरकार ईडब्ल्यूएस मानदंड पर फिर से विचार करने के लिए सहमत हुई और अदालत की टिप्पणियों के आलोक में इसकी समीक्षा करने के लिए एक समिति का गठन किया गया।

(लेटेस्ट अपडेट: केंद्र ने कल एक हलफनामा दायर किया जिसमें कहा गया था कि उसने समिति द्वारा की गई सिफारिश के आधार पर मौजूदा प्रवेश के लिए मौजूदा ईडब्ल्यूएस मानदंड को बनाए रखना स्वीकार कर लिया है)।

COVID मृत्यु मुआवजे का वितरण

सुप्रीम कोर्ट सक्रिय रूप से राज्य सरकारों द्वारा COVID के कारण मरने वालों के परिजनों को अनुग्रह राशि के वितरण की निगरानी कर रहा है। गुजरात सरकार मुआवजे के आवेदनों की समीक्षा के लिए एक जांच समिति गठित करने के कारण अदालत की आलोचना के घेरे में आ गई । यह देखते हुए कि जांच समिति का गठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के निर्देशों के विपरीत था, जस्टिस एमआर शाह की अगुवाई वाली पीठ ने प्रमुख सचिव और स्वास्थ्य सचिव को तलब करने के बाद गुजरात सरकार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की। उसके बाद, गुजरात सरकार ने आवश्यक संशोधन किए।

अन्य राज्यों को भी अनुग्रह राशि के वितरण की कम दर के लिए अदालत की आलोचना का सामना करना पड़ा, विशेष रूप से केरल और महाराष्ट्र को। न्यायालय ने स्थानीय समाचार पत्रों और मीडिया में आवेदन प्रक्रिया का व्यापक प्रचार करने के निर्देश दिए हैं और संवितरण की स्थिति पर समय-समय पर रिपोर्ट मांगी है।

दिल्ली प्रदूषण संकट

नवंबर के मध्य में जब दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता का स्तर खतरनाक रूप से गंभीर श्रेणी में आ गया तो सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित कार्रवाई की। न्यायालय की टिप्पणियों और हस्तक्षेपों से प्रेरित होकर, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण को रोकने के लिए कई कदम उठाए।

सीजेआई एनवी रमाना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में निर्माण गतिविधियों पर अस्थायी प्रतिबंध लागू करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने नौकरशाहों की उदासीनता पर दुख व्यक्त किया और अधिकारियों द्वारा अंतिम समय में तदर्थ उपायों के बजाय वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई कड़ी टिप्पणियों के बाद, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने डिफॉल्ट करने वाली संस्थाओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई करके निर्देशों को लागू करने के लिए एक 'एनफोर्समेंट टास्क फोर्स' और 17 फ्लाइंग स्क्वॉड का गठन किया।

लखीमपुर खीरी मामला

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा से जुड़े लखीमपुर खीरी मामले की जांच पटरी से उतर गई होती, अगर सुप्रीम कोर्ट ने समय पर हस्तक्षेप नहीं किया होता। सीजेआई एनवी रमाना की अगुवाई वाली एक पीठ ने आशीष मिश्रा के काफिले में वाहनों द्वारा कुचले जाने के बाद किसानों के मारे जाने की घटना की अदालत की निगरानी में जांच की मांग करने वाली एक पत्र याचिका पर कार्रवाई की।

कोर्ट ने यूपी पुलिस के खिलाफ कई तीखी आलोचनात्मक टिप्पणियां कीं, खासकर मुख्य आरोपी अजय मिश्रा को गिरफ्तार नहीं करने के लिए। कोर्ट के इस बयान के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। कोर्ट ने बाद के चरणों में जांच की निगरानी जारी रखी और वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों को, जो यूपी से संबंधित नहीं हैं, शामिल करके विशेष जांच दल का पुनर्गठन किया। कोर्ट ने एसआईटी जांच की निगरानी के लिए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आरके जैन को भी नियुक्त किया। अदालत ने कहा था कि सीबीआई मामले का समाधान नहीं हो सकती है...।

एसआईटी ने हाल ही में आशीष मिश्रा और अन्य आरोपियों के खिलाफ किसानों की हत्या को "पूर्व नियोजित साजिश" बताते हुए आरोप पत्र दायर किया था।



महिलाओं को एनडीए परीक्षा में बैठने की अनुमति देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की प्रवेश परीक्षा में बैठने की अनुमति देने के लिए एक अंतरिम निर्देश पारित किया। जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने एनडीए में सह-शिक्षा के खिलाफ रक्षा मंत्रालय की नीति को खारिज कर दिया। पीठ ने जनवरी 2023 में महिलाओं के प्रवेश को स्थगित करने की मंत्रालय की याचिका को भी खारिज कर दिया , यह देखते हुए कि अदालत "युवा लड़कियों की उम्मीदों को झुठला नहीं सकती"।

जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा, "हम इस ट्रेन को रिवर्स गियर में नहीं डालेंगे... हम घड़ी को पीछे नहीं सेट करेंगे। अब एक शुरुआत की जानी चाहिए। महिलाओं को यह उम्मीद देकर कि वे नवंबर में परीक्षा दे सकती हैं, हम उसे झुठलाना नहीं चाहते हैं। उम्मीद है कि यह कहकर कि उन्हें एक साल और इंतजार करना होगा और फिर कुछ हो सकता है। परीक्षा स्थगित नहीं की जा सकती।"



सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद केंद्र ने NEET-SS परीक्षा पैटर्न में बदलाव को 2022-2023 तक टाला

NEET-SS 2021 पैटर्न में लाए गए अंतिम समय के बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी ‌टिप्‍पणी के बाद केंद्र सरकार ने 6 अक्टूबर, 2021 को कोर्ट से कहा था कि संशोधित पैटर्न अगले साल से ही लागू किया जाएगा। एक याचिका में (प्रतीक रस्तोगी और अन्य बनाम राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड और अन्य) NEET-SS 2021 पैटर्न में किए गए परिवर्तनों को चुनौती दी गई थी।

सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने NEET-SS 2021 पैटर्न में अंतिम समय में किए गए बदलाव पर सवाल उठाया था और केंद्र सरकार और राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड से संशोधनों के कार्यान्वयन को स्थगित करने का फैसला करके "अपने घर को व्यवस्थित करने" के लिए कहा था।

पीठ ने टिप्पणी की कि संशोधित पैटर्न सामान्य चिकित्सा श्रेणी के छात्रों को अतिरिक्त विशेषाधिकार देते हैं, जिससे अन्य फीडर श्रेणियों के छात्रों को खतरा होता है। पीठ ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि क्या यह सुनिश्चित करने के लिए जल्दबाजी में बदलाव किए गए हैं कि निजी मेडिकल कॉलेजों में एसएस पाठ्यक्रमों के लिए सीटें खाली न रहें।



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