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'कानून और व्यवस्था' के उल्लंघन की संभावित आशंका एहतियातन नजरबंदी का आधार नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट

LiveLaw News Network
3 Aug 2021 5:07 AM GMT
कानून और व्यवस्था के उल्लंघन की संभावित आशंका एहतियातन नजरबंदी का आधार नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कानून और व्यवस्था के उल्लंघन की संभावित आशंका एहतियातन हिरासत संबंधी कानूनों के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का आधार नहीं हो सकती है।

न्यायमूर्ति आर एफ नरीमन की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि केवल कानून का उल्लंघन, यथा- धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात में शामिल होना निश्चित रूप से 'कानून और व्यवस्था' को प्रभावित करता है, लेकिन इससे पहले कि इसे 'सार्वजनिक व्यवस्था' को प्रभावित करने वाला कहा जा सके, यह समुदाय या समग्र रूप से आम जनता को प्रभावित करना चाहिए।

न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की सदस्यता वाली खंडपीठ ने तेलंगाना के शराब तस्कर, डकैत, ड्रग-अपराधी, गुंडे, अनैतिक कार्य अपराधी, भूमि कब्जाने वाले, नकली बीज अपराधी, कीटनाशक अपराधी, उर्वरक अपराधी, खाद्य अपमिश्रण अपराधी, नकली दस्तावेज़ अपराधी, अनुसूचित वस्तु अपराधी, वन अपराधी, गेमिंग अपराधी, यौन अपराधी, विस्फोटक पदार्थ अपराधी, शस्त्र अपराधी, साइबर अपराध निवारक कानून और सफेदपोश या वित्तीय अपराधी अधिनियम, 1986 के तहत एक व्यक्ति के खिलाफ हिरासत आदेश निरस्त करते हुए कहा कि कोई एहतियातन हिरासत आदेश केवल तभी पारित किया जा सकता है जब उसकी गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है या पड़ने की संभावना होती है।

इस मामले में हिरासत आदेश में पांच एफआईआर का हवाला दिया गया है जो नजरबंद व्यक्ति के खिलाफ दर्ज की गई हैं, उक्त सभी एफआईआर आईपीसी की धारा 420, 406 और 506 के तहत दर्ज हैं। इस बात का भी संज्ञान लिया गया है कि उपरोक्त सभी प्राथमिकी में नजरबंद व्यक्ति को अग्रिम जमानत/जमानत दी गई है। सलाहकार बोर्ड ने बंदी द्वारा प्रस्तुत अभ्यावेदन पर विचार करने के बाद नजरबंदी की पुष्टि की। नजरबंद व्यक्ति की पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे खारिज कर दिया गया था।

'कानून और व्यवस्था', 'सार्वजनिक व्यवस्था' और 'राज्य की सुरक्षा' जैसी अभिव्यक्तियां एक दूसरे से भिन्न हैं

अपील में अदालत ने उल्लेख किया कि तेलंगाना खतरनाक गतिविधि रोकथाम अधिनियम की धारा 2 (ए) के स्पष्टीकरण में सार्वजनिक आदेश को परिभाषित किया गया है, जिसके तहत आम जनता या उसके किसी भी वर्ग के बीच नुकसान, खतरा या अलार्म या असुरक्षा की भावना अथवा जीवन या सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर व्यापक खतरा को रखा गया है। पीठ ने कहा कि 'कानून और व्यवस्था', 'सार्वजनिक व्यवस्था' और 'राज्य की सुरक्षा' एक दूसरे से अलग अभिव्यक्तियां हैं।

"13. इसमें कोई संदेह नहीं है कि 'सार्वजनिक व्यवस्था' भंग होने के लिए, बदले में सार्वजनिक अव्यवस्था होनी चाहिए। केवल कानून का उल्लंघन, यथा- धोखाधड़ी या आपराधिक विश्वासघात में शामिल होना निश्चित रूप से 'कानून और व्यवस्था' को प्रभावित करता है, लेकिन इससे पहले कि इसे 'सार्वजनिक व्यवस्था' को प्रभावित करने वाला कहा जा सके, यह समुदाय या समग्र रूप से आम जनता को प्रभावित करना चाहिए।"

14. इसमें कोई संदेह नहीं है कि पांच एफआईआर में जो आरोप लगाये गये हैं वे 'कानून और व्यवस्था' के दायरे से संबंधित है, जिसमें धोखाधड़ी के विभिन्न कृत्यों के लिए नजरबंद व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया गया है, जो भारतीय दंड संहिता की तीन धाराओं के तहत दंडनीय हैं। पांच एफआईआर में हिरासत आदेश को बारीकी से पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि उक्त आदेश का कारण व्यापक सार्वजनिक नुकसान, खतरे या अलार्म की आशंका नहीं है, बल्कि केवल इसलिए है कि नजरबंद व्यक्ति सभी पांच प्राथमिकियों में न्यायालयों से अग्रिम जमानत/जमानत प्राप्त करने में सफल रहा। यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से अग्रिम जमानत/जमानत दी जाती है, तो स्थिति को संभालने के लिए सामान्य कानून में उपयुक्त उपाय हैं। सरकार हमेशा दिए गए जमानत आदेश के खिलाफ अपील कर सकती है और/या जमानत रद्द करने के लिए आवेदन कर सकती है। अग्रिम जमानत/जमानत आदेश प्राप्त करना मात्र ही यदि नजरबंद व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने का वास्तविक आधार है, तो इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है कि तेलंगाना खतरनाक गतिविधियां निरोधक कानून की धारा 2 (ए) में आम जनता के बीच सुरक्षा की भावना, खतरे या खतरे की जो बात कही गई है वर्तमान मामले के तथ्यों में पूरी तरह से अनुपस्थित है।"

एहतियातन हिरासत केवल सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए एक आवश्यक बुराई है

पीठ ने 'मधु लिमये बनाम सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट' मामले में की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा कि सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए एहतियातन हिरासत एक आवश्यक बुराई है।

इसने कहा:

17. जब भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी नागरिक की स्वतंत्रता की बात आती है तो इन टिप्पणियों को संदर्भ से बाहर करना खतरे से भरा होगा। उस मामले में 'सार्वजनिक व्यवस्था' के संकीर्ण अर्थ को न अपनाने का कारण "के हितों में" अभिव्यक्ति था, जो अनुच्छेद 19(2) से 19(4) में अस्तित्व में होता है और उसका इस्तेमाल तब होता है जब संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन होने पर किसी कानून को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी जाती है। जब किसी व्यक्ति को एहतियातन हिरासत में लिया जाता है, तो अनुच्छेद 21 और 22 लागू होते हैं, न कि अनुच्छेद-19 । इसके अलावा, एहतियातन हिरासत अनुच्छेद 22 के साथ पढ़े गए अनुच्छेद 21 और विचाराधीन क़ानून के सम्पूर्ण दायरे के भीतर होना चाहिए। इसलिए यह तर्क देना कि निवारक निरोध क़ानून के संदर्भ में अभिव्यक्ति 'सार्वजनिक व्यवस्था' को एक उदार अर्थ दिया जाना चाहिए, पूरी तरह से अनुचित और त्रुटिपूर्ण है। इसके विपरीत, यह मानते हुए कि एहतियातन हिरासत केवल सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए एक आवश्यक बुराई है, न्यायालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके सामने लाये गए तथ्य सीधे और अनिवार्य रूप से आम जनता या किसी वर्ग के बीच नुकसान, खतरे या अलार्म या बड़े पैमाने पर असुरक्षा की भावना पैदा करते हैं।"

बेंच ने अपील स्वीकार करते हुए और नजरबंदी को रद्द करते हुए कहा:

यह स्पष्ट है कि उच्चतम स्तर पर, कानून और व्यवस्था के उल्लंघन की एक संभावित आशंका कही जा सकती है यदि यह आशंका है कि नजरबंद व्यक्ति यदि मुक्त हो जाता है, तो भोले-भाले व्यक्तियों को धोखा देना जारी रखेगा। यह दिए गए जमानत आदेशों के खिलाफ अपील करने और/या जमानत रद्द करने का एक अच्छा आधार हो सकता है लेकिन निश्चित रूप से एहतियातन हिरासत कानून के तहत आगे बढ़ने के लिए स्प्रिंगबोर्ड प्रदान नहीं कर सकता है। इसलिए हम इस आधार पर नजरबंदी के आदेश को रद्द करते हैं। नतीजतन, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील द्वारा दी गयी दलीलों के किसी अन्य आधार पर विचार करना अनावश्यक है। विवादित निर्णय को निरस्त किया जाता है और बंदी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया जाता है। तद्नुसार अपील स्वीकार की जाती है।

केस : बांका स्नेहा शीला बनाम तेलंगाना सरकार [क्रिमिनल अपील- 733 / 2021]

कोरम: न्यायमूर्ति आरएफ नरीमन और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय

साइटेशन : एलएल 2021 एससी 336

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