BCI चेयरमैन ने NALSAR छात्रों के खिलाफ आदेश कैसे जारी किए?: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जांच की मांग

Shahadat

14 Aug 2026 9:34 PM IST

  • BCI चेयरमैन ने NALSAR छात्रों के खिलाफ आदेश कैसे जारी किए?: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जांच की मांग

    NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के दो पूर्व छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। वे इस बात की जांच चाहते हैं कि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने किस तरह से यूनिवर्सिटी को निर्देश देने वाले पत्र जारी किए। इन पत्रों में यूनिवर्सिटी से उन छात्रों की पहचान करने को कहा गया, जो दीक्षांत समारोह में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत को बुलाने के खिलाफ अभियान में शामिल थे। साथ ही यूनिवर्सिटी के 2026 बैच के छात्रों के एनरोलमेंट (पंजीकरण) पर रोक लगाने का निर्देश भी दिया गया।

    बाद में BCI चेयरमैन ने खुद ही ये आदेश वापस ले लिए थे। याचिकाकर्ताओं का सवाल है कि क्या BCI चेयरमैन को ये निर्देश जारी करने के लिए काउंसिल की कोई उचित बैठक हुई और उन्हें इसके लिए अधिकृत किया गया।

    याचिका में कहा गया कि छात्र अभियान में शामिल होना एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत एनरोलमेंट से इनकार करने का आधार नहीं है।

    याचिका में कहा गया,

    "बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के दायरे से बाहर जाकर काम किया है। उसने सेक्शन 24A की सख्त सीमाओं से परे एक अतिरिक्त-कानूनी अयोग्यता (Disqualification) बनाने की कोशिश की, जबकि सेक्शन 24A में अयोग्यता के आधारों की पूरी सूची दी गई। विवादित पत्रों के माध्यम से बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया असल में अयोग्यता का एक और आधार बना रही है - छात्र अभियान में भाग लेना और फिर यूनिवर्सिटी स्तर पर जांच का लंबित होना।"

    याचिका में यह भी कहा गया कि दीक्षांत समारोह के लिए विशिष्ट अतिथि के चयन के संबंध में छात्रों का आंतरिक पक्ष रखना संविधान के आर्टिकल 19(1)(a) के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति थी। इसमें तर्क दिया गया कि विवादित पत्र छात्रों की बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर "डराने वाला असर" (chilling effect) डालते हैं।

    इसमें कहा गया,

    "किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को दिए गए निमंत्रण से असहमति जताना या उस पर पुनर्विचार की मांग करना संस्थागत अधिकारियों के सामने अपनी बात रखना है, जो आर्टिकल 19(1)(a) के तहत संरक्षित अभिव्यक्ति है। ऐसे पक्ष रखने वाले लेखकों/आयोजकों की पहचान करने के निर्देश, साथ ही उनके आचरण पर बार काउंसिल द्वारा 'कानूनी विचार' करने की धमकी, एक डराने वाले असर के रूप में काम करते हैं। इससे भविष्य के छात्र और फैकल्टी कानूनी, शांतिपूर्ण और संवैधानिक रूप से स्वीकृत तरीकों से असहमति व्यक्त करने से डरते हैं।"

    सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर ने शुक्रवार को CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने यह मामला उठाया।

    कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि पत्रों में बताई गई घटनाओं के सिलसिले में BCI या किसी भी बार काउंसिल की ओर से NALSAR के छात्रों या फैकल्टी के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई न की जाए।

    Case Title – Mihira Sood and anr. v. Bar Council of India and ors.

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