सुप्रीम कोर्ट का सवाल- लोगों ने संयुक्त शिवसेना को वोट दिया था तो 2019 के वोट शेयर को शिंदे गुट के समर्थन का सबूत कैसे माना जा सकता है?

Shahadat

17 Sept 2026 9:46 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट का सवाल- लोगों ने संयुक्त शिवसेना को वोट दिया था तो 2019 के वोट शेयर को शिंदे गुट के समर्थन का सबूत कैसे माना जा सकता है?

    शिवसेना मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सवाल उठाया कि क्या 2019 के चुनावों में यूनाइटेड शिवसेना को मिले वोटों को बाद में एकनाथ शिंदे गुट के समर्थन का सबूत माना जा सकता है? शिंदे गुट ने चुनाव आयोग के उस फैसले का बचाव करने के लिए MLA और वोट-शेयर के आंकड़ों का सहारा लिया था, जिसमें उसे असली शिवसेना के तौर पर मान्यता दी गई थी।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच उद्धव ठाकरे की उस चुनौती पर सुनवाई कर रही है, जिसमें उन्होंने चुनाव आयोग के उस फैसले को चुनौती दी, जिसके तहत एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना माना गया और उसे 'धनुष-बाण' का चुनाव चिह्न इस्तेमाल करने की इजाज़त दी गई।

    शिंदे गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने शिवसेना के तौर पर मान्यता देने के लिए ECI द्वारा विधायी बहुमत (लेजिस्लेटिव मेजॉरिटी) टेस्ट के आधार पर लिए गए फैसले का बचाव किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने तर्क दिया कि अयोग्यता की लंबित कार्यवाही, गुट का समर्थन करने वाले विधायकों की चुनावी ताकत को पीछे की तारीख से खत्म नहीं कर सकती।

    उन्होंने कहा कि भले ही विधायकों को बाद में अयोग्य घोषित कर दिया जाए। फिर भी उनके चुनाव रद्द नहीं होंगे और उन्हें मिले वोट भी रद्द नहीं होंगे।

    कौल ने कहा,

    "इसलिए, इसी संदर्भ में ECI ने विधायी बहुमत के टेस्ट का सही तरीके से सहारा लिया। अयोग्यता की लंबित याचिकाओं का इस मामले पर कोई असर नहीं पड़ता। अगर यह मान भी लिया जाए कि सदस्य अयोग्य हो गए तो भी चुनाव रद्द नहीं होता और वोट भी रद्द नहीं होते। अयोग्यता भविष्य के लिए लागू होती है। सदस्यों को मिले वोट और सीटें ECI के फैसले के मकसद से अहम बने रहते हैं।"

    इलेक्शन सिंबल (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर के पैराग्राफ 6 और सादिक अली बनाम ECI मामले में संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कौल ने तर्क दिया कि जीती हुई सीटें और मिले वोट यह तय करने के लिए अहम होंगे कि कौन-सा गुट किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है।

    उन्होंने बताया कि शिंदे का समर्थन करने वाले 40 विधायकों को 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के 55 जीतने वाले विधायकों को मिले कुल वोटों का 76% वोट मिला था, जबकि उद्धव ठाकरे का समर्थन करने वाले 15 विधायकों को 23.5% वोट मिले थे। उन्होंने कहा कि चुनाव में शिवसेना उम्मीदवारों (जिनमें हारने वाले उम्मीदवार भी शामिल हैं) को कुल 90,48,789 वोट मिले थे। इनमें से शिंदे का समर्थन करने वाले विधायकों को 40% और ठाकरे का समर्थन करने वाले विधायकों को 12% वोट मिले थे।

    इसी तरह कौल ने बताया कि 2019 में चुने गए शिवसेना के 18 सांसदों में से शिंदे का समर्थन करने वाले 13 सांसदों को कुल वोटों का 73% मिला था, जबकि बाकी पांच सांसदों को 27% वोट मिले थे।

    जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने सवाल उठाया कि क्या एकजुट शिवसेना को मिले वोटों को बाद में किसी एक गुट के समर्थन के सबूत के तौर पर देखा जा सकता है।

    उन्होंने कहा,

    "पार्टी के अंदर लोकतंत्र के विचार को समझने का यह तरीका, मैं कहूंगा, बहुत ज़्यादा बहस वाला है। वोट एकजुट शिवसेना के लिए डाले गए थे। एक बार जब पार्टी बंट जाती है तो आपको नहीं पता होता कि जिस व्यक्ति ने वोट दिया, क्या वह बंटी हुई शिवसेना के उम्मीदवार को वोट देता। इसलिए सादिक अली मामले में इस बात पर गौर करने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि जब सादिक अली मामले में यह तय किया गया कि हम सीधे वोटर और उम्मीदवार पर ध्यान देंगे, तब 10वीं अनुसूची पर विचार नहीं किया गया। लेकिन आज मामला सिर्फ़ वोटर और उम्मीदवार का नहीं है, बल्कि वोटर और पार्टी का है। और आज हम वोटर और एक बंटी हुई पार्टी को देख रहे हैं। क्या वोटर बंटी हुई पार्टी को वोट देगा, यह सिर्फ़ अंदाज़ा लगाने की बात है। और ECI सादिक अली मामले के अनुपात के आधार पर वही अंदाज़ा लगा रही है।"

    उन्होंने उन हालात में विधायी ताकत पर निर्भर रहने पर भी सवाल उठाया, जब खुद विधायक 10वीं अनुसूची के तहत कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।

    उन्होंने पूछा,

    "क्या आपको नहीं लगता कि संवैधानिक मूल्यों की संरक्षक ECI को अपना फ़ैसला लेते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि 10वीं अनुसूची का मकसद आगे बढ़े, न कि कमज़ोर हो?"

    उन्होंने कहा कि अगर किसी गुट के खिलाफ़, जिस पर राजनीतिक पार्टी से अलग होने का आरोप है, दसवीं अनुसूची के तहत कार्यवाही चल रही हो और उस दौरान 'विधायी परीक्षण' (Legislative Test) लागू किया जाए तो उस गुट को राजनीतिक पार्टी के तौर पर मान्यता देने के लिए बहुत कड़े पैमाने की ज़रूरत पड़ सकती है, ताकि दल-बदल विरोधी कानून के मकसद को ध्यान में रखा जा सके।

    उन्होंने कहा,

    "आप विधायी परीक्षण तब लागू करते हैं जब दसवीं अनुसूची के तहत उस गुट पर सवाल उठाया गया हो, जिस पर राजनीतिक पार्टी से अलग होने का आरोप है। विधायी परीक्षण के आधार पर चुनाव चिह्न आवंटित करने के लिए अलग हुए दल या गुट को अयोग्यता की कार्यवाही पूरी होने तक राजनीतिक पार्टी के तौर पर पहचानने के लिए बहुत कड़े पैमाने की ज़रूरत होगी।"

    उन्होंने दसवीं अनुसूची की व्यापक सोच का भी ज़िक्र किया।

    उन्होंने कहा,

    "अगर आप दसवीं अनुसूची की मूल भावना को देखें तो पाएंगे कि उम्मीदवार की आज़ादी लगातार कम हो रही है और पार्टी की पहचान का दायरा बढ़ रहा है।"

    उन्होंने बताया कि विधायकों के एक-तिहाई हिस्से पर आधारित मूल 'विभाजन अपवाद' (Split Exception) को बाद में हटा दिया गया था, जबकि 'विलय अपवाद' (Merger Exception) बना रहा।

    हालांकि, कौल ने कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत कार्यवाही और ECI की पैरा 15 के तहत कार्यवाही अलग-अलग हैं। उन्होंने सुभाष देसाई बनाम ECI मामले में संविधान पीठ के फ़ैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उस फ़ैसले में ECI को विधायी बहुमत पर विचार करने से नहीं रोका गया।

    उन्होंने आगे तर्क दिया कि सुभाष देसाई फ़ैसले में यह माना गया कि ECI किसी खास विवाद के तथ्यों के हिसाब से परीक्षण का तरीका तय कर सकता है और उसने विधायी बहुमत को अमान्य नहीं ठहराया।

    उन्होंने कहा,

    "सुभाष देसाई फ़ैसले में यह नहीं कहा गया कि विधायी बहुमत अमान्य है। इसमें कहा गया कि अगर अयोग्यता का मामला लंबित हो, तो परीक्षण का महत्व कम हो जाता है और कभी-कभी यह बेकार भी हो सकता है। लेकिन यह चुनाव आयोग पर छोड़ दिया गया कि क्या वह सिर्फ़ विधायी बहुमत को आधार बना सकता है और अपनी समझदारी व मामले के तथ्यों के आधार पर परीक्षण का तरीका तय कर सकता है।"

    कौल ने तर्क दिया कि ECI ने सिर्फ़ विधायकों की संख्या पर ही भरोसा नहीं किया। उसने पार्टी के संविधान, लक्ष्यों और उद्देश्यों तथा संगठनात्मक बहुमत पर भी विचार किया और इस नतीजे पर पहुंचा कि इन पैमानों से विवाद का भरोसेमंद समाधान नहीं निकल सकता।

    उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चुनाव चिह्न विवाद पर फ़ैसला लेने से पहले अयोग्यता पर स्पीकर के फ़ैसले का इंतज़ार करना ECI के लिए संवैधानिक रूप से ज़रूरी नहीं था। सुभाष देसाई मामले के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी शर्त से ECI के फ़ैसले में बहुत ज़्यादा देरी हो सकती है क्योंकि स्पीकर के फ़ैसले को ही अदालतों में चुनौती दी जा सकती है।

    उन्होंने कहा,

    "एक संवैधानिक अथॉरिटी की कार्यवाही को दूसरी संवैधानिक अथॉरिटी के फ़ैसले के इंतज़ार में रोका नहीं जा सकता। जब 'सिंबल ऑर्डर' के पैरा 15 के तहत कोई विवाद चल रहा हो तो ECI का आम तरीका यह है कि वह उस राजनीतिक पार्टी के लिए आरक्षित सिंबल को फ़्रीज़ कर दे और विरोधी गुटों को अंतरिम सिंबल दे दे। अगर आरक्षित सिंबल को बहुत लंबे समय के लिए फ़्रीज़ कर दिया जाए और हर उपचुनाव और चुनाव के लिए अंतरिम सिंबल के आदेश का सहारा लेना पड़े तो इससे वोटरों के मन में आरक्षित सिंबल और राजनीतिक पार्टी के बीच का संबंध खत्म हो सकता है।"

    जस्टिस बागची ने फिर से पूछा कि क्या ECI ने अपने विवेक का इस्तेमाल करते समय सभी संभावित नतीजों पर ठीक से विचार किया, जैसे कि दोनों पक्षों को न्यूट्रल सिंबल के साथ चुनाव लड़ने देना। उन्होंने साफ़ किया कि कोर्ट संवैधानिक अथॉरिटी के विवेक की जगह अपना विवेक इस्तेमाल नहीं करना चाहता।

    कौल ने तर्क दिया कि भारत का चुनाव आयोग (ECI) विरोधी शिवसेना गुटों को दिए गए दो अंतरिम सिंबल को स्थायी व्यवस्था के तौर पर जारी नहीं रख सकता, क्योंकि एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी के लिए आरक्षित सिंबल का खास महत्व होता है।

    वह जस्टिस बागची के कल (बुधवार) पूछे गए सवाल का जवाब दे रहे थे कि क्या चुनाव आयोग द्वारा एक गुट को राजनीतिक पार्टी के तौर पर मान्यता देने और उसे शिवसेना का आरक्षित सिंबल देने के बजाय, दो अंतरिम सिंबल को ही अंतिम व्यवस्था बनाया जा सकता है।

    कौल ने कहा,

    "मेरा सादर और विनम्र निवेदन यह है कि यहाँ यह रास्ता नहीं अपनाया जा सकता, क्योंकि जब मैं आपके सामने 'सादिक अली बनाम ECI' मामले का ज़िक्र करूँगा, तो आप देखेंगे कि राजनीतिक पार्टी को दिए जाने वाले सिंबल का एक खास महत्व होता है।"

    उन्होंने 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट' के तहत राजनीतिक पार्टी के रजिस्ट्रेशन और 'सिंबल ऑर्डर' के तहत मान्यता के बीच फ़र्क बताया और कहा कि सिर्फ़ मान्यता प्राप्त राज्य या राष्ट्रीय पार्टी ही आरक्षित सिंबल पाने की हकदार होती है।

    कौल ने 'सादिक अली' मामले के फ़ैसले का हवाला देते हुए कहा कि भारत में सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए वोटरों का एक बड़ा हिस्सा राजनीतिक पार्टी की पहचान उसके सिंबल से करता है। उन्होंने तर्क दिया कि जब ECI ने उपलब्ध सबूतों की जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि शिवसेना में विभाजन हो गया तो उसे यह तय करने का अधिकार था कि कौन सा गुट मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है, न कि हमेशा के लिए अंतरिम व्यवस्था को जारी रखा जाए।

    Case: Sunil Prabhu v. Eknath Shinde SLP(C) No. 1644-1662/2024 (and connected case)

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